साहित्य की दुनिया में मच रही 'खलबली' पर सुधीश पचौरी की खरी-खरी... साहित्य की दुनिया में मच रही 'खलबली' पर सुधीश पचौरी की खरी-खरी...

साहित्य की दुनिया में मच रही 'खलबली' पर सुधीश पचौरी की खरी-खरी...

Tuesday, 08 August, 2017

हिंदी साहित्य में कुछ स्त्रीत्ववादी स्वर में भले सुनाई पड़ने लगे हों, लेकिन मर्दवाद अब भी समझता है कि जब तक कोई लेखिका किसी मर्द साहित्यकार से ‘सही’ नहीं करवाती, तब तक उसका लेखिका होना असंभव है. अगर फिर भी वह लेखिका हो जाती है, तो उसका चरित्र संदिग्ध है... हिंदी के बड़े अखबार प्रभात खबर के जरिए वरिष्ठ साहित्यकार सुधीश पचौरी ने अपनी कलम के जरिए साहित्य की दुनिया के कई 'धुरंधरों' को कुछ यूं आइना दिखाया है। आप प्रभात खबर में प्रकाशित उनका लेख नीचे पढ़ सकते हैं...

तीन किस्से और हजार मुद्दे

सुधीश पचौरी

टिप्पणीकार

कवयित्री अनामिका ने भारतभूषण अग्रवाल सम्मान के लिए एक युवा कवि को क्या चुन दिया कि हिंदी साहित्य के लंपटों को आग लग गयी. एक महिला को लेकर जितने लंपटिया कशाघात हो सकते हैं, वो किये गये.

पांच की ज्यूरी में वह अकेली महिला थीं. अगर कोई मर्द (ज्यूरी) किसी को चुनता, तो भी क्या यही कहा जाता कि वे हर शाम एक युवा कवि को अपने संग घर ले के जाता था... अच्छा हुआ कि कुछ युवा लेखकों-लेखिकाओं को यह बदतमीजी नागवार लगी. फिर गरमी इतनी बढ़ी कि लंपटाचार्य को फेसबुक से अपनी टिप्पणी हटानी पड़ी!

इसी तरह कुछ पहले एक ‘कवि-न-हो सके कवि-टाइप’ ने एक कवयित्री को लेकर फेसबुक पर लंपटगीरी शुरू की. कवयित्री ठहरी दबंग. जब पानी सिर से उतर गया, तो कवयित्री ने केस करने की धमकी दी. लंपटेश्वर जी की सारी कीचड़-उछाल बंद हो गयी!

तीसरी घटना पटना के प्रेमंचद समारोह में एक ‘सकूलर’ कवि के शामिल होने/ न होने को लेकर हुई है.पहली दो घटनाएं बताती हैं कि हिंदी साहित्य में बचा-खुचा मर्दवाद अब भी अपनी मर्दवादी ताल ठोकता रहता है, स्त्री-आखेट के लिए सोशल मीडिया को सबसे सही ठिकाना मानता है और वहीं से अपने ‘सेक्सिस्ट’ गोले दागता रहता है. 

हिंदी साहित्य में कुछ स्त्रीत्ववादी स्वर में भले सुनाई पड़ने लगे हों, लेकिन मर्दवाद अब भी समझता है कि जब तक कोई लेखिका किसी मर्द साहित्यकार से ‘सही’ नहीं करवाती, तब तक उसका लेखिका होना असंभव है. अगर फिर भी वह लेखिका हो जाती है, तो उसका चरित्र संदिग्ध है! 

अनामिका ने एक ज्यूरी के बतौर, कई कवियों की कविताओं में से एक कवि की एक कविता को उसी तरह चुना, जिस तरह अब तक ज्यूरी के पुरुष सदस्य चुनते रहे हैं.

