जानिए, किन चुनौतियां का सामना कर रही है रेटिंग एजेंसी 'BARC'

Wednesday, 17 May, 2017

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

देश की ऑडियंस मीजरमेंट कंपनी बार्क (BARC) द्वारा डाटा सेट का काम शुरू किए हुए दो साल हो गए हैं। तब से लेकर अब तक यह इंडस्‍ट्री में अपनी जगह बनाए हुए है और मुस्‍तैदी से काम कर रही है। यह देश के व्‍युअरशिप पैटर्न की जांच कर रही है और उसके अनुसार सर्वे तैयार कर रही है।

इस बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्‍सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने बार्क इंडिया के सीईओ पार्थो दासगुप्‍ता से अब तक की यात्रा समेत कई मुद्दों पर विस्‍तार से बातचीत की। प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अब तक आपका सफर कैसा रहा है और इसमें सबसे बड़ी चुनौती क्‍या रही है ?

29 अप्रैल 2015 को अपने पहले डाटा सेट की लॉन्चिंग के बाद से ही बार्क के लिए यह यात्रा काफी चुनौतीपूर्ण रही है और इसने लोगों को अपने आंकड़ों से संतुष्‍ट भी किया है। पिछले 80 हफ्तों से यह काफी सफलतापूर्वक डाटा रिलीज कर रही है। वीकली डाटा के लिए मैं अभी भी कई रातों को सो नहीं पाता हूं लेकिन इंडस्‍ट्री में काम करने का यही तरीका है। सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि व्‍युअरशिप के पैटर्न में बदलाव के बारे में इंडस्‍ट्री को कैसे बताया जाए। यह एक सतत प्रक्रिया है और हमारी टीम इस पर बहुत बेहतर ढंग से काम कर रही है।

बार्क यूनिवर्स एक्‍सपेंशन (BARC universe expansion) के बाद विभिन्‍न जॉनर (genres) के व्‍युअरशिप पैटर्न में किस तरह का बदलाव हुआ है ?

यदि हम यूनिवर्स एक्‍सपेंशन की बात करें तो टीवी वाले घरों की संख्‍या में काफी बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही हमें टीवी व्‍युअर्स के प्रोफाइल में काफी बदलाव देखने को मिला है। इसका सभी जॉनर पर काफी सकारात्‍मक प्रभाव देखने को मिला। उदाहरण के लिए, हिन्‍दी ऐंटरटेनमेंट चैनल (GEC) में 17 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, वहीं हिन्‍दी मूवी में 19 प्रतिशत का उछाल देखने को मिला अंग्रेजी मूवी में जहां 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, वहीं इंग्लिश ऐंटरटेनमेंट में 44 प्रतिशत की ग्रोथ हुई। इससे पता चलता है कि टीवी देखने के मामले में मध्‍य आय वर्ग और अकेले रहने वाले परिवार (nuclear families) की संख्‍या में बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा अन्‍य जॉनर में भी तरक्‍की हुई है। वहीं मेट्रो शहरों में इंग्लिश जॉनर की व्‍युअरशिप में लगातार बढ़ोतरी जारी है।  

एक्‍सपेंड बार्क यूनिवर्स में अपने प्रतिनिधित्‍व को लेकर बड़े चैनलों ने कुछ सवाल उठाए हैं। ऐसे चैनलों को लगता है कि उन्‍हें पर्याप्‍त स्‍थान नहीं दिया जा रहा है। इस बारे में आपका क्‍या कहना है ?

हमने हमेशा ऐसे बड़े प्‍लेयर्स को अपने यहां मेंटेन किया है और उनसे कम्‍युनिकेट किया है कि वे हमारे यहां लंबी अवधि के डाटा को देख सकते हैं। यह केवल इसलिए है कि बड़े चैनलों का व्‍युअरशिप बेस काफी कम होता है।  

जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि यूनिवर्स अपडेट के बाद विभिन्‍न जॉनर में व्‍युअरशिप में काफी अच्‍छी ग्रोथ देखने को मिली थी। यह भी सच्‍चाई है कि अधिकांश घरों में सामाजिक व आर्थिक रूप से वृद्धि हो रही है। इसके अलावा दर्शकों के लिए उपलब्ध बड़ी संख्या में चैनलों के अधिक से अधिक नमूने के साथ ही टियर 2 और 3 शहरों से ग्रोथ आ रही है।

: आप नए और पुराने मूल्‍यांकन और इसमें आ रहे अंतर के मुद्दे को किस तरह डील कर रहे हैं ?

