जय शाह को साधारण जांच से भी लग रहा है डर, कही कुछ गड़बड़ जरूर है: संतोष भारतीय

जय शाह को साधारण जांच से भी लग रहा है डर, कही कुछ गड़बड़ जरूर है: संतोष भारतीय

Saturday, 28 October, 2017

संतोष भारतीय

प्रधान संपादक, चौथी दुनिया ।।

अमित शाह जी, अग्निपरीक्षा की जगह साधारण जांच ही करा लीजिए

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के साथ बहुत शिक्षाप्रद घटना घटी और यह बहुत बड़ी सीख देती है। सीख ये देती है कि आप जब एक उंगली दूसरे की तरफ उठाते हैं, तो चार उंगलियां आपकी तरफ भी उठती हैं, और ऐसे सवाल खड़े हो जाते हैं जिन्हें आप कितना भी टालने की कोशिश करें पर वो संदेह पैदा कर देती हैं। जब सारे देश का व्यापारी वर्ग रो रहा है, सारे देश का व्यापारी वर्ग नोटबंदी और जीएसटी को लेकर परेशान है, विकास दर कम हो गई है। विकास दर को लेकर स्वयं सरकार के सर्वोच्च नेता और वित्त मंत्री अब तक अलग तरह के बयान दे रहे थे, अब ये बयान दे रहे हैं कि क्या विकास दर कम नहीं होती। इतना ही नहीं, विदेशी अर्थशास्त्रियों के हिसाब से हमारी विकास दर 5.7 या 5.3 नहीं, बल्कि 4.3 तक पहुंच जाएगी। इसका मतलब देश को डेढ़ लाख करोड़ का शुद्ध नुकसान और उस गरीब के पैसे का नुकसान, जिसने लाइन में खड़े होकर नोट बदले, जिसने प्रधानमंत्री की बात पर अपने को देश की रक्षा में लगा हुआ व्यक्ति समझ लिया। आज संपूर्ण व्यापारी वर्ग, खासकर गुजरात का 28-28 दिनों तक सूरत बंद रखता है। व्यापारी वर्ग रसीदों पर नए-नए तरह के नारे लिखता है। अब ऐसी स्थिति में अगर शिक्षा हम न लें, तो कैसे लें?

भारतीय जनता पार्टी और खासकर उनके अध्यक्ष देश के तमाम लोगों को अब तक चोर समझते रहे। उन्होंने ये मान लिया कि कांग्रेस या विपक्षी दल चोर नहीं हैं। चोर हैं इस देश में व्यापार करने वाले, चोर हैं उन्हें वोट देने वाले, चोर हैं कर देने वाले, चोर हैं जो नौकरी पेशा हैं। जिस तरह के नियम-कानून बनाए गए, उससे सरकार को क्या फायदा हुआ पता नहीं, लेकिन सरकार के उन विभागों को अवश्य फायदा हुआ, जिन विभागों में टैक्स के रूप में आया हुआ 90 प्रतिशत पैसा उनकी तनख्वाहों में चला जाता है। फायदा हुआ सरकार के उन मंत्रियों को, जिन्होंने अपने मित्रों के पैसों को आसानी के साथ चलन में ला दिया। फायदा हुआ उन लोगों को, जिनके पास कालाधन था, जिनके पास नकली नोट थे, जिनके पास अकूत संपदा थी। उन लोगों ने बड़ी आसानी से अपने नकली नोट, जिसे फेक करेंसी कहते हैं, को सफेद कर लिया। अब सरकार जब ये कहती है कि हम इतनी कंपनियां बंद करेंगे, क्योंकि इन कंपनियों में कालाधन लगा है, तो हंसी आती है। इसलिए हंसी आती है, क्योंकि वही मापदंड अगर अमित शाह के सुपुत्र के मसले में लागू नहीं होता है, तो मानना चाहिए कि सरकार, सरकार के नियम, कायदे-कानून और इसके सभी विभाग देश के लोगों को धोखा दे रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल क्यों और वो सवाल लोग उठा चुके हैं। क्यों रेल मंत्री पीयूष गोयल ने जय शाह की वकालत में प्रेस कॉन्फ्रेंस की? क्या जय शाह भारत सरकार से जुड़े हुए हैं या वो एक स्वतंत्र व्यापारी हैं, जिन्होंने किसी जादुई करिश्मे से 16000 गुना अपनी संपत्ति बढ़ा ली। वह फॉर्मूला देश का व्यापारी जानना चाह रहा है, लेकिन जय शाह चुप हैं। अमित शाह भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष हैं। अगर उनके ऊपर कोई आरोप होता तो पीयूष गोयल अवश्य सामने आते। वे जय शाह के लिए क्यों सामने आए, यह रहस्य समझ में नहीं आया? राजनाथ सिंह गृह मंत्री हैं। गृहमंत्री एक क्षण में ये फैसला दे देते हैं कि यह मसला जांच के लायक नहीं है। तो फिर कौन सा मसला जांच के लायक है राजनाथ जी? आपने देश के लोगों को एक तरीके से चोरों की श्रेणी में रख दिया, सारे व्यापार को आपकी सरकार ने मंदा कर दिया। देश मंदी के दौर में जा रहा है और फिर भी आप कह रहे हैं कि मंदी नहीं आने वाली है। आप झूठ बोलकर और कितनी सफाइयां देंगे? आपको ये नहीं कहना चाहिए था कि इस मसले में जांच की कोई जरूरत नहीं है। ये मसला वित्त मंत्री कहते तो समझ में आता, गृहमंत्री कैसे कह रहा है। ऐसा लग रहा है कि जैसे जय अमित शाह को बचाने के लिए संपूर्ण भारत सरकार खड़ी हो गई।

