‘पत्रकारों और ईमानदार अधिकारियों की प्रारंभिक रिपोर्ट पर लालूजी संभल जाते तो ये नहीं होता’

‘पत्रकारों और ईमानदार अधिकारियों की प्रारंभिक रिपोर्ट पर लालूजी संभल जाते तो ये नहीं होता’

Wednesday, 10 January, 2018

आलोक मेहता

वरिष्ठ पत्रकार ।।

न लालू जेल जाते, न ही खजाना लुटता

सचमुच लालू यादव जेल नहीं जाते। इसी तरह सरकारी खजाने से 950 करोड़ रुपये गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार से लूटे जाने के गंभीर मामले के बजाय लाखों गरीबों के कल्याण के काम आते। यह पढ़ते हुए आप चौक सकते हैं। यहां तक कि बहुचर्चित चारा कांड में लालू यादव तथा अन्य व्यक्तियों को दूसरी बार सजा घोषित होने के स्वागतकर्ता या विरोधी भी संभवतः याद नहीं कर सके हैं।

स्मृति की समयावधि छोटी हो सकती है, लेकिन लिखा-छपा रिकॉर्ड आसानी से विलुप्त नहीं हो सकता है। अब कारण जान लीजिए। सामान्यतः यह तथ्य सामने आता है कि चारा कांड 1994 में उजागर हुआ। लेकिन असलियत यह है कि पशु पालन विभाग में लाखों रुपयों की गड़बड़ी का सनसनीखेज भंडाभोड़ 1990 के अंतिम महीनों और 1991 के प्रारंभ में पटना से प्रकाशित हो रहे प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक (नवभारत टाइम्स) में छप गया था। तब राजेन्द्र माथुर प्रधान संपादक थे और मैं स्वयं बिहार में स्थानीय संपादक था।

एक शाम राज्य सरकार के ही एक वरिष्ठ अधिकारी प्रदेश के ऑडिटर जनरल की पूरी फाइलनुमा रिपोर्ट की प्रति लेकर ही मेरे पास आ गए। पर्याप्त दस्तावेज, हस्तलिखित पत्रकार की प्रतियां भी उपलब्ध थी। अपरिचित से अधिकारी यह संभावना टटोलने आए थे कि लालू यादव के मुख्यमंत्री रहते क्या मैं और मेरा अखबार इस रिपोर्ट को छापने की हिम्मत कर सकेगा? थोड़ी बातचीत में उन्हें कुछ उम्मीद दिखी। मैने भी हड़बड़ी के बजाय लंबी चौड़ी रिपोर्ट ध्यान से पढ़ने के बाद छापने का थोड़ा भरोसा दिलाया। सरकार की अपनी अधिकृत रिपोर्ट और वर्तमान मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के हस्ताक्षरों वाले पत्रों में गड़बड़ी के जिम्मेदार अधिकारियों के प्रति विशेष कृपा संबंधी टिप्पणियों को प्रमाण हम जैसे पत्रकारों के लिए छोटे मोटे खजाने से कम नहीं हो सकते। इसलिए लगभग 48 घंटों में उन पत्रों की छोटी कॉपी के साथ ऑडिट रिपोर्ट पर आधारित मेरी लिखी पहली रिपोर्ट पहले पृष्ठ पर प्रमुखता से छप गई।

एक रिपोर्ट में सब बातें आ नहीं सकती थी। इसलिये अगले दिनों में हमारे सहयोगी उदय कुमार के नाम से कुछ किस्तें छपी। पराकाष्ठा यह थी कि उस रिपोर्ट में उदय कुमार के ही विवादास्पद एक अधिकारी रिश्तेदार का नाम भी था। लेकिन उन्होंने लिखने में संकोच नहीं किया। पत्रकारिता सही मायने में न्याय और शल्य चिकित्सा की तरह नुकीले मानदंडों पर निर्भर रहती है। रिपोर्ट पर हंगामा स्वाभाविक था। अखबार के प्रिंटिंग प्रेस परिसर (जो संपादकीय कार्यालय से 6 किलोमीटर दूर था) पर लालू जी के समर्थक कार्यकर्ताओं ने दिन में हमला किया- एक हिस्से में थोड़ी आग भी लगी। प्रशासन सक्रिय हुआ। बाद में लालू यादव संपादकीय दफ्तर में मुझसे मिलने भी आए और हमले की घटना पर खेद भी जताया। बहरहाल, उन्हें यह अहसास हो गया कि हमारा कोई राजनीतिक पूर्वाग्रह नहीं है और दस्तावेज प्रमाणिक हैं। वे और उनके समर्थक इसे जातिगत पूर्वाग्रह के आरोप मात्र लगाकर टाल गये।