पूर्व में और बाद में हुए मूल्‍यांकन में अंतर डाटा के कारण आ रहा है। हम इस बारे में लगातार अपने सबस्‍क्राइबर्स से बात कर रहे हैं। हमने ऐडवर्टाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) और इंडियन सोसायटी ऑफ ऐडवर्टाइजर्स (ISA) के सदस्‍यों की एक कमेटी भी गठित की थी। उनके फीडबैक को भी हमने नए सिस्‍टम में शामिल किया है। हालांकि, हमारा मानना है कि सबस्‍क्राइबर्स भी इन बदलाव के कारणों को जानते हैं। पिछले छह महीने से हमें इस तरह का कोई विवाद देखने को न‍हीं मिला है।  

स्‍टैबलिशमेंट सर्वे (Establishment Survey) के रूप में आगे क्‍या चुनौतियां हैं ?

हम किसी भी आधारभूत (on-ground) परिवर्तन को चित्रित करने में सक्षम होने के लिए हर साल स्‍टैबलिशमेंट सर्वे करना चाहते हैं। हालांकि इस तरह के बड़े पैमाने के सर्वे के लिए समय भी ज्‍यादा लगता है और उसकी कॉस्‍ट भी अधिक आती है। अगले कुछ सालों में हमें विभिन्‍न सामाजिक बदलाव देखने को मिलेंगे। इसके अलावा पैटर्न में भी बदलाव होगा। इसलिए सही चीजों के लिए समय-समय पर इस तरह का संचालन काफी महत्‍वपूर्ण हो जात है।  

किस तरह के टार्गेट ग्रुप और मार्केट में इस तरह के बड़े बदलाव देखने को मिले हैं ?

हमारे यूनिवर्स एस्टिमेट के बाद मध्‍यप्रदेश, छत्‍तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, गुजरात, दमन दीव  आदि दादरा एवं नागर हवेली मार्केट में व्‍युअरशिप में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। हमने यह भी नोटिस किया है कि युवा पीढ़ी की टीवी में रुचि बढ़ती जा रही है। सबसे ज्‍यादा व्‍युअरशिप ग्रोथ 2 से 14 साल और 15 से 21 साल आयुवर्ग से आई है। कंटेंट क्रिएटर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए यह अच्‍छी खबर है जो अब इस युवा पीढ़ी को टार्गेट कर सकते हैं।

शहरी और ग्रामीण व्‍युअरशिप को अलग-अलग करने से आपको क्‍या जानकारी मिली है, खासकर ग्रामीण डाटा की बात करें तो ?

यदि ग्रामीण व्‍युअरशिप की बात करें तो यह काफी चौंकाने वाले रहे हैं। पहले ग्रामीण क्षेत्रों को नजरअंदाज कर दिया जाता था। इंडस्‍ट्री को अब ग्रामीण व्‍युअरशिप का महत्‍व पता चल रहा है और इसने टेलिविजन के परिदृश्‍य को पूरी तरह बदल दिया है। फ्री टू एयर (FTA) चैनलों की बढ़ती संख्‍या, फ्रीडिश की ग्रोथ और फ्री टू एयर चैनल में ऐडवर्टाइजिंग का बढ़ता इस्‍तेमाल आदि बातों से पता चल रहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्थिति में काफी बदलाव हो रहा है।  

ग्रामीण क्षेत्रों पर केंद्रित चैनलों पर विज्ञापनों की संख्‍या में 13 प्रतिशत का इजाफा देखने को मिला है। हिन्‍दी भाषी मार्केट (HSM) में सबसे ज्‍यादा बढ़ोतरी देखने को मिली और यह कुल विज्ञापन का 31 प्रतिशत रही। फ्री टू एयर का शेयर बढ़कर 39 प्रतिशत हो गया।

पिछले अक्‍टूबर को आपने कहा था कि ज्‍यादा सैंपलिंग और ज्‍यादा मीटरों से डाटा को और ज्‍यादा सटीक बनाया जा सकता है लेकिन इसमें इंडस्‍ट्री की आर्थिक समस्‍या है। इस बारे में क्‍या कहेंगे ?

