क्या है इंडिया टुडे समूह के अरुण पुरी की सफलता का राज...

क्या है इंडिया टुडे समूह के अरुण पुरी की सफलता का राज...

Monday, 23 October, 2017


हिंदी के नंबर वन न्यूज चैनल के पत्रकार रह चुके दीपक शर्मा ने इंडिया टुडे समूह के चेयरमैन अरुण पुरी को लेकर एक पोस्ट लिखा है जो हम आपके साथ शेयर कर रहे हैं...


अमित शाह के बेटे पर खोज खबर छापने के बाद 'द वायर' के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन, आज देश के सबसे बड़े सम्पादक माने जा रहे हैं । देश में श्रेष्ठतम सम्पादकों की कोई वरीयता सूची ना होने पर, सिद्धार्थ ने मोदी के खिलाफ ताबड़तोड़ ख़बरें छाप कर टॉप संपादक होने का परसेप्शन तो बना लिया है। 

लेकिन सच ये भी है कि उनकी सम्पादकीय श्रेष्ठता की झलक हमे उनके लम्बे करियर के उन्ही वर्षों में दिखी जब सत्ता के शीर्ष पर नरेंद्र मोदी जैसे हार्डकोर हिंदुत्व छवि वाले प्रधानमंत्री हैं. और सच ये भी है कि सिद्धार्थ ने वायर जैसी वैकल्पिक पत्रकारिता मोदी काल में ही शुरू की। कांग्रेस के राज में उन्हें टाइम्स ऑफ़ इंडिया और द हिन्दू जैसे कॉर्पोरेट घराने रास आ रहे थे. इसलिए सच ये भी है कि जो आक्रमक पत्रकारिता सिद्धार्थ की टीम आज कर रही है वो उनकी सोच और राजनैतिक विचारधारा के बिलकुल अनुकूल है. यानी सिद्धार्थ और उनके लेफ्ट के साथी कोई तय करके अचानक भगत सिंह या आज़ाद नहीं बने हैं बल्कि देश में जिस विचारधारा की आज सरकार है उसका बैंड बजाना इस टीम को पॉलिटिकली सूट करता है।

बहरहाल जब कुछ बड़ी ख़बरें करके 'वायर' की शोहरत बढ़ने लगी तो सिद्धार्थ साहब सार्वजनिक मंच पर ये कहने भी लगे कि कॉर्पोरेट मीडिया ने पत्रकारिता का बेडा गर्क किया है और अब 'वायर' ही इस देश की जनता को सच बता सकता है। इसलिए वो जनता से चंदा मांग रहे हैं और वायर को आर्थिक तौर पर और मज़बूत करना चाहते हैं।

भले ही सिद्धार्थ एक जबरदस्त सम्पादक दिख रहे हैं लेकिन भविष्य में उनकी सम्पादकीय श्रेष्ठता हर कसौटी पर खरी उतरती है ये लेकर संशय है। संशय इसलिए है क्यूंकि पत्रकारिता अजेंडा पर आधारित है जो आज के वक़्त तो एंटी-इस्टैब्लिशमेंट है पर अगर आगे चलकर मोदी सरकार बदल गयी तो सिद्धार्थ साहब का अजेंडा भी बदल सकता है और मुमकिन है तहलका की तरह सिद्धार्थ के 'द वायर' को वर्तमान सरकार से और उलझना पड़े। उन पर मानहानि के कई मुक़दमे अभी और दर्ज़ हों । लेकिन तरुण तेजपाल की तरह सिद्धार्थ की पत्रकारिता एजेंडा से मुक्त नहीं है । 2019 में अगर मोदी सरकार बदली तो तरुण तेजपाल की तरह सिद्धार्थ के सुर भी बदल सकते हैं।

मित्रों, अरुण शौरी से लेकर सिद्धार्थ वरदराजन या रामनाथ गोयनका से लेकर प्रभाष जोशी तक हमने एक 'एडिटर बॉस' को हमेशा आंकलन से दूर रखा। हम अक्सर ये भूल जाते हैं कि इमरजेंसी में इंदिरा गाँधी को किस पत्रिका ने सबसे पहले घेरा था? हर्षद मेहता काण्ड से लेकर चारा घोटाले तक सबसे बड़े खुलासे किस पत्रिका ने किये थे? न जाने कितने ऐसे हफ्ते थे जब इस पत्रिका की कोई न कोई कवर स्टोरी देश को भीतर तक झकझोर जाती थी। शायद ऐसा कोई देश का बड़ा पत्रकार न होगा जिसने इस पत्रिका के लिए काम न किया होगा। यही पत्रिका यानी इंडिया टुडे जब अपना चैनल 'आजतक' लेकर आयी तो शुरुआती वर्षों में देश की पत्रकारिता नए तरीके से परिभाषित हुई। धारदार रिपोर्टिंग के लिए बीबीसी ने इसे देश का सबसे बड़ा पब्लिक ब्रांड कहा। मुझे याद है संसद के कई बड़े नेताओं का सवालों पर रिश्वत लेने का जब आजतक पर खुलासा हुआ तो प्रधानमंत्री से लेकर संसद के स्पीकर तक के होश उड़ गए। सर्वदलीय बैठक के बाद दर्ज़न भर सांसदों से स्पीकर को इस्तीफ़ा लेना पड़ा।