पांच बरस पहले इसी अनामिका ने शायद अनुपम नामक एक युवा कवि की एक कविता को भारतभूषण सम्मान के लिए चुना था, तब किसी ने उनको लेकर कोई अभद्र टिप्पणी नहीं की थी, यद्यपि लंपटाचार्य तब भी थे!अभी उनको इतना कष्ट क्यों हुआ? इसका कारण है : ठेकेदारी! कल तक कुछ बड़े ठेकेदार होते थे, लेकिन सोशल मीडिया के सहारे कुछ नये लपके भी अपने ठेके चलाने के चक्कर में रहते हैं कि तय करें-कराएं कि कौन-सा सम्मान किसे, कब मिले? ऐसे में एक स्त्री किसी को सम्मान के लिए चुने और किसी ठेकेदार का चेला रह जाये, तो लेखिका से अपराध हुआ न! उसकी यह हिम्मत? अब निपटा देते हैं मेडम को! कर डालो चरित्र हनन!

अनामिका शालीन महिला हैं. अगर वह जरा भी टेढ़ी हो जाएं, तो लपंटाचार्य जिदंगी भर के लिए अपनी लंपटई भूल जाएं!

अकेली लेखिका के बारे में फोहश किस्से लिख उसे लज्जित कर उसे कंट्रोल में लाने के चक्कर में रहते हैं. यह शुद्ध ‘ब्लेकमेल’ है और ऐसे ब्लेकमेलियों से हिंदी भरी हुई है. ऐसों का इलाज ‘केस’ है या वह ‘सेवा’ है, जिसे किया जाता है, लेकिन कहा नहीं जाता.

 हिंदी की तीसरी बीमारी ‘कमिटमेंट’ को ‘खूंटा’ समझ लेने की है. दो खूंटे हैं. एक सकूलर दूसरा कम्यूनल! अपने-अपने खूंटे में बंध कर पगुराना कमिटमेंट का दूसरा नाम है और छूआछूत इस कदर है कि किसी कम्यूनल से ‘हलो’ हो गया, तो सकूलर कम्यूनल हो गया! इतनी छूआछत और चाहते हैं ‘फासिज्म’ से लड़ना!

तो, प्रेमंचद का पटना वाला प्रोग्राम भाजपा का नहीं, बिहार सरकार का था. पहले सरकार महागठबंधन की थी, फिर एक रोज एनडीए की हो गयी. और सरकार पब्लिक के पैसे से चलती है. अगर मंगलेश उसमें चला गया, तो क्या अपराध? अखिल हिंदी क्षेत्र में हर जगह भाजपा सरकारें हैं, तब क्या सड़क पर चलना छोड़ दोगे?

लेकिन अफसोस, मंगलेश भी अपने जाने को लेकर क्षमाप्रार्थी ही नजर आया. क्यों? किसे सफाई दे रहो हो, यार? सरकारी मंचों का बायकाट करते रहोगे, तो क्या सब कुछ भाजपा को सौंप दोगे? इस समर्पणवाद से बाज आओ. अपनी जमीन को रिक्लेम करने की जरूरत है! मंच किसी के बाप के नहीं. आप अपनी कहो, वो अपनी कहें! आप ने बायकाट कर दिया, तो उन्हीं का काम कर दिया ना!

कहने की जरूरत नहीं कि आज साहित्य के प्रस्थापना विंदु (पैराडाइम) एकदम बदल गये हैं, लेकिन अब भी कुछ हैं, जो पुरानी प्रस्थापनाओं में ही अटके हैं.

उधर सोशल मीडिया में साहित्यकार के नाम पर एक विचित्र किस्म की नैतिक ब्रिगेड हावी है, जो जिस तिस के ‘अंतर्विरोधों’ को दिखा कर ‘पोल खोल’ अभियान चलाती रहती है. 

कमिटमेंट को वे एक खूंटा समझती है और ईमानदारी को अपनी बेईमानी छिपाने का बहाना! साहित्य संस्कृति को लेकर जिस ‘रिगर’, जिस मेहनत और जिस धैर्य की जरूरत होती है, वह किसी-किसी ‘ब्लाॅग’ में हो तो हो, वरना ज्यादातर जगहों में, ‘मैं-मैं-मैं’ वाली आत्मश्लाघा और आत्मरति ही ‘साहित्य’ और ‘विचार’ के पर्याय नजर आते हैं.उक्त किस्से हिंदी साहित्य में पनप रही इसी तरह की बीमारियों के चिह्न हैं, जिनका ऐसा ‘क्रिटीक’ जरूरी है, जो ‘मेर तेर’ से परे रहे और नयी प्रस्थापनाओं को समझे!

 



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