पत्रकार है तो इसको शेयर जरूर कीजिए, शायद जग जाए सरकार!

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Monday, 06 November, 2017

भूपेंद्र प्रतिबद्ध

वह पीड़ा पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही जो उस दिन एक रिटायर्ड पत्रकार साथी ने एक समारोह में अपने संबोधन के दौरान व्यपक्त  की थी। उनका कहना था कि जिन्द्गी का ताकत और ताजगी वाला वक्त  तो कठोर श्रम से जीविका कमाने, अखबार को नई-नई, अलग तरह की, सबके पक्ष की, सबकी रुचियों की स्टो्रियों से सजाने-संवारने में गुजार दिया। तब इलहम ही नहीं था कि एक वक्तई वह भी आएगा जब रिटारमेंट हो जाएगा। संगी सहकर्मी फेयरवेल पार्टी दे देंगे और मैनेजमेंट हिसाब-किताब करके अपने रजिस्टतर से मेरा नाम उड़ा देगा। फिर सताएगी शेष जीवन की गाड़ी को चलाने की चिंता। जीना कब तक है यह कोई नहीं जानता, लेकिन सांस चलाने-चलते रहने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है जो भोजन से मिलती है। इस भोजन का प्रबंध करने के लिए ही पेंशन की दरकार होती है, जो पत्रकारों को आम तौर पर उपलब्धह नहीं होती। जिन थोड़े लोगों को उपलब्धन होती भी है तो वह ऊंट के मुंह में जीरे से भी कम होती है।

 मेरे सरीखे तमाम पत्रकार हैं जो उम्र की उस दहलीज पर हैं जहां से जीविकोपार्जन की ढलान शुरू होती है। जीविका कमाने की अनेक शर्तों को पूरा करने की क्षमता जवाब देने को उतावली हो गई है। किसी पर आश्रितता बढ़ती जा रही है। जीवन की गारंटी देने वाली इनकम ने बॉय-बॉय कर दिया है। स्वाउलंबन परिहास करने लगा है। अपनी सीमित जरूरतें पूरी करने के लिए किसी के आगे हाथ फैलाना, किसी अपराध से कम नहीं लगता है। इससे मुक्ति के लिए पेंशन ही सबसे प्रभावी, कारगर जरिया है। पेंशन ही वह एकमुश्ता धनराशि है जिससे भोजन के अलावा दूसरे दुख-संकट-समस्या  के निदान में मदद मिलती है।

   उत्त‍र भारत में हरियाणा एकमात्र राज्य  है जहां की सरकार ने पत्रकारों के लिए पेंशन स्कीिम शुरू की है। चंद दिनों पहले आरंभ हुई इस योजना के तहत उन रिटायर्ड पत्रकारों को 10 हजार रुपए मासिक पेंशन मिलेगी जो राज्यस सरकार में मान्यैता प्राप्तई हैं या कम से कम पांच साल तक मान्यंता प्राप्ता रहे हैं। इसके लिए उम्र सीमा 60 वर्ष और इससे ऊपर है। साथ ही एलिजबल पत्रकारों को अपने प्रोफेशन में 20 साल पूरा कर लिया होना चाहिए। इसके अलावा ऐसे पत्रकारों को 10 लाख रुपए का इंश्यो रेंस कवर, 5 लाख रुपए कैशलेस मेडिक्लेरम पॉलिसी भी मुहैया होगी।

 हरियाणा सरकार की यह स्की,म बेहद सराहनीय है। इससे उम्रदराज पत्रकारों को बहुत सहारा मिलेगा। इस पेंशन धनराशि से जीवन की गाड़ी आराम से चलती रहेगी और शारीरिक कष्टै के उपचार के लिए मेडिक्लेुम रामबाण साबित होगा। लेकिन इस स्की म में केवल मान्यतता प्राप्ति पत्रकारों या कहें रिपोर्टरों को ही शामिल किया गया है और उन पत्रकारों को नहीं जिन्हेंी सरकार से मान्य‍ता नहीं मिली है। ऐसे पत्रकारों में रिपोर्टर तो हैं ही, बहुत बड़ी तादाद में ऐसे भी हैं जो सार्वजनिक रहे बगैर अखबार को निकालने, उसको पठनीय, सम्प्रेमषणीय बनाने में अनुपम भूमिका निभाते हैं। इन पत्रकारों को डेस्क् का पत्रकार कहा जाता है, जिनके समक्ष रिपोर्टर अपनी संग्रहीत सामग्री-खबरों का ढेर लगा देते हैं। उन खबरों को छपने-प्रकाशन लायक बनाने का मेहनती काम डेस्कर के पत्रकार ही करते हैं। इन पत्रकारों का भी कार्य- विभाजन होता है और उनको दी गई जिम्मेकदारी के हिसाब से उनका डेजिग्नेतशन होता है। ये पत्रकार एक तरह से गुमनामी में रहते हैं। अखबार कार्यालय से बाहर उनकी पहचान न के बराबर होती है, पर अखबार को आकार देने में उनका योगदान नीले गगन से भी ऊंचा-ज्याकदा होता है।

   ऐसे में सरकार से इनकी भी अपेक्षा होती है कि सरकार उन्हें  भी मान्य-ता प्राप्ता पत्रकारों को मिलने वाली, प्रदान की जानी वाली सुविधाओं के दायरे में लाए। उन्हेंा भी रिटायरमेंट के बाद पेंशन, इंश्योररेंस, मेडिक्ले म आदि की सुविधा प्रदान करे जिससे बढ़ती उम्र में गुजर-बसर करने का एक सहारा मिल जाए। हरियाणा सरकार की ताजा घोषित स्कीयम ने डेस्कं के पत्रकारों की उम्मी दों को पंख लगा दिए हैं। वे भी हरियाणा सरकार की ओर हसरत भरी निगाहों से देखने लगे हैं। वे भी चाहते हैं कि हरियाणा सरकार उनके प्रति भी दयावान हो, उदार हो। ढेरों रिटायर्ड डेस्कि जर्नलिस्टे ने हरियाणा सरकार से गुजारिश की है कि सरकार उन पर भी मेहरबान हो, उन्हें  भी पेंशन की सुविधा मुहैया कराने का कष्टह करे जिससे कष्टों  भरा उनका जीवन थोड़ा सहज हो सके।  

   बता दें कि देश के कई प्रदेशों मसलन केरल, कर्नाटक, बिहार, उत्तटर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, गोवा, अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश आदि में पत्रकारों के लिए पेंशन स्कीबम लागू की गई। पर पेंच वही है कि इस योजना का लाभ केवल मान्य ता प्राप्त  पत्रकारों को मुहैया होती है। पत्रकारों को पेंशन देने की मांग केंद्र सरकार के समक्ष भी उठाई गई है। ‘द प्रेस एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ और ‘इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्टम’ ने अतीत में केंद्र सरकार से मांग की थी कि मान्यदता प्राप्त  पत्रकारों को पेंशन देने की पॉलिसी बनाई जाए। साफ है, इन नेशनल पत्रकार संगठनों ने भी डेस्कं के पत्रकारों को इस मांग के दायरे में नहीं रखा। समय आ गया है कि देश भर के डेस्‍क जर्नलिस्टा आगे आएं और अवकाश प्राप्ति के बाद पेंशन के लिए अपनी मांगों को बुलंद करें।  




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