ankara escort porno sex izle porno izle sex izle डॉ. वैदिक का सवाल- 25 साल बाद इस गड़े मुर्दे को उखाड़ने का अर्थ क्या है?

डॉ. वैदिक का सवाल- 25 साल बाद इस गड़े मुर्दे को उखाड़ने का अर्थ क्या है?

Monday, 24 April, 2017

डॉ. वेद प्रताप वैदिक

वरिष्ठ पत्रकार ।।


बाबरी का गड़ा मुर्दा क्यों उखाड़ें?

बाबरी मस्जिद को ढहाने के मुकदमे को सर्वोच्च न्यायालय ने फिर से जिंदा कर दिया है। अब लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी आदि पर फिर से मुकदमा चलेगा। दो साल के अंदर-अंदर फैसला आएगा और लखनऊ में उसकी रोज़ सुनवाई होगी। अदालत की इस मुस्तैदी की कौन दाद नहीं देगा, लेकिन असली प्रश्न यह है कि अब 25 साल बाद इस गड़े मुर्दे को उखाड़ने का अर्थ क्या है? इसका पहला अर्थ तो यही है कि कानून की नजर में सभी समान हैं। कोई छोटा-बड़ा नहीं है। यदि कई साधारण लोगों पर मस्जिद गिराने के आरोप में 25 साल से मुकदमा चल रहा है तो इन बड़े नेताओं को क्यों बख्शा जाए? उच्च न्यायालय ने उन्हें किसी तकनीकी कारण से छोड़ दिया था लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इन्हें दुबारा घेर लिया है।

दूसरा अर्थ, जो सभी राजनीतिक मंडलियां लगा रही हैं, वह यह है कि आडवाणी और जोशी को राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के चुनाव से वंचित करने के लिए यह साजिश रची गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन दोनों महारथियों को मार्गदर्शक मंडल के ताक पर बिठा दिया था। अब डर यह लगा कि वहां से उतरकर ये दोनों देश के दो बड़े पदों के लिए खम न ठोकने लगें। अदालत का फैसला क्या होगा, इसकी चिंता किसे भी नहीं है, क्योंकि अगर ये बरी हो जाते हैं तो ठीक है और इन्हें सजा हो जाती है तो ये दोनों भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी ज्यादा लोकप्रिय हो जाएंगे। मुकदमे के दौरान इन्हें चुनाव लड़वा दिया जाए तो इनकी जीत तो लगभग तय ही है। इन्हें फिर मुकदमे से संवैधानिक छूट मिल जाएगी, जैसे कि राज्यपाल कल्याणसिंह को मिल गई है। मोदी के माथे पर लगा कृतघ्नता का कलंक भी धुल जाएगा और ये दोनों बुजुर्ग नेता मोदी के प्रति बेहद नरम भी पड़ जाएंगे।

पता नहीं, मोदी में यह जुआ खेलने की शक्ति और दूरदर्शिता कितनी है? यदि मोदी इस राह पर चल पड़े तो सर्वोच्च न्यायालय की भी काफी मदद हो जाएगी। वरना, उससे मेरे जैसे लोग पूछ सकते हैं कि एक तरफ तो मंदिर-मस्जिद का झगड़ा आप बातचीत से हल करने की गुहार लगा रहे हैं और दूसरी तरफ आप इस गड़े मुर्दे को उखाड़ने पर आमादा हैं? कहीं आप चंगेज, बाबर, नादिरशाह, औरंगजेब और कश्मीरी बादशाहों पर कई मुकदमे स्वीकार न कर लें, जिन्होंने ढेरों मंदिर (और मस्जिदें) भी गिराए। 25 साल और 500 साल में फर्क क्या है? न्याय जब भी मिले, उसका स्वागत ही होगा लेकिन न्याय देनेवाले को यह भी सोचना होगा कि वे सारे देश को गड़े मुर्दे की बदबू से क्या भर नहीं देंगे?

(साभार: नया इंडिया)


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