करप्शन के बचाव में बच्चन साहब की कविता का यूं इस्तेमाल सोच से परे था...

करप्शन के बचाव में बच्चन साहब की कविता का यूं इस्तेमाल सोच से परे था...

Wednesday, 01 November, 2017

अजीत अंजुम

वरिष्ठ पत्रकार ।।

सुखराम के बचाव में बच्चन की कविता- जो बीत गई सो बात गई

किसी खाए-पीए-अघाए भ्रष्टाचारी को अपने पाले में मिला लेने के बाद ये तर्क भी दिया जा सकता है कि जो बीत गई, वो बात गई। ये पहली बार पता चला है। हरिवंश राय बच्चन ने दशकों पहले जब ये कविता लिखी होगी तो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा कि एक दिन ऐसा आएगा जब देश की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी उनकी इस कविता का इस्तेमाल भ्रष्टाचारी नेता सुखराम के पाप को धोने के लिए करेगी।

हाल ही में अपने कुनबे के साथ बीजेपी में शामिल हुए सुखराम के भ्रष्टाचारी अतीत के बारे में पूछे जाने पर बीजेपी के मुखर और प्रखर प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि सुखराम के खिलाफ मामले बहुत पुराने हैं। शेर-शायरी और कविताओं में दिलचस्पी रखने वाले सुधांशु त्रिवेदी ने आगे कहा- जो बीत गई, वह बात गई। कानून अपना काम करेगा।’  शिमला में दिल्ली के बीजेपी नेता का ये बयान मायने रखता है। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी के लेकर बीजेपी के नजरिए को भी साफ करता है। भ्रष्टाचार का मामला अगर पुराना हो। मौसम अगर चुनावी हो। नेता अगर वोटजुटाऊ हों तो जो बीत गई सो बात गई कहकर उसे अपने घाट का पानी पीने के लिए बुलाया जा सकता है। भ्रष्टाचारी अगर वोटवैंक वाला हो तो उसके अतीत पर गंगाजल से पोछा मारकर अपने पाले मे लिया जा सकता है। जो बीत गई सो बात गई वाले तर्क के साथ।

कविता की ही अगली लाइन जोड़ दें तो कह सकते है जो बीत गई सो बात गई, माना वो बेहद भ्रष्टाचारी था (माना वो बेहद प्यारा था की जगह)। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी  बीजेपी दरिया बन चुकी है तो दरियादिली दिखाने का अधिकार तो है ही। जो भी इस दरिया में आएगा, अपने आप पाक साफ हो जाएगा। गंगा नहाने से पाप धुलते हैं न। तो बीजेपी में आने से भी धुल सकते हैं।

अब मेरा एक सुझाव है। बीजेपी को जो बीत गई सो बात गईवाली राष्ट्रीय लिस्ट बनानी चाहिए। बीतने की एक मियाद तय कर दें। ऐलान कर दें कि गुनाह पांच साल-सात साल या दस साल पुराना हो जाए तो उसे बीतने की श्रेणी में डाल दिया जाएगा।

पार्टी को अपने नए विधान-संविधान में भी जो बीत गई सो बात गईवाली कैटेगरी का जिक्र कर देना चाहिए। पूरी पारदर्शिता के साथ। पार्टी में इंट्री के ख्वाहिशमंदों को भी पता रहेगा कि वो कब इस कैटेगरी के लिए एलिजिबल हो जाएंगे। फिर पार्टी से न कोई सवाल पूछा जाएगा। न नेताओं को बचाव में नई कविता सुनानी पड़ेगी। फायदा ये होगा कि हर राज्य से बीजेपी को ऐसे प्रतापी जेल रिटर्न नेता मिल जाएंगे, जो चुनावी मौसम में शिद्दत से पार्टी की तूरही बजाएंगे। ऐसे खेले-खाए-पीए-अघाए नेताओं को जो बीत गई सो बात गईके नारे के साथ पार्टी में शामिल करने के कई फ़ायदे भी होंगे। मालदार आसामी के अंदर आने से पार्टी पर कम से उनके इलाक़े के ख़र्चे का लोड नहीं पड़ेगा। ठीक-ठाक वोट पड़ेगा, सो अलग। हर्रे लगे न फिटकिरी रंग चोखा आए।

लोकसभा चुनाव में भी अब डेढ़ साल ही रह गया है। राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे वीतरागी नेताओं की जनगणना का काम शुरू कर देना चाहिए। पहली और बड़ी खेप तो यूपी-बिहार से ही पार्टी को मिल जाएगी। जिनके अतीत पर गंगा जल से पोछा मारकर जो बीत गई सो बात गईनारे के साथ कमल निशान के साथ मैदान में उतारा जा सकेगा। पब्लिक की मेमेरी भी छोटी होती है। जनता अपने जनार्दन के गुनाह जल्दी भूल जाती है। कई बार जनता गुनाह वाले को ही अपना जनार्दन मानकर जिता देती है। जब जनता अपना स्टैंड चेंज कर सकती है तो बीजेपी क्यों नहीं? जिस भी पार्टी को ऐसे लोगों की दरकार हो, उनका गुनाह भूलकर उन्हें नए सिरे से कबूल करे।

