...तब भांड की भूमिका निभाने लगता है मीडिया, बोले वरिष्‍ठ पत्रकार एन.के. सिंह

...तब भांड की भूमिका निभाने लगता है मीडिया, बोले वरिष्‍ठ पत्रकार एन.के. सिंह

Wednesday, 07 March, 2018

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

दुबई के एक होटल में फिल्‍म अभिनेत्री श्रीदेवी की बाथटब में डूबकर हुई मौत के बाद जिस तरह से मीडिया में मामले की रिपोर्टिंग की गईउसे लेकर तमाम तरह के सवाल उठ रहे हैं।

समसामयिक और ज्वलंत मुद्दों पर बहस आधारित 'डीडी न्‍यूजके कार्यक्रम 'दो टूकमें चैनल के वरिष्ठ प्राइम टाइम एंकर और स्पेशल करेसपॉन्‍डेंट अशोक श्रीवास्तव का कहना था कि जिस तरह से मीडियाखासकर हिन्‍दी टेलिविजन मीडिया ने इस मामले में रिपोटिंग की हैउससे लोगों में गम व गुस्‍सा तो है हीकई लोग मीडिया का मजाक बनाने से भी नहीं चूक रहे हैं। उनका कहना था कि सोशल मीडिया पर श्रीदेवी तो ट्रेंड कर ही रहीं थींएक और हैशटैग 'न्‍यूज की मौतभी काफी चर्चाओं में रहा।  

'श्रीदेवी की मौत पर मीडिया रिपोर्टिंग- गैरजिम्‍मेदारानासनसनीखेज या शर्मनाकविषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में जाने-माने पत्रकार व 'ब्रॉडकास्‍ट एडिटर्स एसोसिएशन' (बीईए) के पूर्व महासचिव एन.के.सिंहमीडिया विश्‍लेषक डॉ. शुभि चतुर्वेदी और मीडिया आलोचक व हिन्‍दी वेबसाइट 'समाचार4मीडियाके संपादकीय प्रभारी अभिषेक मेहरोत्रा शामिल रहे।

कार्यक्रम में एन.के. सिंह का कहना था कि ब्रॉडकास्‍ट एडिटर्स एसोसिएशन तकरीबन नौ साल से कंटेंट को लेकर सेल्‍फ रेगुलेशन कर रहा है, लेकिन इतने वर्षों वाद आज वह खुद को पहली बार शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं।  उनका कहना था कि इस मामले में रिपोर्टिंग को देखकर इतनी मायूसी हुई है कि नौ साल में क्‍या आज हम यही हासिल कर पाए हैं और बौद्धिक दिवालियापन, इंटलैक्‍चुअल बैंकरप्‍सी का, बौद्धिक दिवालियापन का इससे बड़ा कोई और उदाहरण शायद कभी नहीं हो सकता है।

एन.के.सिंह के अनुसार, 'मैं मानता हूं कि श्रीदेवी बहुत बड़ी स्‍टार थीं और जब वैल्‍यू टूटते हैं तब भी हम दिखाते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि जब तक मौत सनसनीखेज रहीतब तक इस मामले पर इस तरह की रिपोटिंग पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन जब जांच के बाद दुबई से लेटर आ गया कि इसमें सनसनीखेज जैसा कुछ बात नहीं है तो फिर पूरे दिन इस तरह से मामले की कवरेज करना मैं किसी भी दृष्टि से सही नहीं समझता हूं और यह मानसिक दिवालियापन से ज्‍यादा नहीं हो सकता है।

कार्यक्रम के दौरान जब यह सवाल उठा कि लोग देखना चाहते हैंइसलिए मीडिया दिखा रहा हैजिस पर एनके सिंह का कहना था 'public interest is not what people are interested in'। जनता कई बार फूहड़ अथवा घटिया कार्यक्रम को देखने में इंटरेस्‍ट दिखा सकती है तो क्‍या हम लोगों को वो दिखाएंगे। एनके सिंह ने कहा कि यदि हम ये सब कार्यक्रम दिखाने लगे तो मीडिया संविधान के अनुच्‍छेद 19 (1)(ए)  के तहत जो स्‍वतंत्रता मिली है और मौलिक अधिकार मिले हैं, वह खत्‍म हो जाता है। एन.के.सिंह के अनुसार, 'ऐसा करने पर तब मीडिया नहीं रह जाता है बल्कि वह एक भांड बन जाता है। तब मीडिया नहीं रहता बल्कि वह भंडैती करने लगता है।

