आज पत्रकारिता के मूल सिद्धांत हो गए ग्लैमर, रुतबा और पैसा

Tuesday, 30 May, 2017

अमिताभ श्रीवास्तव

वरिष्ठ पत्रकार ।।

अब भाषा से दुष्कर्म करने में भी कोई शर्म नहीं

ये 1992 का पत्रकारिता का दौर था जब मैं माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल के पहले बैच से प्रशिक्षण लेकर नईदुनिया भोपाल के दफ्तर पहुंचा था। उस वक्त स्व. मदन मोहन जोशी संपादक थे और पत्रकारों में उनकी कठोरता के किस्से पहले ही कानों तक गूंज रहे थे। मुलाकात हुई, बात हुई और अपनी फाइल दिखाई जिसमें तमाम समाचारपत्रों में छपे लेख थे। पन्ने पलटते हुए बोले, लिखते तो ठीक है, भाषा ठीक है, उन्होंने घंटी बजाई और संपादकीय पेज के सहयोगी को बुलाया। उनके हवाले किया और बोले इन्हें देखो। चार पांच दिन संपादकीय पेज रहा, जोशी तक ओके रिपोर्ट गई तो केबिन में बुलाया और रिपोर्टिंग डेस्क के हवाले कर दिया। इस तरह भाषा के बलबूते पर मैं नईदुनिया का भोपाल में रिपोर्टर बन गया।

भाषा क्या होती है, ये जाना वहां काम करने के दौरान, उस वक्त मोबाइल तो थे नहीं, जैसे ही दफ्तर से निकलने के बाद जोशी जी का फोन आता,समझ जाते थे कि रास्ते में भी उनका मन संपादकीय पढ़ रहा था, जिसने भी फोन उठाया, उसे कहा जाता था कि संपादकीय पेज की किस लाइन में कौन सा कोमा या पूर्ण विराम हटाना है और कौन शब्द बदलना है। उन्हें एक एक लाइन याद रहती थी और एक एक शब्द को लेकर उनका आग्रह समझ में आता था कि पत्रकारिता में भाषा का कितना महत्व है।

जब बाइलाइन छपती थी तो सामने पन्ने दर पन्ने लिखवाना और उन्हें फिर फाड़ना, समझ में आता था कि पत्रकारिता आसान नहीं। पूरा केबिन पन्नों से भर जाता था। उस वक्त कंप्यूटर तो थे नहीं। तेजी से लिखते लिखते हाथों में दर्द होने लगता था। जमाना बदल गया तो पत्रकारिता के अंदाज बदल गए। कंप्यूटर और मोबाइल आ गए और सूचना तंत्र तेज हो गया लेकिन पत्रकारिता के मूल सिद्धांत, परंपरा, कामकाज का तरीका कहीं पीछे छूट गया। नईदुनिया के बाद मुझे किसी ने नहीं सिखाया, जो लिखा, जस का तस छप गया, जैसा लिखा, सत्य हो गया।

 

आज के दौर में जो युवा आ रहे हैं वो नहीं जानते कि भाषा किस चिड़िया का नाम है। जिससे जितना बन रहा है, भाषा से दुष्कर्म करने से नहीं चूक रहा। रोमन में लिखी स्क्रिप्ट में यूपी में गड्ढा मुक्त सड़क की जगह गदहा मुक्त सड़क भी छप जा रहा था। कोमा और विराम कहां लगनी है, ये बात तो दूर की बात है। आज पत्रकारिता के मूल सिद्धांत हो गए ग्लैमर, रुतबा और पैसा। टाई और शूट वाले हो गए। किसी पार्टी के प्रवक्ता बनने में अब उन्हें कोई शर्म नहीं और वक्त के साथ पलटने में कोई दिक्कत नहीं। अब खबरों की भाषा और शैली पर चर्चा नहीं होती। तमाम नए युवाओं से चर्चा होती रहती है, जब उनका लिखा देखते हैं तो लगता है कि एक साल से तीन साल तक का कोर्स करने के बाद भी उनके शिक्षकों ने भाषा नहीं सिखाई।

टीवी का कोर्स करने वालों को ये नहीं पता कि टीवी में प्रचलित बाइट या प्रोमो क्या है। उन्हें ये नहीं मालूम कि स्क्रिप्ट किस तरह लिखी जाती है। हैरानी होती है कि तीन साल तक प्रशिक्षण के बाद उन्होंने सीखा है तो इंटरव्यू लेना। लेकिन ये नहीं सीखा कि इंटरव्यू लेना कैसे है। किसी की दिलचस्पी डेस्क में नहीं। पूछता हूं तो कहते हैं कि एंकर या रिपोर्टर। रिपोर्टर भी पॉलिटिकल। सीखने में वक्त क्या बर्बाद करना। जितनी देर में सीखेंगे उतनी देर में तो वे स्टार एंकर हो जाएंगे। फिर स्त्रीलिंग को पुर्लिंग बोले, क्या फर्क पड़ता है। स्टार हैं, एंकर हैं, जो कहेंगे, वही सत्य होगा और इसी से कड़वा सच पनपता है जब लोग कहते हैं कि चैनल, अखबार और पत्रकार किस दल से हैं। कोई बुराई नहीं है किसी दल से जुड़ना, लेकिन पत्रकारिता छोड़ कर कई पत्रकार नेता बने हैं। वो उनका फैसला है, लेकिन दोनों साथ साथ तो नहीं चल सकते और चलेंगे तो पत्रकारिता का बेड़ा गर्क होगा ही।


 

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