जागरूक नागरिक माने डिजिटल नागरिक, बोले वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी

Wednesday, 21 September, 2016

प्रमोद जोशी

वरिष्ठ पत्रकार ।।

‘डिजिटल-डेमोक्रेसी’ के पेचो-खम

हाल में गूगल की एशिया-प्रशांत भाषा प्रमुख रिचा सिंह चित्रांशी ने राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के छात्रों से कहा कि सन 2020 तक भारत की ऑनलाइन जनसंख्या 50 करोड़ पार कर जायेगी। इनमें से ज्यादातर लोग भारतीय भाषाओं के जानकार होंगे। यह सामान्य खबर है, पर इसके निहितार्थ असाधारण हैं। कनेक्टिविटी ने ‘डायरेक्ट डेमोक्रेसी’ की सैद्धांतिक संभावनाओं को बढ़ाया है। गोकि उस राह में अभी काफी दूर तक चलना है, पर भारत जैसे साधनहीन समाज में इंटरनेट ने बदलाव के नये रास्ते खोले हैं।

दस साल पहले नेट पर काफी कम लोग हिंदी लिख पाते थे। आज स्मार्टफोन हिंदी लिखने की सुविधा देते हैं। हालांकि, वॉट्सऐप और फेसबुक पर चुटकुलों और अफवाहों की भरमार है, पर यह ज्वार भी उतरेगा। संजीदगी की संभावनाएं भी कम नहीं हैं। प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारु बनाने में डिजिटाइजेशन का आकाश खुला हुआ है। एक जमाने में हम लोग हाइस्कूल के प्रमाणपत्र की ‘ट्रू कॉपी’ बनाने के लिए परचूनी दुकान से छपा हुआ फॉर्म लाते थे।

उसे भर कर किसी सम्मानित व्यक्ति की चिरौरी करते थे। फिर फोटोकॉपी का जमाना आया। ‘सेल्फ अटेस्टेशन’ की अनुमति हुई। जटिलताएं अब भी हैं। पासपोर्ट बनवा कर देखिये, पसीने आ जाएंगे। कंप्यूटराइज्ड रेलवे रिजर्वेशन ने काफी परेशानियां दूर कीं, पर कहीं न कहीं पेच फंसे हैं। ऑनलाइन रिजर्वेशन ने जीवन सरल किया, पर दलाली का चक्कर खत्म नहीं हुआ है। ड्राइविंग लाइसेंस के नियम पारदर्शी बने, पर दिक्कतें कहीं न कहीं फिर भी कायम हैं।

हाल में मुझे एक मृत्यु प्रमाणपत्र के सिलसिले में नगर निगम के कार्यालय में कई बार दौड़ लगानी पड़ी। इस दौड़ का लंबा अनुभव हममें से ज्यादातर लोगों के पास है। हम राशन कार्ड, गैस कनेक्शन, आधार कार्ड, वोटर कार्ड न जाने किस-किस चीज के लिए दौड़ते रहे हैं।

कागज बन जाता है, तो आपके नाम के हिज्जे गलत होते हैं। या पिता/ पति के नाम गलत। दो साल के बच्चे की उम्र 72 साल हो जाती है या मकान नंबर गलत। बिजली के बिल की रीडिंग गलत होती है। रीडिंग है तो कंप्यूटर में गलत फीड होती है। गलती होने के बाद करेक्शन के लिए दौड़ते हैं। एक मित्र अपना अनुभव बता रहे थे कि ‘मतदाता पहचान पत्र’ में करेक्शन के ऑनलाइन आवेदन के बाद दस्तावेज लेकर बिहार आने का हुक्म हुआ है। दिल्ली में काम करते हैं, घर बिहार में है। परेशानी तो है।

बताते हैं कि अमेरिका में सारे काम मिनटों में होते हैं। एक बार सोशल सिक्योरिटी नंबर मिल जाये, फिर सारे काम चट-पट हो जाते हैं। हम उसी रास्ते पर हैं, पर मशीनरी पुरानी है।

अर्थशास्त्री इशर जज अहलूवालिया ने देश के शहरीकरण पर काफी काम किया है। अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने एक दौर में इंडियन एक्सप्रेस में ‘पोस्टकार्ड्स ऑफ चेंज’ नाम से लेखों की लंबी सीरीज लिखी थी, जिसमें यह बात रेखांकित हुई कि किस तरह सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल ने व्यवस्था को चमत्कारिक तरीके से बदल दिया।