यदि इसे एंटरटेनमेंट के नाम पर दिखाया जा रहा है तो न्‍यूज का सम्‍मान छोड़ देना चाहिए। मीडिया को साफ कह देना चाहिए कि वे तो नाच-गाने वाले हैं, जिसमें लोग इंटरेस्‍टेड होंगे हम तो वो दिखाएंगे लेकिन इस तरह की चीजों को न्‍यूज के नाम पर नहीं परोसना चाहिए बल्कि न्‍यूज की गरिमा को बने रहने देना चाहिए। लेकिन हमारा मुकाम बिल्‍कुल अलग है। हमारे संविधान में 19 ए के तहत जो अधिकार मिले हैं, उनमें फ्रीडम ऑफ एक्‍सप्रेशन है और यह फ्रीडम औफ प्रफेशन नहीं है। फ्रीडम ऑफ प्रफेशन में तो अनुच्‍छेद 19 (6) में पब्लिक इंटरेस्‍ट की चीजों को सरकार डिसाइड करती है।

लेकिन अब यदि न्‍यूज की बात करें तो अनुच्छेट 19 (2)के अनुसार मीडिया पर कुछ प्रतिबंध भी लगाए गए हैं। उसमें कहीं पर भी पब्लिक इंटरेस्‍ट को सरकार डिसाइड नहीं करती है और यही न्‍यूज और एंटरटेनमेंट को अलग करती है।

अभी कुछ दिनों पहले भ्रष्‍टाचार की इंडेक्‍स को मीडिया ने बिल्कुल नहीं दिखाया था। इसी तरह सरकार के तमाम प्रोजेक्‍ट्स आए जिसे लेकर किसानों में और जनता में कोई जानकारी नहीं दी गई है। तो क्‍या जनहित योजनाओं की जानकारी लोगों को देना भी क्‍या मीडिया का कर्तव्‍य  नहीं है।एन.के.सिंह का स्‍पष्‍ट कहना था कि यदि मीडिया को भांडगीरी ही करनी है तो उसे खुद को एंटरटेनमेंट कहना चाहिए न कि न्‍यूज के नाम पर ऐसी घटिया रिपोर्टिंग करनी चाहिए। नहीं तो जो सम्‍मान हम संपादक के रूप में लेते हैंकल से वह खत्‍म हो जाएगा।

कार्यक्रम के दौरान यह भी मुद्दा उठा कि हाल ही में उत्‍तरपूर्व के तीन राज्‍यों में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान मीडिया ने इसकी कवरेज को उतना महत्‍व नहीं दियाजितना देना चाहिए था। इस बात पर ही एन.के. सिंह ने सहमति जताई।

वहींअभिषेक मेहरेत्रा का कहना था श्रीदेवी की मौत को लेकर जिस तरह मीडिया ने रिपोर्टिंग कीवह अतिवादिता है और यह गैरजिम्‍मेदाराना रिपोर्टिंग हैउन्होंने कहा कि आज बड़ा चैनल चला रहा था 'सबसे बड़ी श्रद्धांजलि'। उन्‍होंने कटाक्ष करते हुए व्‍यंग्‍यात्‍मक लहजे में कहा, 'यह मैंने आज ही सीखा है कि श्रद्धांजलि छोटी और बड़ी भी होती है। हो सकता है कि बड़े फूल से दी जाए तो बड़ी और छोटे फूल वाली छोटी श्रद्धांजलि होती होगी।'

उनका कहना था कि इस तरह की मीडिया रिपोर्टिंग से बचने की जरूरत है। उन्‍होंने कहा कि हिन्‍दी ही नहींअंग्रेजी के चैनलों ने भी इस खबर को लेकर गैरजिम्‍मेदाराना रिपोर्टिंग की।

