‘ये इंसानों का नहीं, बड़ी-बड़ी गाड़ियों का शहर है’

‘ये इंसानों का नहीं, बड़ी-बड़ी गाड़ियों का शहर है’

Friday, 10 November, 2017

टी.पी. पाण्डेय

वरिष्ठ पत्रकार ।।

नाक-मुंह में कपड़ा और खांसी का मतलब..?

अब घर से बाहर निकलते वक्त मुंह और नाक में कपड़ा लपेटने से क्या होगा..? दिल्ली की सड़कों पर मैंने खुद सैकड़ों लोगों को मुंह और नाक में कपड़ा लपेटकर चलते देखा, जहां शाम ढलते ही प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका था। मेट्रो स्टेशनों में और मेट्रो के सफर में भी यही हाल था। हर दूसरा व्यक्ति खांस रहा था और मुंह में कपड़ा बांधे हुए था। ऐसा नज़ारा कम ही देखने को मिलता है,  लेकिन अब सेहत के प्रति एहतियात बरतने से क्या होगा?

अगर आप सेहत के प्रति वाकई इतने ही जागरूक, देश के प्रति इतने ही जिम्मेदार और आने वाली अपनी नस्लों के प्रति इतने ही संवेदनशील होते तो शायद दिल्ली-एनसीआर का ये हाल ना हुआ होता। ये समझना ज़रूरी है कि दिनभर सरकारों को कोसने से काम नहीं चलते वाला है। कभी एकांत में खुद से भी सवाल कीजिये कि हम इसके लिए कितने जिम्मेदार हैं। सुबह और शाम के वक्त दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर निकलिए, आपको लगेगा कि ये इंसानों का नहीं बल्कि बड़ी-बड़ी गाड़ियों का शहर है। इन गाड़ियों के AC से निकलने वाली गैस और पेट्रोल-डीज़ल का धुआं दिल्ली की हवा में अतिरिक्त जहर घोल रहा है।

अब ज़रा पीछे चलते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने दीपावली से चंद रोज पहले पटाखों की बिक्री पर बैन लगाया तो लोग तिलमिला उठे। कुछ ने इसे धार्मिक रंग देने की कोशिश की कुछ ने इसे पटाखा व्यापारियों के खिलाफ साजिश करार दिया, तो कुछ ने कहा कि क्या एक दिन के बैन से प्रदूषण खत्म हो जाएगा। कुछ ने कहा कि पटाखों से इतना प्रदूषण नहीं होता जितना पंजाब-हरियाणा के खेतों में पराली जलाने से या फिर भवनों के निर्माण के चलते उड़ने वाली धूल से होता है। दीपावली पर पटाखे फोड़ना हमारी प्राथमिकता थी और हम पटाखा व्यापारियों को हो चुके नुकसान का हवाला देकर सच को झूठलाने की कोशिश कर रहे थे। बेशक हवा में घुलते ज़हर को सरकार कम नहीं कर सकी है। सरकार के प्रयासों में वो गंभीरता नहीं है। अगर होती तो शायद तस्वीर इतनी धुंधली ना होती।

मतलब साफ है। हम हवा में घुलते ज़हर के कारणों का पोस्टमार्टम भी करते हैं, मगर खुद को बदलने के लिए ज़रा भी तैयार नहीं हैं। हां, अगर सरकार कोई ठोस कदम उठाती भी है तो सबसे पहले उसकी नीयत पर सवाल खड़ा करते हैं, इसके बाद सरकार की नीति पर असहयोग करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। अगर ऐसा ही रवैया है तो फिर ठीक है। यहां सब चलता है... की तर्ज पर चलने दीजिये, सेहत के लिये नासूर बन चुकी चीजों से समझौता कीजिये। घर के अंदर भी खांसिये और घर के बाहर भी..!

जो हालात हैं, उसमें इसी तरह जिंदगी बसर कीजिए, क्योंकि ये खतरनाक स्थिति हमारे निजी स्वार्थ, अहंकार, नासमझी और अड़ियल रुख से ही तो पैदा हुई है! इसलिये.. जो बोया है, वही काटेंगे भी..!


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