इशारों ही इशारों में बहुत कुछ कह गए वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी...

इशारों ही इशारों में बहुत कुछ कह गए वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी...

Monday, 27 November, 2017

पुण्य प्रसून बाजपेयी

वरिष्ठ पत्रकार ।। 

चाय के प्याले से कहीं ज्यादा तूफान है चाय के साथ बात में

चाय की केतली से निकलता धुआं... और अचानक जवाब हमारी तो हालत ठीक नहीं है। क्यों इसमें आपकी हालत कहां से आ गई। अरे भाई पार्टी तो हमारी ही है और जब उसकी हालत ठीक नहीं तो हमारी भी ठीक नहीं। यही तो कहेंगे। ठीक नहीं से मतलब, मतलब आप खुद समझ लीजिये। क्यों गली गली... बूथ-बूथ... घूम रहे हैं। हां, जब कोई दरवाजे-दरवाजे घूमने लगे तो समझ लीजिये। ये हालत यूपी में तो नहीं थी। नहीं पर गुजरात की गलियां तो उन्होंने ही देखी हैं। बाकी तो पहली बार गलियां देख रहे हैं। सही कहा आपने गुजरात की गलियां सिर्फ उन्होंने देखी हैं, बाकियों को कभी देखने दी ही नहीं गई। अब जब हालात बदल रहे हैं तो गली गली घूम रहे हैं। वर्ना ये घूमते ...फिर भी कितनी सीट मिलेंगी। सर्वे में तो 80 पार करना मुश्किल लग रहा है। सर्वे ना देखें मैनेज हो जायेगा। मैनेज हो जाये तो ठीक। क्यों ईवीएम ?? न न आप ईवीएम की गड़बड़ी की बात मत करिए। ईवीएम में कोई गड़बड़ी नहीं है।

हमने तो 1972 का दौर भी देखा है जब इंदिरा गांधी जीत गई तो बलराज मधोक और सुब्रमण्यम स्वामी थे। उन्होंने कहा गड़बड़ी बैलेट पेपर में थी। मास्को से बैलेट पेपर बन कर आये हैं, जिसमें ठप्पा कही भी लगाइए पर आखिर में दो बैलों की जोड़ी पर ही ठप्पा दिखायी देता है। ये सब बकवास तब भी था। अब भी है। तो अगर मैनेज हो ना पाया, तब क्या होगा? तब... संविधान कुछ और तोड़-मरोड़ दिया जायेगा। आप देख नहीं रहे है संसद का शीत कालीन सत्र टालना और टालते हुये एहसास कराना कि हम कुछ भी कर सकते हैं।ये खतरनाक है। लेकिन हमें लगता है गुजरात हार गये तो डर जायेंगे। कुछ लोकतांत्रिक मूल्यो की बात होगी। अरे... तो डर में ही तो सबकुछ होता है। डर ना होता तो गुजरात देश से बड़ा ना होता। लेकिन कोई है भी नहीं जो कहें कि गलत हो रहा है। ठीक कह रहे है ...मूछें ऐंठते रहिये ...हम कैबिनेट मंत्री हैं। सारी ठकुराई निकल गई। पर गुजरात के बाद हो सकता है कोई निकले ...अरे तब निकलने से क्या होगा। याद कीजिये निकले तो जगजीवन राम भी थे। पर कब... और हुआ क्या। बहुगुणा को ही याद कर लीजिये। निकलने के लिये नैतिक बल चाहिये। गाना सुना है ना आपने... सब कुछ लुटाकर होश में आये तो क्या मिला।तो पार्टी तो आपकी है ....फिर आप क्यों नहीं।

देखिये अभी अपने अपने स्वार्थ के आसरे एकजुटता है। तो स्वार्थ हित कहता है विरोध मत करो। तो फिर हर कोई वैसे ही टिका है और ये पार्टी दफ्तर नहीं रोजगार दफ्तर है। जो कार्यकर्ता बन गया उसे कुछ चाहिये और कुछ चाहिये तो कुछ का गुणगाण करना भी आना चाहिये। तो चल रहा है। पर ये कब तक चलेगा। जब तक जनता को लगेगा और जनता को कब तक लगेगा? जब तक उसे भूख नहीं लगेगी। भूख नहीं लगेगी का क्या मतलब हुआ? देखिये आज आपका पेट भी आजाद नहीं है। दिमाग तो दूर की बात है। आप खुद को ही परख लीजिये ...और बताइये..मीडिया का क्या हाल है...सभी के अपने इंटरेस्ट हैं। तो झटके में संपादक कहां चला गया। इंदिरा के दौर में तो संपादक थे।  इमरजेंसी लगी तो विरोध हुआ।