उन्‍होंने नाम लिए बिना अंग्रेजी के दो बड़े चैनलों के बारे में कहा कि इन्‍होंने भी इस पर सबसे ज्‍यादा कवरेज की। यही नहींअंग्रेजी के अखबार भी संवेदना  से परे खबरें ब्रेक करने में पीछे नहीं रहे।

अभिषेक मेहरोत्रा के अनुसारदुबई के अखबार 'गल्‍फ न्‍यूजका कहना था कि उनके पास जो रिपोर्ट आई थीवह बंद थी लेकिन उससे पहले ही भारत में अंग्रेजी के एक बड़े अखबार के रिपोर्टर ने वह रिपोर्ट मं क्या-क्‍या है ये भी बता डालाजबकि ऑफिसियली रूप से उस रिपोर्टर की स्टोरी के तीन घंटे बाद वह रिपोर्ट खोली गई थी। उन्‍होंने कहा कि यह समझने की जरूरत है कि यह हिन्‍दी और अंग्रेजी की बात नहींबल्कि मीडिया का मेलोड्रामा हैजो इन दिनों हो रहा है। हमें ये भी देखना होगा कि आखिर ये हो क्‍यों रहा है। हम हमेशा यह कहते हैं कि दर्शक देखते हैंइसलिए मीडिया दिखाता है लेकिन जब उन्‍होंने कई दर्शकों से बात की तो पता चला कि वही दर्शक वर्ग मीडिया का मजाक उड़ा रहा है और वही वर्ग मीडिया पर इस खबर को देख भी रहा है।

कार्यक्रम में डॉ. शुभि चतुर्वेदी का कहना था कि श्रीदेवी बहुत बड़ी स्‍टार थीं और हम सबका बचपन उन्‍हें देखते हुए गुजरा है। इसलिए जब लोगों को उनकी मौत की खबर मिली तो उनके अंदर इस बारे में हर चीज जानने की बहुत उत्‍सुकता थी कि आखिर ऐसा कैसे हो गया। लेकिन जिस तरह से मीडिया ने कवरेज की उसे शर्मनाक ही कहा जाएगा।

डॉ. शुभि का कहना था कि जहां तक सवाल उठाने का प्रश्‍न हैवहां तक तो ठीक है लेकिन जहां तक टीआरपी की बात उठती है तो मीडिया कोई डांस प्रोग्राम या एसी कोई चीज नहीं हैजिसमें लोगों की मांग के अनुसार वैसी खबरें दिखाएंगे। मीडिया समाज का दर्पण होता हैजिसकी न्‍यूज वैल्‍यू होगीउसे हमेशा उसी हिसाब से दिखाया जाना चाहिए। यदि किसी मामले में मीडिया को इंवेस्‍टिगेट करने की जरूरत होती हैवहां एक तरीका होता है। इलेक्‍ट्रोनिक अथवा प्रिंट मीडिया ने जिस तरह से इस मामले रिपोर्टिंग की हैउसे किसी तौर पर पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता है।

उन्‍होंने कहा कि आज के समय में अच्‍छे एडिटर्स और एंकर का अभाव सा लगता है जो मुद्दे को समझेंउसका विश्‍लेषण करें और फिर खबर बनाकर दिखाएं। उनका कहना है कि मीडिया को आत्‍ममंथन की जरूरत है और जो लेंस हम हर जगह दिखाते हैंपहले अपने ऊपर डालने की जरूरत है।

अशोक श्रीवास्‍तव ने यह जानना चाहा कि उसी दिन दो और बड़ी घटनाएं हुई थीं। एक तो बिहार में भाजपा नेता की गाड़ी से नौ बच्‍चे कुचल गए थेदूसरा शंकराचार्य का निधन हुआ था लेकिन मीडिया ने इन खबरों को व्‍यापक कवरेज नहीं थी। जबकि कई चैनल ये चला रहे थे कि 'मौत का बाथटबया एक चैनल पर चल रहा था कि 'श्रीदेवी के आखिरी 15 मिनट बाथटब मेंदेखिए हमारे साथ शाम सात बजे तो क्‍या यह सही था?

