'हम अफवाहों के अराजक जनतंत्र में घुस आए हैं, जहां कोई कुछ भी बोलने को आजाद है...'

'हम अफवाहों के अराजक जनतंत्र में घुस आए हैं, जहां कोई कुछ भी बोलने को आजाद है...'

Saturday, 14 October, 2017

जब भी कोई नया मीडिया आता है, वह अपने साथ कुछ अच्छाइयां और कुछ अनिवार्य बुराइयां लेकर आता है। समाज और सरकारों का यह दायित्व बनता है कि वे इसके दुष्प्रभावों से बचने की तैयारी करें।हिंदी दैनिक अखबार अमर उजाला में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहा वरिष्ठ पत्रकार व जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्रोफेसर गोविंद सिंह का। उनका ये आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं-

खबरों पर झूठ का साया

जिस सर्वोच्च न्यायालय ने दो वर्ष पहले सोशल मीडिया की गाली-गलौज को नजरअंदाज करते हुए आईटी ऐक्ट की धारा 66-ए को खारिज किया था, आज उसी अदालत को लग रहा है कि सोशल मीडिया पर नकेल जरूरी है। सर्वोच्च अदालत को लगता है कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग हो रहा है। उनके जरिये गलत सूचनाएं प्रसारित की जा रही हैं, झूठी खबरें परोसी जा रही हैं, दूसरों के खिलाफ आक्रामक और भद्दी टिप्पणियां की जा रही हैं। निजता का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है।

सरकारों ने, कंपनियों ने, राजनेताओं ने और राजनीतिक दलों ने अपने बारे में सकारात्मक और विरोधियों के बारे में नकारात्मक खबरें देने के लिए विशेषज्ञ रख छोड़े हैं। फर्जी कंटेंट लेखकों और हैंडलरों की एक नई फौज खड़ी हो गई है, जिनका काम ही अफवाहें और भ्रामक खबरें फैलाना है। उच्चतम न्यायालय ने चिंता जताते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर नकेल के लिए नियम बनाना जरूरी हो गया है। वास्तव में न्यायपालिका के बजाय विधायिका को इस संबंध में पहल करनी चाहिए।

सोशल मीडिया के जरिये अपने मन की भड़ास निकाल लेना कुछ हद तक समझ में आता है, लेकिन जिस तरह से आज सोशल मीडिया अफवाहों, झूठी खबरों और चरित्र हनन का अखाड़ा बन गया है, उससे सोशल मीडिया के अस्तित्व पर ही प्रश्न-चिह्न लग रहा है। ऐसा लगता है कि कोई कुछ भी बकने को स्वतंत्र है, किसी पर भी कीचड़ उछालने, चरित्र हनन करने का लाइसेंस मिल गया है। व्यक्तियों से ऊपर उठकर अब वे जातियों, संप्रदायों और धर्मों के बीच नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं। शीर्ष पुरुषों के खिलाफ ही नहीं, वे देवी-देवताओं तक पर कीचड़ उछालने से नहीं डरते। राजनीतिक रंजिश का बेहद घृणित रूप सामने आ रहा है। यहां तक कि अदालतों व न्यायाधीशों को भी बख्शा नहीं जाता। तथ्यात्मक सूचना, प्रचार सामग्री और विज्ञापन के बीच भेद कर पाना मुश्किल हो रहा है। लग रहा है, जैसे हम अफवाहों के अराजक जनतंत्र में घुस आए हों, जहां कोई भी कुछ भी बोलने को आजाद है। ऐसा करके सोशल मीडिया अपने लिए खुद खाई खोद रहा है।

दुर्भाग्य यह है कि पारंपरिक मीडिया पर भी इसका असर पड़ रहा है। जब भी कोई नया मीडिया आता है, वह अपने साथ कुछ अच्छाइयां और कुछ अनिवार्य बुराइयां लेकर आता है। समाज और सरकारों का यह दायित्व बनता है कि वे इसके दुष्प्रभावों से बचने की तैयारी करें। पश्चिमी देशों, जहां से इन माध्यमों का उद्भव हुआ, ने समय रहते अपने समाज के लिए उनके तोड़ भी तलाश लिए। चीन जैसे देश ने उन पर या तो प्रतिबंध लगा दिया या मजबूत फिल्टर खड़े कर दिए। हम बहुत देर में जागते हैं, वह भी विधायिका की बजाय न्यायपालिका।

कहा जा रहा है कि देश में मोबाइल फोनों की संख्या एक अरब पार कर गई है। इंटरनेटयुक्त स्मार्टफोनों की संख्या 70 करोड़ से कम न होगी। यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। मुट्ठी भर जागरूक लोगों को छोड़ दिया जाए, तो बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो छपे शब्द को ब्रह्मवाक्य मानते हैं। वे अफवाहों पर भरोसा करते और झूठी खबरों को सत्य मान लेते हैं। ग्रामीण जनता के लिए सत्य-असत्य में भेद कर पाना मुश्किल होता है। फेसबुक या ट्विटर के संचालकों ने कुछ प्रयास किए हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे अंततः व्यापारी हैं। असली जिम्मेदारी हमारी है। झूठ और नफरत का कारोबार हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा।

(लेखक जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्रोफेसर हैं)


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