...जब 'इंडिया टीवी’ के एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा को पुलिस ने किया था गिरफ्तार...

Thursday, 29 June, 2017

इंडिया टीवी के रजत शर्मा उन दिनों कहीं ट्यूशन पढ़ाने जाते थे। उनको पुलिस ने कहीं से गिरफ्तार कर लिया और दबाव बनाया कि विजय गोयल का पता बताओ और फोन करो। फोन से मुझे पता चल गया कि उनके पास पुलिस खड़ी है। मैं तुरंत घर से भाग गया और पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल ले गई। हमारी पार्टी ने सत्याग्रह आरंभ कर दियाहिंदी दैनिक नवभारत टाइम्स में छपे अपने ब्लॉग के जरिए ये कहा केंद्रीय खेल मंत्री विजय गोयल ने। उनका पूरा ब्लॉग आप यहां पढ़ सकते हैं-

सोचा ना था कि इस तरह आपातकाल लागू किया जाएगा

आपातकाल पर आयोजित एक कार्यक्रम में लालकृष्ण आडवाणी जी बोल रहे थे। अचानक हमें आभास हुआ कि श्रोताओं में आपातकाल से किसी तरह का कोई जुड़ाव नहीं है इसलिए कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही। फिर हमें ध्यान आया कि आपातकाल की घटना 42 साल पुरानी हो चुकी है और इस बीच एक नई पीढ़ी आ गई है, जिसे यह नहीं पता कि इमर्जेंसी क्या है और उसमें कैसी ज्यादतियां हुई थीं। 26 जून, 1975 को लगे आपातकाल के बारे में सोचता हूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। भारत जैसे देश में शायद कभी किसी ने सोचा न था कि इस तरीके से आपातकाल लागू कर दिया जाएगा, मानव अधिकारों का हनन होगा, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी जाएगी, नसबंदी जैसे कार्यक्रमों को जबरन थोप दिया जाएगा, लाखों लोगों को जेलों में ठूंस दिया जाएगा। मैं उन दिनों श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से एम.कॉम कर रहा था। मेरे पिता श्री चरती लाल गोयल तब के वरिष्ठ नेताओं में से एक थे। अचानक 25 जून की रात पुलिस मेरे पिताजी को गिरफ्तार कर ले गई। वे कपड़े बदलकर जाने के लिए तैयार हो गए यह समझते हुए कि 3-4 दिन के अंदर छूट जाएंगे। उन दिनों जयप्रकाश नारायण जी का संपूर्ण क्रांति का आंदोलन चल रहा था। कांग्रेस की इंदिरा सरकार चारों तरफ से घिरी हुई थी।

जेल का रोमांच

पुलिस पिताजी को पकड़कर अंबाला जेल ले गई। हमारे ऊपर इस बात का कोई प्रभाव नहीं था, क्योंकि किसी को यह नहीं मालूम था कि मामला क्या है और आपातकाल होता क्या है। जो लोग पहले दिन पकड़े जाते थे, वे इसलिए भी संतुष्ट रहते थे कि वे बड़े नेता हैं, इसलिए उन्हें पहले पकड़ लिया गया है। यह भी एक तरह से स्टेटस सिंबल था। वित्त मंत्री अरुण जेटली तब दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन के प्रेजिडेंट थे। उन्होंने मुझे फोन किया कि इस पकड़-धकड़ के खिलाफ यूनिवर्सिटी कैंपस में जुलूस निकाला जाए। छात्रों को इकट्ठा कर जुलूस निकाल दिया गया। जुलूस निकाल कर हम अलग-अलग हो गए। अरुण जेटली यूनिवर्सिटी के कॉफी हाउस में जाकर बैठे, वहां पुलिस आई और उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। रात को सेंसरशिप लगा दी गई। अनेक प्रेसों की बिजली काट दी गई और अगले दिन अखबार छपे ही नहीं। बीबीसी के माध्यम से खबरें आने लगीं कि सभी पार्टियों के राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। हम भूमिगत हो गए। अपने घर भी छुपकर जाते थे। जब रात को पुलिस आती थी तो मैं एक छत से दूसरी छत पर फांद जाता था।

