चैट शो से पहले ऐंकर और पैनलिस्ट सहमति से तय करते हैं कि आज उनकी ‘लाइन’ क्या होगी...

Wednesday, 28 June, 2017

एक अजब संयोग है कि भारत में 24 घंटे के टेलिविजन न्यूज चैनल्स की नींव ही 1991 में खाड़ी युद्ध के समय पड़ी थी। यह पहला मौका था जब भारतीयों ने अपने ड्राइंग रूम में बैठकर लाइव युद्ध देखा। और जिस दिलचस्पी से देखा, उसने भारत में न्यूज चैनल्स की सफलता के नुस्खे तय कर दिए। आज 26 साल बाद भी ऐसा लगता है, जैसे कुछ भी नहीं बदला है। आज भी हम भारतीय अपने ड्राइंग रूम और बेड रूम में न्यूज चैनल्स पर युद्ध ही देखना चाहते हैं, भले वह स्टूडियो में गढ़ा हुआ ही क्यों न हो!हिंदी दैनिक नवभारत टाइम्समें छपे अपने ब्लॉग के जरिए ये कहा डीडी न्यूज में वरिष्ठ एंकर और संपादक अशोक श्रीवास्तव ने। उनका पूरा ब्लॉग आप यहां पढ़ सकते हैं-

टीवी स्टूडियो में बने रहना है तो 'युद्ध' तो करना ही पड़ेगा

जून के पहले सप्ताह में एनडीटीवीके सह संस्थापक प्रणॉय रॉय के घर पर सीबीआई के छापे और उसके बाद प्रेस की स्वतंत्रता पर बहस के शोर में मीडिया से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा लगभग अनदेखा रह गया। इस हलचल से चंद दिन पहले ही एनडीटीवी की सीनियर ऐंकर और चैनल की प्रबंध संपादक ने बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा को अपनी एक डिबेट के बीच से बाहर निकाल दिया था। बीजेपी प्रवक्ता ने बहस में कहा कि उन्हें एनडीटीवी का अजेंडा अच्छी तरह से पता है। यह सुनते ही ऐंकर भड़क गईं और प्रवक्ता से कहा कि वह या तो अपने शब्द वापस लें, या फिर डिबेट छोड़ कर चले जाएं।

प्रवक्ता ने जब इसका प्रतिवाद किया तो ऐंकर ने उनका कैमरा बंद करवा कर उन्हें बहस से बाहर कर दिया। यह विडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। इसके दो-चार दिन बाद ही जब प्रणॉय रॉय के घर पर छापा पड़ा तो सोशल मीडिया पर कुछ उत्साही लोगों ने इसको स्टूडियो बहस से जोड़ते हुए इसका श्रेयसंबित पात्रा को दे दिया। सच्चाई जो भी हो, पर बड़ा सवाल यह है कि क्या एक ऐंकर को टीवी डिबेट के बीच से किसी पैनलिस्ट को बाहर निकाल देने का हक है?

भूतों की विदाई

क्या ऐंकर और राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता असहिष्णु होते जा रहे हैं? टीवी स्टूडियोज आखिर क्यों प्राइम टाइम में युद्ध का मैदानबनते जा रहे हैं, जहां तर्क कम और चिल्लाहट ज्यादा सुनाई देने लगी है? हाल तक लोगों की बड़ी चिंता यह थी कि न्यूज चैनलों के प्राइम टाइम में भूत-प्रेतों की कहानियां, स्वर्ग की सीढ़ी और राखी सावंत बनाम मीका की गढ़ी हुई कहानियां दिखाई जा रही हैं और चैनलों से न्यूज गायब होता जा रहा है। फिर ट्रेंड बदला और ऐसी कहानियों की जगह राजनीतिक बहसों ने ले ली। यह परिवर्तन देश की बदलती सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की वजह से आया। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में कॉमनवेल्थ, कोयला और 2जी घोटालों ने लोगों में गुस्सा भर दिया। अन्ना हजारे के नेतृत्व में शुरू हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने लोगों के आक्रोश को और हवा दी।

टीवी स्टूडियो में कुछ ऐंकर्स का गुस्से की भाव-भंगिमा के साथ नेताओं को घेरना, उनका मान-मर्दन करना लोगों को अच्छा लगा। धीरे-धीरे यह ट्रेंड बन गया तो फिर कुछ न्यूज ऐंकर्स ने इसे अपना स्टाइल ही बना लिया। याद करें, 2014 के लोकसभा चुनाव में गुस्साए ऐंकर्स, आग उगलती टीवी डिबेट्स और चिल्लाते हुए पैनलिस्ट किस तरह न्यूज चैनलों के लिए टीआरपी बटोरने का पैमाना बन गए थे।