इस सवाल के जवाब में एन.के.सिंह का कहना था कि उन्‍हें इस बात पर ज्‍यादा आपत्ति है कि इस मामले में पत्रकारीय सिद्धांतों को ताक पर रख दिया गया।'श्रीदेवी के आखिरी 15 मिनट बाथटब मेंकी बात करते हुए एन.के.सिंह ने यह भी सवाल उठाया कि आखिर चैनल के पास ऐसा कौन सा तथ्‍य था जो उन्होने वास्‍तव में लोगों को दिखाया। उन्‍होंने कहा कि होता ये है कि झूठ बोला जाता है और चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर इसलिए पेश किया जाता है ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग उसे देखें। जबकि प्रतिस्‍पर्द्धी चैनल इसके जवाब में ये लिखता है कि 'अंतिम एक मिनट में क्‍या हुआये देखिए। जैसे कि उसने मौत के समय कैमरा लगा रखा हो। एन.के.सिंह के अनुसारउस चैनल के पास दरअसल ऐसी कोई जानकारी होती भी नहीं है लेकिन चूंकि उसे टीआरपी बटोरनी है,इसलिए इस तरह गैरजिम्‍मेदाराना रिपोर्टिंग की जाती है जो किसी भी तरह से ठीक नहीं है। इससे मीडिया की क्रेडिबिलिटी लगातार नीचे आ रही है। उन्‍होंने कहा कि चैनलों को लगता है कि इस तरह की हरकत करने से लोग उसे देखेंगे लेकिन धीरे-धीरे जब चैनल की विश्‍वसनीयता घटने लगेगी तो लोग उसे देखना बंद कर देंगे। उन्‍होंने कहा कि हमारा जो मुकाम रहता था, समाज में मीडिया की जो भूमिका गाइड के रूप में होती थीताकि वह सही रास्‍ता दिखा सकेलेकिन वह धीरे-धीरे खत्‍म होती जा रही है।

उन्‍होंने कहा कि अभी बिहार में भाजपा नेता की गाड़ी से बच्‍चे कुचले जाने की चर्चा हुई। हो सकता है कि बिहार में बच्‍चे कुचले जाने की तुलना में श्रीदेवी की मौत को लेकर उठे सनसनीखेज सवालों को ज्‍यादा लोग देखना चाहें। सुप्रीम कोर्ट का उदाहरण देते हुए उन्‍होंने कहा कि जब भी वहां से फांसी की सजा सुनाई जाती है तो ऐसे मामलों में हत्‍याओं की संख्‍या नहीं बल्कि रेयरेस्‍ट ऑफ रेयर देखा जाता है। उन्‍होंने कहा कि इसकी परिभाषा दरअसल यह है कि जो बात समाज की सामूहिक संवेदना (Collective Consciousness) झकझोर देती है, वही फांसी का सबब बनती है। हो सकता है कि मीडिया ने भी इसे हाईप्रोफाइल होने की वजह से इतना दिखाया हो लेकिन जब दुबई प्रशासन ने स्‍पष्‍ट कर दिया कि इस मामले में संदिग्‍ध जैसा कुछ भी नहीं है तो फिर मामले को वहीं शांत कर देना चाहिए था और बेवजह इतनी व्‍यापक कवरेज देने का कोई औचित्‍य नहीं था। 

एन.के.सिंह का मीडिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे पहले एक मेजर शहीद हुआ थातब मीडिया ने क्‍यों नहीं इतनी कवरेज की। क्‍यों नहीं जनाजे को इतनी बार दिखाया गया। अशोक श्रीवास्‍तव का भी यह कहना था कि जब शहीद मेजर की पत्‍नी अपने छोटे बेटे के साथ मुखाग्नि देने जा रही थी तो वह तस्‍वीर भी सिर्फ सोशल मीडिया पर दिखाई दी। किसी चैनल या अखबार ने उसे नहीं दिखाया।