इंडिया टीवीके रजत शर्मा उस समय मेरे सहयोगी थे। शक्ति नगर में शर्मा न्यू आर्ट कॉलेज में स्टेंसिल काट कर साइक्लोस्टाइल करवा कर मशाल’, ‘प्रतिशोधऔर मिनी मदरलैंडके नाम से अखबार निकालते थे। उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ, विद्यार्थी परिषद सब लोग मिलकर एक अखबार जनवाणीके नाम से छापा करते थे और उसे हम बांटते थे। रजत शर्मा उन दिनों कहीं ट्यूशन पढ़ाने जाते थे। उनको पुलिस ने कहीं से गिरफ्तार कर लिया और दबाव बनाया कि विजय गोयल का पता बताओ और फोन करो। फोन से मुझे पता चल गया कि उनके पास पुलिस खड़ी है। मैं तुरंत घर से भाग गया और पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल ले गई। हमारी पार्टी ने सत्याग्रह आरंभ कर दिया। मुझे जिम्मेदारी दी गई कि दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस की लॉ फैकल्टी चौक पर सत्याग्रह आरंभ किया जाए। मैंने रजत शर्मा को बुलाकर पूछा कि जेल में कितनी पिटाई होती है, कैसे जेल जाते हैं। मैं इस बारे में कोई कल्पना नहीं कर पा रहा था। फिर उन्होंने विस्तार से सब कुछ बताकर मेरा भय दूर किया। 9 दिसंबर, 1975 को हमारा सत्याग्रह हुआ। पुलिस आती थी और सत्याग्रहियों को पकड़कर ले जाती थी। मैं और मेरा एक साथी लॉ फैकल्टी की छत पर चढ़ गए और नारे लगाने लगे। छत टूट गई और हम पकड़े गए। हम दोनों को हथकड़ी लगाई गई। हमें पहले थाने लाया गया और थाने से फिर तिहाड़ जेल भेज दिया गया।

सच कहूं तो जिन लोगों पर परिवार चलाने की जिम्मेदारी थी, उनके लिए जेल जाना तकलीफ की बात थी। जिन्हें यातनाएं दी गईं, उन्हें भी बहुत तकलीफ थी। जेल अपने आप में एक यातना थी, पर हमारे जैसे युवाओं के लिए, जो संस्कारों से प्रेरित थे, जेल एक रोमांच, कौतूहल, ट्रेनिंग सेंटर और आनंद का विषय था। जेल में हम कैदियों के साथ खेलते थे। मैं वॉलिबॉल बड़े शौक से खेलता था। वहां एक लाइब्रेरी भी थी, जिससे किताबें ले आते थे। कैदियों को फिल्में दिखाई जाती थीं, तो हम भी फिल्म देखने चले जाते थे। एक बार की बात है, जेल में गंदा खाना मिलने लगा। हमने विरोध में थालियां बजाईं और हमारी पिटाई शुरू हो गई।

मोरारजी की सरकार

इस तरह दिन बीत रहे थे। पार्टी ने जब तय किया तो लोगों ने अपनी जमानतें करवानी शुरू कीं। मुझे याद है आपातकाल हटने के बाद हुई रामलीला मैदान की वह विशाल रैली, जिसे श्री अटल बिहारी वाजेपयी के साथ जगजीवन राम भी संबोधित करने वाले थे। उसे फेल करने के लिए उस समय की सबसे चर्चित फिल्म बॉबीटेलिविजन पर दिखाई गई। इसके बावजूद मैदान खचाखच भरा हुआ था। इंदिरा गांधी को लोगों ने बताया था कि आपातकाल लगाने से जो काम हुए हैं, उसकी जनता में बड़ी तारीफ है। अगर आप चुनाव करवाएंगी तो भारी बहुमत से जीतेंगी। इंदिरा सरकार ने आपातकाल हटा लिया और चुनाव करवा दिए। पर इंदिरा और संजय गांधी समेत कांग्रेस बुरी तरह हार गई। तमाम विपक्षी दलों को मिलाकर बनने वाली जनता पार्टीजीती और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में नई सरकार बनी।

(साभार: नवभारत टाइम्स)


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