कुछ ही दिन बाद जब कारगिल के कफ़न काण्ड का खुलासा हुआ तो पहली बार अटलजी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया । उसके बाद तो आजतक में जैसे झड़ी लग हो गयी खुलासों की। आजतक की आक्रामकता का आलम ये था कि पीएम या सीएम नहीं सिर्फ चैनल के नाम से पुलिस और नौकरशाही डरने लगी थी।

अमूमन नौकरी छोड़ने के बाद या दूसरी नौकरी पा लेने के बाद पत्रकार पुराने सम्पादकों या मालिकों के बारे में अच्छी राय नहीं रखते. लेकिन मेरा मानना है कि मेरे पुराने चीफ एडिटर यानी अरुण पुरी से बड़ा संपादक इस देश में अबतक नहीं हुआ है। मैंने कई बड़े सम्पादकों के साथ काम किया लेकिन अरुण पुरी के करीब भी मुझे कोई नहीं दिख। बहुत कम लोग जानते होंगे कि पुरी, दून स्कूल में राजीव गाँधी के साथ थे लेकिन जब इमर्जेन्सी लगी तो उनकी पत्रिका ने कांग्रेस के बखिये उधेड़ दिए। अरुण शौरी जैसे पत्रकार को पुरी साहब ने ब्रेक दिया। रघु रॉय जैसे फ़ोटोग्राफ़र भी इंडिया टुडे की देन हैं।

सरकार चाहे नरसिम्हा राउ की हो या फिर वीपी सिंह की, इंडिया टुडे ने नाकों चने सबको चबवाये। इंडिया टुडे की वीडियो मैगज़ीन न्यूज़ ट्रैक ने १९९० में जिस दिन मंडल विरोध में छात्र नेता राजीव गोस्वामी के जलते हुए जिस्म की तस्वीरें रिलीज़ कीं थीं उसी दिन वीपी सिंह के सत्ता से बाहर होने का रास्ता साफ़ हो चुका था।

दरअसल अरुण पुरी बड़ी ख़बरों के मुरीद रहे हैं। खबर तथ्य परक हो तो कभी रोकी नहीं जा सकती। हाँ आपको सामने वाले का कथन रिकॉर्ड करना होगा। सलमान खुर्शीद की खबर पर शायद वो उतने ही उत्सक थे जितना मै था। इसलिए मुकदमे तो हुए लेकिन उनके चेहरे पर शिकन नहीं थी । सच तो ये है कि मैं क्या कोई भी आजतक में १०-१५ साल काम करने के बाद भी ये नहीं समझ सका कि अरुण पूरी या ग्रुप की विचारधारा क्या है?

एक बार मुलायम सिंह यादव सरकार के आवास घोटाले पर आजतक में बड़ी खबर हुई. मुलायम की सेक्रेटरी अनीता सिंह का नाम आने से मुलायम इतना तिलमिलाए थे कि आजतक की खबर के खिलाफ उन्होंने लखनऊ के सारे अख़बारों के पहले पेज पर खंडन छपवा दिया। मुझे लगा कि मेरे सहयोगी धीरेन्द्र पुंडीर जिन्होंने खबर की थी .....कहीं उनकी नौकरी न चली जाए क्यूंकि अमर सिंह के मित्र प्रभु चावला ने पुंडीर के खिलाफ कई बेबुनियाद आरोप लगाए. लेकिन दिन भर की हंगामी बैठक के बाद पुरी साहब ने पुंडीर का पक्ष लिया. हमारी जीत हुई और चावला साहब और अमर सिंह ढेर हुए। बाद में अमर सिंह विवाद को लेकर पुरी साहब ने चावला को चलता कर दिया और पुंडीर को प्रमोशन मिला। ऐसी दिलेरी और हिम्मत आपको आज के दौर के मालिक सम्पादकों में देखने को नहीं मिलेगी। 
बहरहाल बात ज्यादा लम्बी की नहीं जा सकती। आज भी आजतक बाकि कई चैनलों से बेहतर है। आजतक में जो शिथिलता है उसका एक कारण ये है कि पूरी साहब पिछले कई बरसों से रिटायर होना चाहते हैं। शायद ७३ वर्ष की उम्र में लगातार १५-१६ घंटे काम करके इतने बड़े मीडिया ग्रुप को चलाना शारीरिक स्तर पर एक कठिन चुनौती है । काश अरुण पुरी, इस लीजेंड मीडिया हाउस को कोई दूसरा अरूण दे सकें। ऐसा नहीं हुआ तो देश में सिद्धार्थ वरदराजन जैसे विचारधारा आधारित संपादक ही सर्वश्रेष्ठ कह लाएँगे। और हाँ सम्पादक डेढ़-दो साल में नही बनते । सम्पादकीय कार्यकाल की एक लम्बी उम्र, एक बड़े सम्पादक की साख को गढ़ती है। मोदी सरकार में अरुण पूरी की साख और संतुलन को ज़ाहिर करने के लिए चैनल के सिर्फ़ दो चेहरे ही पर्याप्त हैं। पुण्य प्रसून बाजपेई और राजदीप सरदेसाई। 

निसंदेह, मोदी की आर्थिक नीतियों के बढ़ते विरोध में वरदराजन एक लहर की उफान है जो २०१९ के सत्ता परिवर्तन के बाद थम भी सकते है। लेकिन पिछले चार दशकों से पुरी का सम्पादन किसी आसमान की ऊँचायी से कम नही हैे।


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