इस पर एन.के.सिंह का कहना था कि सोशल मीडिया इन दिनों फॉर्मल मीडिया से ज्‍यादा बेहतर कर रहा है। एन.के.सिंह ने यह भी कहा, 'मेरे ख्‍याल से अभिषेक जो करते हैं वह फॉर्मल मीडिया की तुलना में ज्‍यादा संजीदा है। आज हमें दोबारा से आकलन करना पड़ेगा कि आखिर हम कर क्‍या रहे हैं और शायद नौ साल को कंटेंट को बेहतर करने की जो हमारी कोशिश थीऔर मुझे लगता था कि काफी सुधार हुआ हैलेकिन इस घटना से मुझे पहली बार इतनी जोर का झटका लगा है और मेरी नजर में यह इंटलेक्‍चुअल बैंकरप्‍सी का सबसे बडा उदाहरण है।

उन्‍होंने कहा कि अभी बजट आया था, जिसमें पॉलिसी के साथ बहुत सारी चीजें आई थीं लेकिन बजाय उसको दिखाने के चार दिन से मीडिया ने इस खबर को तानकर रखा। कल को हो सकता है कि अमिताभ बच्‍चन यदि श्रीदेवी के घर जाएं तो मीडिया फिर शुरू हो जाए।

मीडिया के इस गैरजिम्‍मेदाराना रवैये के लिए आखिर कौन जिम्‍मेदार हैकार्यक्रम में यह सवाल उठाने पर डॉ. शुभि चतुर्वेदी का कहना था, 'पिछले दिनों श्रीदेवी की मौत को लेकर मीडिया ने जिस तरह की रिपोर्टिंग की हैउसमें शर्म से ज्‍यादा मुझे घबराहट होती है। यह घबराहट इसलिए है कि यदि आप अपने आप पर अंकुश नहीं लगाएंगे तो फिर सरकार अंकुश लगाती है। उन्‍होंने कहा कि चाहे संसद पर आतंकी हमला होअथवा मुंबई में हुआ हमलादरअसल यह एक होड़ है कि खुद को सबसे आगेसबसे पहले और सबसे तेज साबित करने की। इसमें जो लोग दर्शकों पर आरोप लगाते हैं कि वही इस तरह का कंटेंट देखना चाहते हैं तो मेरी नजर में ये बात सही नहीं है और दर्शकों को इससे दूर रखना चाहिएन ही उन पर इस तरह के आरोप लगाने चाहिए। जब भी मीडिया की स्‍वतंत्रता आदि को लेकर सवाल उठे हैं और इन पर किसी तरह का खतरा महसूस हुआ हैहम सब सबसे आगे खड़े रहे हैं और खड़े होते रहेंगे लेकिन अधिकार हमारे हाथ से तब छिन जाते हैं जब हम इस तरह की हरकतों को टीआरपी की होड़ के चलते अमलीजामा पहनाते हैं। प्रजातंत्र में मीडिया हमेशा दर्शकों की नाक-कान-आंख होता है लेकिन जितनी पॉवर मिलती हैउतनी जिम्‍मेदारी भी आती हैमीडिया को भी यह बात भली भांति समझनी चाहिए।'

'दो टूकमें एक सेलिब्रिटी के ट्वीट का मुद्दा भी उठा कि दरअसल मीडिया के लोग मुफ्तखोर हो गए हैं। क्‍योंकि इस तरह की स्‍टोरी में कंटेंट तैयार करने के लिए कुछ रिसर्च नहीं करना पड़ता, बस कुछ फिल्‍मों के सीन ले लेंकुछ गाने ले लेंएक बाथटब बना लें और एक एंकर को खड़ा कर देंजो आपके सामने एक काल्‍पनिक कहानी पेश करेगा कि आखिर हादसा कैसे हुआ और कैसे श्रीदेवी की मौत हुईतो इसमें कंटेंट तैयार करने में पैसा भी नहीं लगता है। आखिर क्‍या ये बात सही हैक्‍या ये सुविधा की बात हैमार्केट का असर है अथवा इसके लिए कौन जिम्‍मेदार हैअशोक श्रीवास्‍तव का यह भी कहना था कि क्‍या हम ये मान सकते हैं कि टेलिविजन मीडिया में एडिटर्स और एंकर की भूमिका बहुत कम रह गई है। मार्केटिंग और बाजार बहुत ज्‍यादा हावी हैइसलिए हम इस तरह की चीजें ज्‍यादा दिखाते हैं ?