डाटा को और ज्‍यादा परिष्‍कृत (accuracy) बनाने के लिए पैनल का साइज बढ़ाना भी एक तरीका है। इसके अलावा रिटर्न पाथ डाटा (RPD) के लिए हम डीटीएच और डिजिटल केबल टीवी प्रोपराइटर्स से समझौते की दिशा में भी काम कर रहे हैं। इन सब कामों से हमें अपने सैंपल साइज को बढ़ाने में मदद मिलेगी और इस प्रकार आंकड़े और सटीक आएंगे। इसके अलावा सैंपल साइज को बढ़ाने के लिए भी हम दूसरे काम भी कर रहे हैं।

अल्‍फा क्‍लब के बारे में कुछ बताएं, कैसे यह अस्तित्‍व में आया?

अल्‍फा क्‍बल छह बड़े शहरों के व्‍युअरशिप ट्रेंड्स (NCCS A1, A2, A3) पर एक स्‍पेशल रिपोर्ट है, जिसे हम चार हफ्ते के अंतराल पर अपने स‍बस्‍क्राइबर्स के लिए जारी करते हैं। इस रिपोर्ट को काफी पसंद किया जाता है और यह सबस्‍क्राइबर्स के लिए काफी फायदेमंद है। हमने अल्‍फा क्‍लब की रिपोट्र को इंडस्‍ट्री फोरम में भी इस्‍तेमाल होते देखा है और क्‍लाइंट अपनी परफॉर्मेंस को दिखाने के लिए भी इसे इस्‍तेमाल करते हैं, यह अच्‍छा संकेत है।

आपको क्‍या लगता है कि डाटा को स्‍थायित्‍व (stabilise) ग्रहण करने में कितना समय लगेगा?

डाटा में स्‍थायित्‍व का होना बहुत जरूरी है। मुझे विश्‍वास है कि सबस्‍क्राइबर्स मेरी बातों से सहमत होंगे। हम ईमानदारी और जमीनी हकीकत के अनुसार डाटा जारी करते हैं। हम हमेशा से मजबूत और स्थिर थे और अभी भी हैं। डाटा स्थिर रहता है और मार्केट में बदलाव होता है तो इस पर असर पड़ेगा।

क्‍या आपको लगता है कि ब्रॉडकास्‍टर्स बार्क सिस्‍टम को पूरी तरह समझने में सक्षम हैं ?

एक ऑर्गनाइजेशन के रूप में हमारा फोकस हमेशा से अपने सबस्‍क्राइबर्स की सहायता करना और उन्‍हें ट्रेनिंग देना रहा है। इसके लिए हम सॉफ्टवेयर और डाटा संबंधी सवालों का इस्‍तेमाल करते हैं। पुराने सिस्‍टम के मुकाबले नए सिस्‍टम काफी आसान है और इस बारे में हम अपने क्‍लाइंट्स से बात करते रहते हैं। हालांकि इसमें कुछ समय लगता है लेकिन हमारे सबस्‍क्राइबर्स आज के समय में इस बात को समझते हैं।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) की गाइडलाइंस के अनुसार हम अपने सबस्‍क्राइबर्स को किसी तरह की सलाह (consultancy) नहीं दे सकते हैं लेकिन उनकी सहायता के लिए हम थर्ड पार्टी कंसल्‍टेंसी फर्म को नियुक्‍त करने की प्रक्रिया में हैं। ये फर्म हमारे सबस्‍क्राइबर्स को यह सेवा उपलब्‍ध कराएगी। इससे हमारे क्‍लाइंट्स को एक बार फिर डाटा और चार्ट के साथ इसे तैयार करने में अपनाई गई स्‍ट्रेटजी को समझने में मदद मिलेगी।

 


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