अब बात जरा पंडित सुखराम जी की। सुखराम पुत्र अनिल शर्मा को बीजेपी ने कांग्रेस से ताजा-ताजा अपने खेमे में इंपोर्ट किया है। उन्हें नहा-धुलाकर पाक साफ घोषित करके मंडी की पुश्तैनी सीट से कमल निशान का टिकट थमा दिया है। पापा सुखराम और बेटे अनिल शर्मा अब बीजेपी की जीत के लिए मुनादी कर रहे हैं। दो सप्ताह पहले ही बीजेपी में शामिल हुए अनिल शर्मा एक दिन पहले तक हिमाचल की वीरभद्र सरकार में मंत्री थे। एक शाम पहले तक कांग्रेस के लिए हुंकार भर रहे थे। रातों-रात उनकी गोटी बीजेपी में सेट हुई। सूबे में सरकार बन गई तो उनकी गोटी लाल भी हो जाएगी। जैसे पहले होती रही है।

ये वही सुखराम हैं, जिनके दिल्ली और मंडी वाले घरों से 1996 में पौने चार करोड़ रुपए कैश बरामद हुए थे। दिल्ली के बंगले में बेड से दो करोड़ पैंतालीस लाख, मंडी वाले घर के पूजा घर से एक करोड़ सोलह लाख कैश मिला था। सीबीआई के तत्कालीन निदेशक जोगिंदर सिंह ने कहा था कि उन्होंने अपनी जिंदगी में एक साथ इतना कैश बरामद होते नहीं देखा। उस दौर में इन छापों को मदर ऑफ ऑल रेड्स कहा गया था। आजाद भारत में पहली बार किसी नेता के यहां से इतनी रकम एक साथ बरामद हुई थी। नाम से पंडित सुखराम काम से ऐसे पंडित थे कि पूजाघर में नारायण की मूर्ति के पीछे नगद नारायण को छिपा रखा था। एक साथ दोनों की पूजा करते थे। नरसिंह राव सरकार में संचार मंत्री रहे सुखराम के घर पर सीबीआई के इन छापों के बाद उनके कई कारनामों का खुलासा हुआ था। केन्द्र में संयुक्त मोर्चे की सरकार थी। बीजेपी ने कई दिनों तक संसद में सुखराम के खिलाफ जबरदस्त हंगामा किया। कांग्रेस की फजीहत होती रही। आखिरकार उन्हें कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया गया। हिमाचल सरकार में उनके मंत्री बेटे को भी सत्ता से रुखसत कर दिया गया। पंडित जी जेल गए। जमानत पर बाहर आए तो उन्होंने नई पार्टी बना ली। 1998 में विधानसभा चुनाव लडे। पांच सीटें जीती। राज्य में बीजेपी सरकार बनने के लिए पांच विधायकों की कमी पड़ी तो भ्रष्टाचारी सुखराम का साथ लेने में बीजेपी ने देर नहीं लगाई। तब दिल्ली में अटल-आडवाणी की सरकार थी। मौजूदा प्रधानमंत्री पार्टी के हिमाचल प्रभारी थे। पांच साल बाद पंडित जी अपने बेटे के साथ फिर कांग्रेस में लौटे। बेटा दो बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता। आखिरी दिन तक कांग्रेस सरकार में मंत्री रहा। अब फिर बाप-बेटे वापस कमल निशान थामकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में कूद पड़े हैं।

अब कांग्रेस सुखराम पर हमलावर हो रही है। कल तक वही कांग्रेस सुखराम के बेटे को मंत्री बनाए हुए थी। दोनों पार्टियों ने अपनी सुविधा के हिसाब से सुखराम के कुनबे को अपनाया। इस्तेमाल किया। अपने साथ रहे तो उनकी खूबियां गिनाई। दूसरे खेमे में गए तो भ्रष्टाचारी बताया। यही सियासी पार्टियों का चरित्र होता है। हर राज्य में चुनाव के पहले ऐसे ही दागदार लोगों का कायांतरण होता है। अब तो जो बीत गई सो बात गईका नया फार्मूला भी आ गया है। तो अब मान लीजिए कि न खाऊंगा, खाने दूंगा के अश्वमेघ में अपने जमाने के भ्रष्ट शिरोमणि सुखराम जी ने भी आहूति दे दी है।


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