इस पर अभिेषेक मेहरोत्रा का कहना था, 'इस तरह की जब भी कोई घटना होती है तो उसके लिए अकेला एंकर ही दोषी नहीं होता है। कई एंकर के मेरे पास फोन आए हैं जो कह रहे हैं कि सोशल मीडिया पर वे अकेले ट्रोल हो रहे हैं। हमने भी उन पर आर्टिकल लिखे हैं। मेरा कहना है कि उनके ऊपर भी बॉस होते हैं और एडिटर होते हैं। इसलिए मेरा कहना है कि इस तरह की रिपोर्टिंग के लिए एडिटर को भी ट्रोल करना चाहिए। सिर्फ एक एंकर को टार्गेट करना ठीक नहीं है। चूंकि एंकर सॉफ्ट टार्गेट होते हैं,इसलिए लोग उन्‍हें आसानी से निशाने पर ले लेते हैं। यदि हम मार्केट की बात करें तो मेरा ये कहना है कि चाहे वो राम-रहीम की हनीप्रीत का मामला हो अथवा राधे मां का मेलोड्रामाहम हमेशा इस तरह की चर्चाएं करते हैं। बड़े-बड़े संपादकबड़े-बड़े सेमिनार में जाकर इस तरह की चर्चा करते हैं। लेकिन होता वही हैशाम छह बजे सब वही करेंगे। मेरा कहना है कि जब तक आपका ऐड रेवेन्‍यू टीआरपी पर निर्भर रहेगाये चलता रहेगा। इसलिए सोचना होगा कि ऐड रेवेन्‍यू सिर्फ टीआरपी से प्रभावित न हो।वहींडॉ. शुभि ने कहा कि पब्लिक ब्रॉडकास्‍टर्स को और मजबूती प्रदान करनी ही होगी। जितने भी जटिल मुद्दे और जनहित के मुद्दे दूरदर्शन पर दिखाई देते हैं। ऐसे में अन्‍य चैनलों को भी आगे आना होगा। जो कंपनियां विज्ञापन देती हैंउनके लिए भी यह सोचने का सवाल है कि यदि वह कोई ऐसा कदम उठाएं कि मुझे इस चैनल पर अपने प्रॉडक्‍ट का विज्ञापन नहीं करना है क्‍योंकि इसकी वैल्‍यू और सिद्धांत मेरे ब्रैंड से मेल नहीं खाता है तो इससे काफी कुछ बदलाव आएगा। एडिटर्स को भी इसके बारे में सोचना होगा और किसी न किसी को यह कदम उठाना ही पड़ेगा।।'

वहीं एन.के.सिंह का कहना है कि लोग एंकर को सभी बातों के लिए जिम्‍मेदार मानते हैंक्‍योंकि वही चैनल का फेस होता है लेकिन हकीकत में एंकर बहुत ही छोटा मोहरा होता है। निर्णय एडिटर लेते हैं। दुर्भाग्‍य से हमारे देश में एडिटर्स का ज्ञान और संवेदनाएं सीमित है।

एन.के.सिंह का कहना थाआज के कई एडिटर्स की तालीम और नई चीजों पर उनकी पकड़ उतनी नहीं है। ऐसे में जानकारी की कमी और समझ की वजह से आजकल के कई एडिटर न्‍यूजरूम में इस बात को लेकर निर्णय लेते हैं कि सोशल मीडिया पर क्‍या चल रहा है। इसलिए इस तरह क बातें होती हैंनहीं तो इन चार दिनों में देश में बहुत कुछ हुआउसे दिखाने की बजाय इस कवरेज पर ज्‍यादा ध्‍यान दिया और कम खर्च में काम निपटा लिया।'

