'जब रमेशजी ने कहा था, मालिकों की फ़ोटो छापने से अख़बार नहीं बिकता...'

Wednesday, 12 April, 2017

अभिलाष खांडेकर

वरिष्ठ पत्रकार ।।

रमेशजी से मेरे सम्बंध क़रीब 20-25 साल पुराने थे, उस समय जब मैं फ़्री प्रेस जर्नल छोड़ कर इंदौर से भोपाल में हिन्दुस्तान टाइम्स का अविभाजित मध्य प्रदेश का ब्यूरो चीफ़ बना था। इंदौर में बंबई का फ़्री प्रेस और भोपाल का दैनिक भास्कर दोनो अख़बार लगभग एक साथ 1983 में शुरू हुए थे जिससे रमेशजी के नाम की धूम मची थी सारे हिन्दी पत्रकार जगत में। तब तक भास्कर सिर्फ़ राजधानी भोपाल का ही अख़बार माना जाता था। किंतु मालवा की बुलंद आवाज़ 'नईदुनिया' से कोई टक्कर लेने का साहस, वह भी उसके घर में घुसकर, कर सकता है इस पर किसी का भी सहसा विश्वास नहीं था। वो काम रमेशजी ने सफलता पूर्वक कर दिखाया था और सभी दूर नए परचम लहरा दिए थे। 24X7 टीवी का वो ज़माना नहीं था, सो अख़बारों के जलवे थे और रमेशजी का अपना जलजला!

मैंने भास्कर समूह में 2005 में प्रवेश किया, बारस्ता बंबई में शुरू हुए अंग्रेज़ी डीएनए से। तब से मैं रमेशजी के निकट आया और उनकी कार्य प्रणाली क़रीब से देखी। निश्चित ही वें एक पत्रकार नहीं थे, सम्पादक भी नहीं थे किंतु समाचारों की उनकी समझ और सामाजजिक बदलाव के प्रति सजगता कमाल की थीं। हिन्दी, अंग्रेज़ी, गुजराती और मराठी भाषाओं में दैनिक भास्कर के कई संस्करण प्रकाशित होते चले गये, 1983 की इंदौर की सफलता के पश्चात, उन सभी के पीछे रमेशजी की सूझबूझ, मेहनत और जोखिम लेने की तैयारी ही मूल कारण थे। युवा बेटे सुधीरजी को साथ लेकर 1983 से जो झंडे उन्होंने अलग-अलग राज्यों में गाड़े वह पत्रकारीता का अद्भुत इतिहास बन गया है।

पहलें मैं भोपाल में मध्य प्रदेश राज्य का सम्पादकीय प्रमुख रहा (2006-2011) और बाद में महाराष्ट्र राज्य में दिव्य मराठी की धूरा मैंने सम्भाली (2011-2014) जिसके चलते मैं रमेशजी को और क़रीब से जान पाया। मैं बिना लाग लपेट के कह सकता हूं की सम्पादकीय मामलों में वे रुचि ख़ूब लेते थे लेकिन ग़ैर ज़रूरी हस्तक्षेप बिलकुल नहीं करते। एक बढ़िया वाक़या याद आता है.... हमारे नासिक संस्करण का प्रकाशन हुआ तो एक स्थानीय बड़े धर्मगुरु रमेशजी से मिलने और बधाई देने आयें, फ़ोटो आदि हुआ। शाम को मेरे टेबल पर वह फ़ोटो छपने के लिये भेजा गया। मैंने छपने से रोक दिया। लेकिन नासिक के नए संपादक और अन्य साथियों को लगा कि चेयरमेन साहब का फ़ोटो है तो छपना ही चाहिये। दूसरे दिन फ़ोटो नहीं छपा। किसी ने उन्हें बाद में बताया होगा। अगले जलगांव संस्करण के प्रकाशन के ठीक पूर्व एक सम्पादकीय बैठक में उन्होंने याद रखकर कहा कि मालिकों की फ़ोटो छापने से अख़बार नहीं बिकता यह बात अभिलाष को मालूम है, वे मेरी और अख़बार की नीतियों को समझते हैं इसलिए ऐसे निर्णय वें ही लें सकते है।

उसी जलगांव लॉन्च के समय जब राजनेताओं से मांग उठी की भास्कर चुनाव के पैकेज ना मांगे, तो रमेशजी ने तत्काल स्टेज पर से ही 'नो पेड न्यूज़ ' की घोषणा सारे समूह के लिए कर दी एवं सभी उपस्थितिगणों को आश्चर्यजनक सकते में डाल दिया। एक वर्ष बाद जब पंजाब में चुनाव हुए (2012) तब समूह ने खुले आम पेड न्यूज़ न लेने के अपने निर्णय को सार्वजनिक रूप से, तमाम आर्थिक आकर्षणों के बावजूद, लागू रखा।

रमेशजी एक बहुत ही मिलनसार, साधारण व्यक्ति थे। इतने बड़े समूह के अध्यक्ष होने पर भी उनमें अहंकार कभी नहीं रहा। वे अपनी बेबाक़ी के लिए भी परिचित थे। हमेशा नई सोच को प्रमुखता देना, सम्पादकों को समाज में घुलने मिलने के बारे प्रोत्साहित करना ये रमेशजी की ख़ूबियां थीं। वे राष्ट्रीय राजनीति की काफ़ी समझ रखते थे और बड़े-बड़े राजनेताओं से उनके निजी सम्बंध थे किंतु अख़बार में उसकी परछाईं नहीं दिखाई पड़ती थीं। मेरे दैनिक भास्कर के लम्बे सम्पादकीय कार्यकाल में सिर्फ़ एक ही बार रमेशजी ने मुझे किसी मुख्यमंत्री की तस्वीर और ख़बर छापने के लिये कहा था।

हिन्दी अख़बार जगत के लिए रमेशजी का यूं अचानक चले जाना दर्दनाक है। एक दमदार और दिलदार मालिक की कमी हिन्दी पत्रकारिता की दुनिया को लम्बे समय तक सालती रहेगी। विनम्र श्रद्धांजलि।

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