शहरों में सफाई, पानी और बिजली आपूर्ति से लेकर सार्वजनिक चिकित्सा व परिवहन जैसे हर काम में डिजिटाइटेशन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। सफाई कर्मचारियों की हाजिरी से लेकर ट्रांसफॉर्मरों की स्थिति, कंप्लेंट और फॉल्ट दूर करने के काम में हर जगह इंटरनेट और आइटी ने बदलाव किया है। पर तसवीर के पहलू और भी हैं। हाल में हमने ओड़िशा ढो रहा था। उसके बाद कई दिन तक ऐसी तसवीरें देखने को मिलीं।

यह रोज का नजारा है। चूंकि, यह टीवी पर दिखायी पड़ा इसलिए हमें आश्चर्य हुआ। फर्क उस तकनीक से पड़ा है, जिसने इसे दर्ज करके पूरे देश को हाथों-हाथ दिखाना शुरू किया है। वर्षों पहले हम अखबारों के दफ्तरों में सबसे तेज खबर उसे मानते थे, जो तार के मार्फत मिलती थी।

डाक से आई हफ्तों पुरानी खबरें प्रादेशिक पेज पर छपती थी। नब्बे के दशक में फैक्स से खबरें आने लगीं। बड़ी क्रांति इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में हुई, जब इंटरनेट ने छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में प्रवेश किया। फिर ब्रॉडबैंड ने इस गति को तेज किया। अचानक हमें जीवन की खामियां नजर आने लगीं हैं। ये दोष हमारे जीवन और समाज में पहले से उपस्थित हैं। अब हर हाथ में कैमरा है और हरेक के पास अपना चैनल है। ट्विटर और फेसबुक ने कहानी बदल कर रख दी है। इस दर्पण में हमारा समाज नजर आ रहा है।

रॉबिन जेफ्री की किताब ‘इंडियाज न्यूजपेपर रिवॉल्यूशन’ सन् 2000 में प्रकाशित हुई थी। उन्होंने इस बात की ओर इशारा किया कि अखबारी क्रांति ने एक नये किस्म के लोकतंत्र को जन्म दिया है।

उन्होंने 1993 में मद्रास एक्सप्रेस से आंध्र प्रदेश की अपनी यात्रा का जिक्र किया, जिसमें उनका सहयात्री एक पुलिस इंस्पेक्टर था। अखबारों के जिक्र पर पुलिसवाले ने कहा, अखबारों ने हमारा काम मुश्किल कर दिया है। पहले गांव में पुलिस जाती थी तो लोग डरते थे। पर अब नहीं डरते। रॉबिन जेफ्री जब दरोगा से बात कर रहे थे उसके बीस साल पहले कहानी कुछ और थी। तब सबसे नजदीकी तेलुगु अखबार तकरीबन 300 किलोमीटर दूर विजयवाड़ा से आता था। 1973 में ईनाडु का जन्म भी नहीं हुआ था। 1993 में उस इंस्पेक्टर के हल्के में तिरुपति और अनंतपुर से अखबारों के संस्करण निकलते थे। रॉबिन जेफ्री के उस अनुभव को चौथाई सदी बीत चुकी है और कहानी अखबारों के दायरे से बाहर जा चुकी है।

मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए गाजियाबाद नगर निगम के दफ्तर में दौड़ लगाते वक्त मुझे ज्ञान हुआ कि ऑनलाइन पंजीकरण कराने से नाम, पते और उम्र में गलती की संभावना कम होगी।

 ‘मतदाता पहचान पत्र’ के करेक्शन के लिए दफ्तर जाकर दस्तावेज दिखाने की जहमत भी तब नहीं उठानी होगी, जब ‘डिजिटल लॉकर’ पूरी तरह प्रभावी हो जायेगा। पश्चिमी देशों के मुकाबले हमारी चुनौतियां बड़ी हैं। वह समाज हमसे लगभग दो सौ साल पहले साक्षरता की न्यूनतम हदों को पार कर चुका है। हमारी दौड़ अभी जारी है। अब साक्षरता के साथ डिजिटल शब्द और जुड़ा है। जागरूक नागरिक माने डिजिटल नागरिक।

(साभार: प्रभात खबर)

समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।

 

पोल

आपको समाचार4मीडिया का नया लुक कैसा लगा?

पहले से बेहतर

ठीक-ठाक

पहले वाला ज्यादा अच्छा था

Copyright © 2017 samachar4media.com