सरकार चाहती है कि सब्जी-तेल चाहे जितना मिलावटी बिके पर मांस बिल्कुल ‘प्योर’ बिके: उर्मिलेश

Tuesday, 28 March, 2017

उर्मिलेश

वरिष्ठ पत्रकार ।।

कपूर साहब, गोयल साहब, गुप्ता जी, शर्मा जी या सिंह साहब के बड़े-बड़े बूचड़खानों की बात यहां नहीं कर रहा हूं। यूपी में गैर-लाइसेंसी छोटे-मझोले मांस विक्रेताओं की दुकानें इधर कई दिनों से बंद हैं। इससे हजारों की आबादी रोजगार-विहीन हो गई है। लाखों प्रभावित हुए हैं। लोग लखनऊ की मशहूर टुंडे कवाब का मजा नहीं ले पा रहे हैं। सौ साल में पहली बार टुंडे कवाब वाले को अपनी दुकान बंद करनी पड़ी। लेकिन अपने मुहल्ले वाले पंडित जी की सब्जी की दुकान पर कोई असर नहीं। उन्हें सड़ियल पपीता और बजबजाती गोभी बेचने की पूरी आजादी है। उनके लिए शुद्धता का कोई लाइसेंस नहीं। जनतंत्र समावेशी जो है!

यूपी की प्राथमिकता फिलहाल मांस है। मांस खाने की चीज है और सब्जी-पनीर भी। सब्जी-पनीर बेचने वाले फिलहाल आजाद हैं, जो चाहे बेचें। सरकार चाहती है कि सब्जी और तेल आदि चाहे जितना मिलावटी बिके पर मांस बिल्कुल 'प्योर' बिके! इसलिए गली-गली दुकान लगाये मटन और अन्य मांस विक्रेताओं पर पाबंदी लगी है। सब्जी, सरसों तेल और आटा बेचने वालों पर फिलहाल ऐसी कोई पाबंदी नहीं। क्योंकि सब्जी, तेल और आटा तो हमेशा 'शुद्ध और पवित्र' ही बिकते हैं, इनके निर्माण और विक्रय में 'शुद्ध लोग' ही शामिल होते हैं!

बहरहाल, एक उपाय सूझ रहा है, जिससे यूपी में मटन और अन्य प्रकार के मांस के विक्रय को सर्वसुलभ किया जा सकता है! गली और सड़क छाप विक्रेताओं को 'बंगाल की खाड़ी' या 'अरब सागर' की तरफ बाहर ढकेलकर मुंबई या अहमदाबाद स्थित बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को इस लाभकारी धंधे में आने का आमंत्रण दिया जाय! शायद, वे बस इंतजार में होंगे। इससे उपभोक्ताओं को शीशे के वातानुकूलित शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में रखा 'साफ-सुथरा मांस' मिला करेगा! वातानुकूलन से खराब मांस भी अच्छा लगने लगता है!

(साभार: फेसबुक वॉल से)

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