आलोक मेहता बोले- केजरीवाल को मीडिया के अधिकांश संपादक-पत्रकार दुश्मन ही लगते हैं..

Saturday, 24 February, 2018

आलोक मेहता

वरिष्ठ पत्रकार ।।

अफसरों के लिए राजनीतिक गुलामी का फंदा

यह कैसा स्टेटमेंट लिखा है जी? समझ लो अब हम मुख्यमंत्री हो गया हूं। गड़बड़ किया, तो पंखे से लटका दूंगा।यह धमकी 1990 में एक मुख्यमंत्री ने सत्ता संभालने के बाद आकाशवाणी के प्रादेशिक केन्द्र से जनता के नाम संदेश के लिए तैयार वक्तव्य की कुछ पंक्तियां समझ में न आने पर तत्कालीन मुख्य सचिव को दी थी। लेकिन वह फटकार तात्कालिक थी और कुछ मिनटों बाद वह हंसते हुए उसी मुख्य सचिव से बात करने लगे थे। सत्ता का रौब दिखाकर वह केवल जी सर, जी हुजुर सुनना चाहते थे। इसी मनमानी, गलत निर्णयों और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण उन्हें जेल की सजा भुगतनी पड़ी।

हरियाणा, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु जैसे राज्यों में कुछ मुख्यमंत्रियों के कठोर रवैये बड़े अधिकारियों ने देखे। इमरजेंसी के दौरान राजनीतिक प्रतिबद्धताको महत्व मिला। इस दौर में राजनीतिक विचारधारा के साथ वैकल्पिक प्रतिबद्धता की महत्ता देखने को मिली। फिर भी 70 वर्षों के राजनीतिक प्रशासनिक इतिहास में ऐसी स्थिति कभी देखने को नहीं मिली, जबकि मुख्यमंत्री रात के 12 बजे मुख्य सचिव को अपने कमरे में जवाब तलब के लिए बुलाकर अपने कुछ साथी विधायकों से पिटवाएं और आंखों पर लगा चश्मा तक तुड़वा दें।

फिल्मों में गॉड फादर’ ‘माफिया डॉनजरूर इस तरह के खूंखार अपराध करते देखे जाते हैं। लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी दिल्ली में अन्ना हजारे के आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की छत्र-छाया में हुआ यह अपराध ऐतिहासिक रिकॉर्ड है। केजरीवाल स्वयं भारतीय प्रशासनिक सेवा के आयकर विभाग में वर्षों तक सरकारी सेवा में प्रशासनिक नियम कानून, अनुशासन एवं लक्ष्मण रेखाओं को थोड़ा बहुत समझे होंगे। यह अवश्य संभव है कि नौकरी के दौरान ही वह अपनी ड्यूटी के बजाय जोड़-तोड़ और राजनीतिक सत्ता के ताने-बाने बुन रहे थे। अन्ना हजारे से पहले भारतीय प्रशासनिक सेवा के उच्च पद को त्याग सच्चे अर्थों में समाज सेवा को निकली अरुणा राय के सूचना के अधिकार पाने के अभिमान में केजरीवाल जुड़े और उनकी ही सिफारिश पर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार पा गए। लेकिन राजनीति का खून चढ़ते ही केजरीवाल ने अरुणा राय, अन्ना हजारे, योगेन्द्र यादव, आनन्द कुमार जैसे संरक्षकों को अंगूठा दिखाते हुए अपने घोड़े दूसरी दिशा में दौड़ा दिए।

बहरहाल, असली मुद्दा यह है कि जनता द्वारा चुने हुए केजरीवाल एंड कंपनी के नेता क्या प्रशासनिक अधिकारियों को गुलाम की तरह रखने के हकदार हैं? दिल्ली से वैसे भी केन्द्र शासित प्रदेश है और असली प्रशासनिक जिम्मेदारी उप-राज्यपाल की रहती है। महत्वाकांक्षी अरविन्द केजरीवाल यदि अगले चुनावों में उत्तर प्रदेश जैसे बड़े अथवा हरियाणा जैसे छोटे राज्य में मुख्यमंत्री बन जाएं, तब क्या अफसरों को अपने दफ्तर में ही फांसी पर लटकाने का हुक्म जारी करने लगेंगे? उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्र सरकार, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के नेता ही नहीं प्रशासनिक सेवा से आए उप राज्यपाल नजीब जंग और अनिल बैजल या मुख्य सचिव, सतर्कता अधिकारी एवं मीडिया के अधिकांश संपादक पत्रकार दुश्मन ही लगते हैं। उतनी लंबी फेहरिस्त तो अमेरिका के सिरफिरे राष्ट्रपति ट्रंप की भी नहीं है। वे तुगलकी फरमान जारी करते रहते हैं, अधिकारी बर्खास्त करते हैं, लेकिन पिटवाते नहीं और न ही अपनी व्यवस्था की गड़बड़ियों के लिए हिलेरी क्लिंटन या अन्य विरोधी नेताओं में दोषी ठहराते हैं।

लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों के साथ प्रशासन-तंत्र का अनुशासित एवं जवाबदेह होना जरूरी है। लेकिन इसके लिए हमारे संविधान निर्माताओं, न्यायाधीशों एवं श्रेष्ठतम शीर्ष प्रशासकों ने समुचित नियमों, आचार संहिताओं का प्रावधान किया है। सरपंच, पालिका अध्यक्ष, महापौर, मुख्यमंत्री, मंत्री, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति या राष्ट्रपति संपूर्ण तंत्र के साथ समन्वय करके ही जनता की अपेक्षाएं पूरी कर सकते हैं। लेकिन अपने राजनीतिक या प्रशासनिक सहयोगियों को गुलामकी तरह व्यवहार करके कभी जनता का हित नहीं कर सकते हैं। लोकतंत्र में असहमति का कवच संपूर्ण व्यवस्था के लिए हितकारी का है। चर्चिल या नेहरू जैसे प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा समय-समय पर असहमतियों के किस्से दर्ज हैं। इंदिरा गांधी के सत्ता काल में भी ऐसे निर्भीक अधिकारी रहे हैं। उनकी दृढ़ता को पंसद भी किया जाता था। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो बाकायदा सचिवों और कलेक्टरों तक को सीधे संबोधित करते हुए अपनी राय देने का आग्रह किया। कुछ सचिवों ने अपने मंत्रियों से अलग राय भी पहुंचवाई। यह भी जरूरी नहीं कि प्रधानमंत्री उनकी असहमति या राय को स्वीकारें। विडंबना यह है कि पिछले तीन दशकों के दौरान समाज के अन्य हिस्सों की तरह प्रशासनिक ढांचे में भी कहीं-कहीं दीमक लगी।

राजनेताओं के साथ अफसरों का एक वर्ग को गड़बड़ी एवं भ्रष्टाचार का नशा रास आने लगा। राजनीतिक व्यवस्था में भी जिस तरह सेवा के बजाय सत्ता एवं धन बल को प्राथमिकता मिलने लगी। कई अफसर जी हुजुरीके साथ राजा से अधिक स्वामी भक्त’ (मोर लॉयल देन किंग) हो गए। दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के समर्थन में भारतीय प्रशासनिक सेवा की एसोसिएशन खड़ी हो गई हैं, लेकिन उसे भी आचारसंहिताओं के पालन के लिए अपने सदस्यों को तैयार करना होगा। सत्ता के साथ वफादारी बदलने का सिलसिला रुकवाना होगा। नेता तो पांच साल के लिए चुनकर आते हैं। प्रशासनिक सेवा में भर्ती होने वाला तो तीस वर्ष से अधिक लोक सेवककी भूमिका में रहता है।

राजधानी दिल्ली से सुदूर पूर्वोत्तर या दक्षिण-पश्चिम तक उसकी सेवाएं देश और समाज की गाड़ी आगे बढ़ाती है। कृपया ध्यान दीजिए पिछले वर्षों के दौरान भ्रष्टाचार के गंभीर मामले प्रभावित होने पर अदालतों के फैसले से नेताओं के बजाय अधिकारी अधिक संख्या में जेलों में हैं। तात्कालिक स्वार्थों के लिए वे ही नेताओं की काली कमाई का जरिया बनते हैं। भंडाफोड़ होने पर उन्हें जेल जाना पड़ता है, क्योंकि हेराफेरी के प्रमाण के रूप में उन्हीं के हस्ताक्षर होते हैं। भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को रोकने के उपायों के साथ जरूरत इस बात की भी है कि एक निष्पक्ष न्यायिक प्राधिकारण या न्यास के मार्फत हर राज्य और प्रशासनिक पुलिस सेवा के ईमानदार अधिकारियों की सूची हर वर्ष तैयार करके उन्हें सम्मानित किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में व्यवस्था की विश्वसनीयता अपरिहार्य है।

 

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