वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ का व्यंग्य: हम अपने प्यारे नेता के लिए सर्किट नहीं बन सकते?

Thursday, 31 August, 2017

नोटबंदी में सरकार को इतने नोट मिले थे कि गिनती नहीं हो पा रही थी। डर था कि गिनने की ड्यूटी से उकता गये आरबीआई के गर्वनर साहब नौकरी ना बदल लें, जैसे नीति आयोग वाले पनगढ़िया साहब ने बदली। लेकिन गर्वनर साहब डटे रहे। गिनते-गिनते पसीने से तर-बतर हो गये तो उन्ही नोटो से कई बार पंखा झला। अब गिनकर देश को बताया कि ब्लैक मनी के नाम पर आया है-- बाबाजी का ठुल्लू अपने फेसबुक वॉल पर लिखे एक व्यंग्य के जरिए ये कहा वरिष्ठ पत्रकार व चर्चित व्यंग्यकार राकेश कायस्थ ने। उनका ये पूरा व्यंग्य आप यहां पढ़ सकते हैं:

सुन सर्किट! बोले तो अब वोटबंदी मांगता है

कमाल का देश है अपना! मनोरंजन के लिए बनाई गई फिल्में शिक्षा देती हैं और जनता को शिक्षित करने के लिए गये महान राजनीतिक फैसले आखिर में मनोरंजक साबित होते हैं। नोटबंदी में सरकार को इतने नोट मिले थे कि गिनती नहीं हो पा रही थी। डर था कि गिनने की ड्यूटी से उकता गये आरबीआई के गर्वनर साहब नौकरी ना बदल लें, जैसे नीति आयोग वाले पनगढ़िया साहब ने बदली। लेकिन गर्वनर साहब डटे रहे। गिनते-गिनते पसीने से तर-बतर हो गये तो उन्ही नोटो से कई बार पंखा झला। अब गिनकर देश को बताया कि ब्लैक मनी के नाम पर आया है-- बाबाजी का ठुल्लू।

उर्जित बाबू की गिनती में सरकार ने जो बाबाजी का ठुल्लू अर्जित किया है, उसका देश की महान जनता क्या करेगी? आदतन रोना-धोना शुरू हो गया है। मेरा कहना है कि देशवासियों ने राजकुमार हिरानी की फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस से शिक्षा ली होती तो ये रोना-धोना नहीं होता। याद कीजिये मुन्नाभाई एमबीएस का क्लाइमेक्स। मुन्ना जादू की झप्पी देकर 15-15 साल से कोमा पड़े लोगो को ठीक करने लगा था। ये काम तो एंटायर एमबीबीएस डिग्री वाले बड़े-बड़े डॉक्टर भी नहीं कर पाये। फिर मुन्ना इस चमत्कार तक पहुंचा कैसे?

माना कि मुन्ना डेयरिंग था। अपनी कंट्री और सोसाइटी के लिए किसी की बाट लगा सकता था। उसकी बॉडी स्टील के माफिक थी और सीना मैने नापा नहीं, लेकिन 55 इंच से एक सेंटीमीटर भी कम नहीं रहा होगा। लेकिन मुन्ना कभी कामयाब नहीं हो पाता अगर उसे सर्किट का सपोर्ट नहीं होता।

सर्किट ने देखा कि हॉस्पिटल में पढ़ाई के दौरान भाई को चीरने के लिए डेड बॉडी नहीं मिल रही है तो वह बोरी में भरकर जिंदा आदमी ले आया-- लो भाई एकदम बिंदास चीरो। क्या हम देशवासी अपने प्यारे नेता के लिए सर्किट नहीं बन सकते? माना कि एटीएम की लाइन में खड़े 200 लोगो ने अपनी बॉडी दी। लेकिन इतने बड़े देश के लिए 200 लोगो की जान की क्या कीमत?

यह सरकार पॉलिसी ड्रिवेन है। स्कीम बनाकर मारती है। कांग्रेस यूं ही खेल -खेल में मार देती थी और कहती थी, अपने आप मर गये जी हम क्या करें? अपन तो हमेशा से पॉलिसी वालों के साथ हैं, जो भी करो स्कीम बनाकर करो। चलो देशवासियों सर्किट बन जायें। एक स्कीम फेल हो गई तो क्या हुआ अगली कामयाब ज़रूर होगी। बोले तो नोटबंदी के बाद इंडिया अब वोटबंदी मांगता है।


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