लोकसभा चुनाव के बाद कुछ समय तक तो मोदी विरोध और मोदी समर्थन में अतिवादी कटुता के कारण ही न्यूज स्टूडियोज गरमाए रहे। पर तब तक चूंकि स्टूडियोज को युद्ध का मैदान बनाए रखना एक हिट फॉर्म्युला बन गया था इसलिए जब मोदी और भ्रष्टाचार को केंद्र में रख कर होने वाली आग उगलती डिबेट्स कुछ कम हुईं तो चैनलों ने कभी भारत-पाकिस्तान, कभी तीन तलाक, कभी अयोध्या तो कभी बीफ बैन जैसे मुद्दों को हाथोंहाथ उठा लिया। ये तमाम मुद्दे यूं ही इतने संवेदनशील हैं कि दर्शकों को भावनाओं के सैलाब में बहा ले जाने की ताकत रखते हैं।

टेलिविजन ऐंकर्स के लिए पूरी दुनिया में यह अघोषित आचार संहिता लागू है कि अतिथियों से सवाल तो तीखे पूछिए, पर अपनी भाषा और बॉडी लैंग्वेज शालीन-संयत बनाए रखिए। लेकिन भारतीय टेलिविजन न्यूज इंडस्ट्री ने इन मानकों को ध्वस्त कर दिया है। हम सबने बीते कुछ सालों में कई पार्टी प्रवक्ताओं को बदलते हुए देखा है। जो लोग पहले मर्यादा में रह कर अपने तर्क रखने के लिए जाने जाते थे, वे भी आज चिल्लाते हुए दिखाई देते हैं।

इस बदलाव का कारण न्यूज चैनल तो हैं ही, पर सिर्फ वे ही नहीं हैं। दरअसल आज हर पार्टी का मीडिया सेल भी बेहद सक्रिय हो गया है। वह अपने प्रवक्ता की परफॉरमेंसपर नजदीकी से नजर रख रहा है। टीवी डिबेट में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर उंगली उठने और आपके विरोधी के चीखने-चिल्लाने पर अगर आपने उससे भी ज्यादा जोरदार तरीके से अपना प्रतिवाद दर्ज नहीं कराया तो माना जाएगा कि आप डिबेट में अपने प्रतिद्वंद्वी से पिट गए और आलाकमान के सामने आपके नंबरकट सकते हैं। इसलिए ऐसा भी होता है कि शो से पहले ऐंकर और कुछ पैनलिस्ट आपसी सहमति से तय कर लेते हैं कि आज उनकी लाइनक्या होने जा रही है। ऐसा करने से ऐंकर का शो कामयाबहो जाता है और आने वाले समय में चैनल के लिए पैनलिस्ट की उपयोगिताभी बनी रहती है।

युद्ध से शुरुआत

धीर-गंभीर, शांत प्रवक्ता न तो शो के ऐंकर को सूट करते हैं, न ही चैनल को। इसलिए इस युद्ध के मैदान में बने रहना है तो युद्ध तो करना ही पड़ेगा, और अपना बचाव करना है तो भी हमला करते रहना होगा। पार्टी प्रवक्ता हमलावर होगा और ऐंकर गुस्से में, तो स्वाभाविक है कि स्टूडियो में असहिष्णुता बढ़ेगी और मर्यादाएं टूटेंगी, कभी अनजाने में तो कभी जान-बूझ कर।

वैसे यह भी एक अजब संयोग है कि भारत में 24 घंटे के टेलिविजन न्यूज चैनल्स की नींव ही 1991 में खाड़ी युद्ध के समय पड़ी थी। यह पहला मौका था जब भारतीयों ने अपने ड्राइंग रूम में बैठकर लाइव युद्ध देखा। और जिस दिलचस्पी से देखा, उसने भारत में न्यूज चैनल्स की सफलता के नुस्खे तय कर दिए। आज 26 साल बाद भी ऐसा लगता है, जैसे कुछ भी नहीं बदला है। आज भी हम भारतीय अपने ड्राइंग रूम और बेड रूम में न्यूज चैनल्स पर युद्ध ही देखना चाहते हैं, भले वह स्टूडियो में गढ़ा हुआ ही क्यों न हो!

(साभार: नवभारत टाइम्स)


समाचार4मीडिया.कॉम देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया में हम अपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।



Copyright © 2017 samachar4media.com