बड़ी शर्मनाक स्थिति है, शर्मनाक टिप्पणी है यह मीडिया के लिए...

बड़ी शर्मनाक स्थिति है, शर्मनाक टिप्पणी है यह मीडिया के लिए...

Wednesday, 30 August, 2017

मृत्युंजय त्रिपाठी

युवा पत्रकार ।।

पाठक से अधिक पत्रकार ध्यान दें!

26 अगस्त को रामरहीम मामले में हाई कोर्ट के फैसले के कवरेज को कुछ चैनलों ने दिखाया व अखबारों ने प्रकाशित किया कि कोर्ट ने प्रधानमंत्री पर तल्ख टिप्पणी की है। कहा है कि वे बीजेपी के नहीं, पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं। बस क्या था, अन्य पार्टियों के घोषित, अघोषित प्रवक्ताओं को मौका मिल गया। सोशल मीडिया पर भी खूब ट्वीट, पोस्ट किए गए लेकिन किसी ने सच्चाई जानने की जरूरत नहीं समझी। दरअसल सच्चाई जानने का यह काम सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वालों का था भी नहीं, उनसे यह सम्भव भी न था। यह काम तो उन पत्रकारों को करना था, जिनकी खबरों पर भरोसा कर सोशल मीडिया में यह सबकुछ वायरल हुआ।

कोर्ट की टिप्पणी इस तरह की रिपोर्टिंग करने वालों के लिए एक सबक है। कोर्ट ने कहा है कि मीडिया को ऐसी रिपोर्टिंग नहीं करनी चाहिए। कोर्ट का कहना है कि उसने प्रधानमंत्री पर कोई टिप्पणी नहीं की थी। मीडिया ने हाईकोर्ट की टिप्पणी को गलत ढंग से पेश किया है।

अब तक जब कोई व्यक्ति आरोप लगाता था कि उसकी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया, तो हम यह कह देते थे कि वही झूठ बोल रहा है लेकिन अब कोर्ट की बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बड़ी शर्मनाक स्थिति है, शर्मनाक टिप्पणी है यह हमारे लिए। इससे पहले कि सोशल मीडिया की तरह मीडिया की भी विश्वसनीयता खत्म हो जाए, हमें गंभीर हो जाने की जरूरत है। यह मामूली चूक हमारे वजूद को खतरे में डाल सकती है।

अभी कुछ दिन पहले जब गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से मासूमों की मौत हुई थी तब भी ऐसी ही रिपोर्टिंग दिखी। इंसेफेलाइटिस के नोडल अफसर डॉ. कफील को पहले मसीहा बना दिया गया और फिर विलेन। जिन लोगों ने भी दोनों तरह की खबरें पढ़ीं-देखीं, उनकी मीडिया के बारे में कभी अच्छी राय तो नहीं ही बनेगी और ना ही हमारे बारे में जो इस तरह की खबरें परोसते हैं।

समझ नहीं आता कि यह चूक होती ही क्यों और कैसे है जबकि पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान और उसके बाद संस्थान में भी लगातार यह बात बताई जाती है कि खबर किसी भी स्रोत से लीजिए लेकिन उसे पुष्ट जरूर कर लीजिए कि यथार्थ क्या है। इसके बाद भी सब भूलकर कई पत्रकार हड़बड़ी में ऐसी गलतियां कर ही देते हैं। गलतियां होती हैं, इससे भी गंभीर बात तो यह है कि मालूम पड़ने पर ऐसा करने वाला पत्रकार अपराध बोध से मरा नहीं जाता, शर्म से गड़ा नहीं जाता, बल्कि पूछने पर बेहयाई से खड़ा हो जाता है (कुछ अपवाद)। कुछ पत्रकार तो ऐसी चूक के बाबत पूछे जाने पर आगे से सुधार लाने की बात न कर, इसे काफी हल्के में लेते हुए अपने अपराध के बचाव में कुतर्क भी प्रस्तुत करने से नहीं चूकते। जी, आपके लिहाज से यह छोटी गलती हो सकती है लेकिन यही छोटी गलती पत्रकारिता की विश्वसनीयता को खत्म करने के लिए काफी है। आप छोटे पत्रकार हों या बड़े, अपनी, अपने संस्थान के साथ ही समाज में पत्रकारिता की विश्वसनीयता बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन सजग होकर कीजिए। आप मानें या न मानें लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता का खतरे में होना आपके खुद के वजूद का भी मिट जाना है।

(साभार: फेसबुक वॉल से)


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