अमित शाह अगर प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये कहते कि मेरा बेटा कभी गलत कर ही नहीं सकता, तो इससे बड़ा दावा इस देश में आज तक तो किसी ने किया नहीं। मैं राज्यसभा का सदस्य, मैं भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष और मेरे बेटे के ऊपर कोई इल्जाम लगाए, ये कैसे हो सकता है? ये जो तुर्रमशाही है, ये जो अधिनायकवाद है, ये जो अनर्गल का मोह है, इसे देखकर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी लोकतंत्र के सामान्य पाठ को भी भूल गई है। जब हम जनता के सामने होते हैं, तो हमारी वेशभूषा, हमारी भाषा और हमारे क्रिया कलाप लोकतंत्र के अनुरूप होने चाहिए, या हम देश को ये बताना चाहते हैं कि हम लोकतंत्र का नाम लेते हैं, लेकिन हम लोकतंत्र हैं नहीं। अब हम जिस लोकतंत्र की परिभाषा लिख रहे हैं, वो दरअसल लोकतंत्र नहीं है वो तानाशाही के रूप में एक नया लोकतंत्र है। अगर ऐसा है तो इसकी भी घोषणा कर दीजिए। मुझे अफसोस इस बात का है कि आपमें तो ये भी हिम्मत नहीं है कि आप ये कह दें कि ये लोकतंत्र इस देश के लिए आवश्यक नहीं है। इस देश के लिए तानाशाही ही आवश्यक है और तानाशाही भी लोकतांत्रिक तानाशाही नहीं, तानाशाही भी अमितशाह के परिभाषा वाली तानाशाही। इस बात को कहने की हिम्मत अगर आपमें है, तो कह दीजिए। 

पर इतना जरूर है कि आपने जब सारे देश की तरफ उंगलियां उठाईं, उसी समय ईश्वर कहीं न कहीं हंस रहा होगा। इसीलिए एक पत्रकार रोहिणी सिंह के हाथ जब ये करिश्माई तथ्य लगा कि 16000 गुना संपत्ति बढ़ गई, तब व्यापार में वो कौन सा फॉर्मूला है? अब नैतिकता का तकाजा तो यही है कि आप देश के लोगों को उस फॉर्मूले को बताने की अनुमति अपने पुत्र को दे दीजिए और आपके पुत्र को भी चाहिए कि वो सारे देश को बताए कि वो फॉर्मूला क्या है? देश के लोगों की इतनी छोटी सी आशा पूरी होगी, मुझे नहीं पता। शायद कभी पूरी नहीं होगी। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जब खुद इस मुद्रा में बात करें कि मैं और मेरा बेटा कभी गलत हो ही नहीं सकते और मेरा बेटा तो कभी गलत हो ही नहीं सकता, तो फिर आगे बात करने के लिए कुछ रह ही नहीं जाता। लेकिन यही न्याय है ईश्वर का कि आप कितना भी शोर मचाएं, देश के लोगों के मन में यह संदेह आ गया है कि किस तरीके से संपत्ति बढ़ाने के लिए नियमों का दुरुपयोग होता है और सरकार किस तरीके से दुरुपयोग करने वालों को बचाने के लिए बेशर्मी के साथ खड़ी हो जाती है।

दत्तात्रेय होसबोले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस समय सबसे वरिष्ठ नेताओं में हैं। वो शायद संघ के अगले सरकार्यवाह होने वाले हैं। उनका ये कहना कि जय शाह के ऊपर लगे हुए आरोपों की जांच होनी चाहिए, बिल्कुल स्वागत योग्य बयान है। इस वक्तव्य के बाद भी अगर अमित शाह हठधर्मी करते हैं या भारत सरकार हठधर्मी करती है, तो यह मानना चाहिए कि संघ तो न्यायप्रियता में विश्वास कर रहा है, लेकिन सरकार न्यायप्रियता में विश्वास नहीं कर रही है। रामराज्य में भरोसा करने वाले लोग राम के आदर्श का हजारवां हिस्सा भी पालन करें तो इनके ऊपर विश्वास जमने की जमीन तैयार हो सकती है। लेकिन जिन राम ने निर्दोष होते हुए भी एक धोबी के कहने पर अपनी पत्नी का त्याग कर दिया, उसी राम राज्य की कल्पना का नाम लेने वाले, राम का मंदिर बनाने का आग्रह करने वाले और राम के नाम की जय बोलने वाले लोग जब अपनी सफाई देने की जगह, अग्निपरीक्षा तो बहुत दूर, एक साधारण जांच का भी सामना करने से डरें, तो फिर मानना चाहिए कि कहीं कुछ ज्यादा गड़बड़ है। मैं दत्तात्रेय होसबोले की तारीफ करूंगा और उनकी हिम्मत की दाद दूंगा कि उन्होंने पहली बार संघ का न्यायप्रिय चेहरा देश के लोगों के सामने रखा।

 

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