अखबार में इस घोटाले के आलावा लालू सरकार के कामकाज, इंटरव्यू भी छपते रहे। प्रधान संपादक और प्रबंधन की तरफ से कोई विपरीत प्रतिक्रिया नहीं आई। राजेन्द्र माथुर जी से शाबाशी के साथ हमले इत्यादि से सतर्क रहने की सलाह अवश्य मिली। फिर 1991 में ही उनका आकस्मिक निधन हुआ और मैं भी दिल्ली संस्करण में आ गया। सरकारी ऑडिट रिपोर्ट और अखबारी खबरों से सत्ताधारी लालू यादव और उनकी टीम ने ज्यादा चिंता नहीं की। पहले दौर में तो पशुपालन विभाग से गरीब ग्रामीणों को सरकार द्वारा सहायता के रूप में गाय, भैंस, बकरी जैसे पशु दिए जाने का हिसाब-किताब था। ऑडिट रिपोर्ट से यह तथ्य सामने आ रहे थे कि इस पशु वितरण के लिए खजाने से लाखों रुपये निकले। पशुओं को भेजने के लिए वाहनों का इंतजाम और खर्च हुआ। गड़बड़ी यह उजागर हुई कि कई वाहनों के नंबर स्कूटर, छोटे टेंपो आदि के थे और उन पर दस-बीस भैसों को ढोए जाने का दावा किया गया था। मतलब न पशु भेजे गए और न ही बांटे गए।

असल में पशुपालन विभाग में नेताओं और अधिकारियों की मिली भगत का खेल पहले से चला आ रहा था। जब लालू यादव प्रतिपक्ष के नेता थे, तो भ्रष्ट अधिकारी की पैरवी वाले पत्र तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को भेजते थे। जब स्वयं मुख्यमंत्री बन गए, तो ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों के तंत्र का विस्तार हो गया। प्रतिपक्ष में भी जगन्नाथ मिश्र जैसे कुछ प्रमुख नेता थे। इसलिए सरकारी खजाने से पशुओं अथवा उनके चारे-दाने, दवाई के नाम पर करोड़ों रुपयों की हेराफेरी होती रही।

सबसे मजेदार बात यह है कि सारी बदनामियों के बावजूद बिहार में ईमानदार अधिकारियों का भी एक वर्ग रहा है। इसलिये भ्रष्टाचार का नाला उफान पर पहुंचने के बाद 1994 में गुमला, रांची, पटना, डोरडा, लोहरदगा की इंजरी टजरी (कोषागार) से फर्जी बिलों के जरिये लाखों करोड़ों रुपयों की अवैध निकासी के मामले दर्ज हो गए।

घोटाले से जुड़े अधिकारी, कर्मचारी, ठेकेदार, चारा या पशुओं की दवा के सप्लायर गिरफ्तार होने लगे। पिछले दिनों देवघर खजाने से जुड़े मामले में ही न्यायालय ने लालू यादव को साढ़े तीन वर्ष और अन्य अभियुक्तों को पांच से सात साल की सजा सुनाई। देवघर खजाने से भी 1990 से 1994 के बीच फर्जी बिलों और आर्थिक गड़बड़ियों का रिकार्ड सी.बी.आई. ने अदालत को दिया था। किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी की ओर से निर्दोष होने का दावा ही किया जाता है। लेकिन इस मामले में कम से कम यह स्वीकारा जाना चाहिए कि लालू यादव के सत्ता में रहते ही ऑडिट और अन्य जांच रिपोर्ट आई एवं गिरफ्तारी सहित कार्यवाही शुरू हुई।

हां, 1997 में सी.बी.आई. ने जब इस कांड की पूरी चार्जशीट ही अदालत को सौंप दी, तब लालू जी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी राबड़ी देवी जी को सौंपकर कुछ अर्से के लिए जेल जाना स्वीकारा। फिर जमानत पर आना-जाना जारी रहा। अक्टूबर 2013 में अदालत द्वारा दोषी करार दिए जाने के साथ पांच साल की सजा सुनाने से लालू यादव चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो गए। तथ्यों पर विस्तार से नज़र डालें, तो यह भी पता चलेगा कि सी.बी.आई. के कुछ अधिकारियों और केन्द्र या राज्य के राजनीतिक सत्ताधारियों ने भी समय-समय पर इस कांड में लालू यादव सहित कुछ लोगों को बचाने का प्रयास किए।

प्रारंभ से विरोध कर रही भारतीय जनता पार्टी के अधिकांश नेता 1994 के बाद लगातार लालू यादव एवं उनकी मंडली को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश में लगे रहे। यों 1996-97 में मैंने अपनी एक लंबी टिप्पणी में भाजपा के भी एक नेता द्वारा इस कांड के कुछ दोषियों को बचाने संबंधी उनकी ही पाटी के एक अन्य नेता के आरोप का उल्लेख किया था। यही नहीं अदालत में तो चारा कांड की सुनवाई के दौरान एक अभियुक्त और गवाह ने नीतीश कुमार को भ्ज्ञी बड़ी धनराशि देने का गंभीर आरोप लगाया था। लेकिन उसके पर्याप्त प्रमाण संभवतः उपलब्ध नहीं हुए।

मतलब भ्रष्टाचार के इस सबसे बड़े घोटाले में विभिन्न दलों, जातियों, धर्मों से जुड़े नेता, अधिकारी, ठेकेदार, दलाल शामिल रहे हैं। किसी पर पूर्वाग्रह का आरोप कैसे लग सकता है। हां इतना कहा जा सकता है कि यदि हम जैसे सामान्य पत्रकारों और कुछ ईमानदार अधिकारियों की प्रारंभिक रिपोर्ट पर लालू की संभल जाते और सरकारी मशीनरी भी धारा बदल लेती, तो भारत का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार का घोटाला नहीं होता तथा बिहार भी ऐसे कलंक से बच जाता।


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