उनका कहना था कि यदि हम रियल न्‍यूज कवरेज करते हैं तो औसतन एक मिनट की कवरेज में 50 हजार रुपये खर्च होते हैं लेकिन इस तरह की कवरेज में आठ घंटे में मुश्किल से दो-चार लाख रुपये खर्च हुए होंगे। उन्‍होंने कहा कि आप लोगों को भावनात्‍मक स्‍टोरी दिखाकर आकर्षित तो कर सकते हैं लेकिन इससे चैनल की जो गरिमा गिरती हैउस पर वे ध्‍यान नहीं देते हैं।

यह पूछे जाने पर कि एंकर कई बार बड़े अजीब और उल्‍टे-सीधे सवाल करते हैंतो क्‍या ऐसे बेतुके सवालों के लिए एक हद तक एंकर जिम्‍मेदारी नहीं हैंअभिषेक मेहरोत्रा का कहना था, 'जिस तरह से न्‍यूज रूम में एक धारणा होती है कि खबर से खेलेंगे,पर कई बार ऐसा करते हुए ये लोग भूल जाते हैं कि विश्‍लेषण करते हुए कब उनका मजाक बन रहा है। इसलिए एंकर को भी सोचना होगा कि उन्‍हें क्‍या कहना चाहिए और क्‍या नहीं। आजकल ये खूब चल रहा है कि सोशल मीडिया पर क्‍या चल रहा है वहां से कॉपी किया और चला दिया। हम ये नहीं कहते कि सोशल मीडिया मत देखिए लेकिन हमें ये भी सोचना होगा कि सोशल मीडिया पर कई जानकारी फर्जी होती हैं। एंकर से मेरा यही कहना है कि यदि आपको विषय की पूरी जानकारी नहीं है तो बेतुके सवाल नहीं पूछने चाहिए।'

उन्‍होंने कहा कि हम यहां पर मीडिया की जिस तरह से आलोचना कर रहे हैंयह पहली बार नहीं हो रहा है लेकिन मेरा यही कहना है कि सेल्‍फ रेगुलेशन हम करते नहीं है और सरकारी रेगुलेशन हम चाहते नहीं हैं ऐसे में बीईए और एनबीए जैसे संगठनों पर भी सवाल उठ रहा है कि आखिर वे करते क्‍या हैं।

सेल्‍फ रेगुलेशन के सवाल पर डॉ. शुभि ने कहा, 'हमारे पास यही एक विकल्‍प है। हमें ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि पत्रकारिता की मर्यादा मीडिया के हाथ में है।वहींएन.के.सिंह ने कहा कि मीडिया को कोई सरकार नियंत्रित करेइसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता है। लेकिन हमें अपनी जिम्‍मेदारी समझनी होगी। सिर्फ एक घटना की वजह से हम ये नहीं कह सकते हें बीईए और एनबीए काम नहीं कर रहे हैं। सेल्‍फ रेगुलेशन हो रहा है। यह नौ साल में पहली बार हो रहा है और इसकी दिशा में हम आवश्‍यक कदम उठा रहे हैं। कोशिश करेंगे कि फिर से इस बारे में चैतन्‍यता प्राप्‍त करें।

उन्‍होंने सरकार को भी धन्‍यवाद दिया कि सरकार ने इस मामले में हस्‍तक्षेप करने की कोशिश नहीं की।

आखिर में कार्यक्रम में यही बात निकलकर आई कि मीडिया की जिम्‍मेदारी बहुत बड़ी हैसंपादकों और एंकर की भी ये जिम्‍मेदारी है कि वह किस तरह का कंटेंट परोस रहे हैं और किस तरह से वे अपने लिए सेल्‍फ रेगुलेशन कर सकते हैं। यह बहुत जरूरी है और इस घटना के बाद यह साबित हो चुका है। हालांकि इससे पहले ही इस तरह की कई घटनाएं हो चुकी हैं लेकिन अब लग रहा है कि पानी सिर के ऊपर जा रहा है। इसलिए कहीं न कहीं एक मर्यादा की लकीर खींचनी पड़ेगी।

 



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