अब देखिये वसुंधरा राजे की नीतियों का विरोध करते हुये एक अखबार संपादकीय खाली छोड़ देता है तो आपके मन में ये सवाल नहीं आता जिस देश में सरकार ने आपकी जिन्दगी को कैशलेस कर अपनी मुठ्ठी में सबकुछ समेटने की कोशिश की है उसके खिलाफ कोई अखबार संपादकीय खाली क्यो नहीं छोड़ता है? देखिये लोकतंत्र का स्वांग आप भी कर रहे हैं। और लोकतंत्र के इस स्वांग को जनता भी देख रही है। अगर लोकतंत्र के चारो पाये ही बताने लगे कि लोकतंत्र का मतलब वंदे मातरम् कहने में है तो जनता क्या करेगी। उसकी लड़ाई तो भूख से है। रोजगार से है। हर कोई स्वांग कैसे कर रहा है आप खुद ही देख लीजिये...एक ने कहा गंगा में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट बनायेंगे। दूसरा बोला गंगा में बड़ी बस चलायेगें। तीसरा बोला शुद्द करेंगे ...अविरल कौन करेगा कोई नहीं जानता। और हालात इतने बुरे हो चले है कि दुनिया के रिसर्च स्कॉलर गंगा पर शोध कर समूचा खाका रख दे रहे हैं। अरे उन्हें ही पढ़ लो। आप भी पढ़िए ..ऑक्सफोर्ड पब्लिकेशन से एक किताब आई है गंगा फॉर लाइफ- गंगा फॉर डेथ’, सबकुछ तो उसने लिख दिया। और जिस गंगा पर देश की 41 फीसदी आबादी निर्भर है। उस गंगा को लेकर भी आप मजाक ही कर रहे है।

अरे... चाय तो पीजिये। ग्रीन टी है। इसमें केसर मिलाकर पिया कीजिये इस मौसम में तबियत बिगड़ेगी नहीं। जी... अच्छी है  चाय... हां हां इसमें शहद भी मिलाया कीजिये। गला साफ रहेगा... हां मेरी तो तबियत बिगड़ी हुई है। गला भी जाम है। पॉल्युशन दिल्ली में खासा बढ़ा हुआ है। अब आप भी पॉल्युशन के चक्कर मे ना रहिये ...दिल्ली कोई आज से पॉल्युटेड है ...याद कीजिये 70-80 के दशक से ही दिल्ली में राजस्थान से रेगिस्तानी हवा उड़ कर आती थी। पूरा रिज का इलाका ...वहां भी सिर्फ धूल ही धूल। हम काली आंधी कहते थे। घर के दरवाजे, खिड़की बंद करनी पड़ती थी। और ये गर्मी के वक्त तीन महीने मई से जुलाई के दौर में रहता था। तब पॉल्युशन नहीं रहता था। क्या, ...प्रदूषण पूरे देश में है। पर प्रदूषण से बचने के उपाय का बाजार दिल्ली में है। तो डर के इस बाजार को हर जगह पैदा किया जा रहा है। देखिये जब कोई काम नहीं होता है तो ऐसा ही होता है।

दिल्ली-मुबई के जरिये बताया गया  इज ऑफ बिजनेस’ ...अरे भाई मौका मिले तो एक बार विदेश मंत्रालय की ऑफिशियल साइट को ही देख लीजिये। अगर देश में धंधा करना इतना शानदार है तो फिर बीते दो-तीन बरस में सबसे ज्यादा भारतीय देश छोड़कर चले क्यों गये ...लगातार जा रहे हैं।

आपको आंकडे मिल जायेंगे। कैसे कब दो करोड़ से चार करोड़ भारतीय विदेश में बसने की स्थिति में आ गये।  द इकनॉमिक इंपोर्टेस ऑफ हंटिंगपढ़ें... आप बार बार किताबों का रेफरन्स देते हैं। तो क्या मौजूदा वक्त में कोई पढ़ता नहीं? पढ़ता होगापर आप जरा सोचिये जर्मनी की चांसलर से लेकर हर कोई भारतीय प्रमुखों के सामने बैठे हैं। और अचनक एक नौकरशाह बताने लगे कैसे खास है हमारे वाले... बहुत बोलते नहीं, पर बड़े बड़े काम खामोशी से करते हैं, यानी राग दरबारी दुनिया के बाजार में भी... तो प्रभावित हर किसी को होना ही चाहिये। हो भी रहे हैं। पहली बार हर कोई देख रहा है। इस लहजे में भी बात होती है।

आप जरा रूस के राष्ट्रपति पुतिन को ही देख लें। कैसे आज की तारीख में वह कितने ताकतवर हैं, और कैसे हो गये। रूस तो खुलापन खोजते खोजते ढह गया.. और पुतिन के ही सारे सगे संबंधी हर बड़ी कंपनी के सर्वेसर्वा हैं। अब गैस की पाइपलाइन को थोड़ा सा ही ऐंठ दिया तो जर्मनी तक पर संकट आ जायेगा। अरे हम तो एनर्जी से लेकर रोजगार तक को लेकर ड्राफ्ट तैयार किया। देश की आठ प्राथमिकता क्या होनी चाहिये इसे बताया। 2014 के मैनिफेस्टो को ही पलट कर आप देख लीजिये.. देखिये बौद्धिकता एक जगह, सत्ता हांकना एक जगह। दिल्ली से सटा इलाका है मानेसर। वहां पर दिमाग का रिसर्च सेंटर है। पर जरा किसी से पूछिये दिमाग और माइंड में अंतर क्या है? कौन बतायेगा? दरअसल ब्रेन इज द साउंड बाक्स आफ माइंड। या आप कहें ब्रेन कंप्यूटर है। पर माइंड सॉफ्टवेयर है। पर यहां तो बात हार्डवर्क की हो रही है...कौन ज्यादा से ज्यादा दौड़ता नजर आ रहा है?

...बाते चलती रहीं। चाय की और प्याली भी आ गई। पर ये बात किससे हो रही है... कहां हो रही है। हमारे ख्याल से ये बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिये। सिर्फ समझ लेना चाहिये हवा का रुख है कैसा... तो आप सोचिये कौन है ये शख्स।

(साभार: वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के ब्लॉग prasunbajpai.itzmyblog.com से)


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