'तथ्य और सत्यपरक निष्पक्षता अब पत्रकारिता की मजबूरी भी है'

'तथ्य और सत्यपरक निष्पक्षता अब पत्रकारिता की मजबूरी भी है'

Wednesday, 30 May, 2018

विनोद अग्निहोत्री

सलाहकार संपादक, अमर उजाला समूह ।।

सत्य और तथ्य के साथ खड़े होना ही निष्पक्षता है

प्रसिद्ध हिंदी कवि श्री रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियां मुझे बहुत प्रेरणा देती हैं-

समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध।

जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।।

दरअसल तटस्थता जिसे हम निष्पक्षता भी कहते हैं माना जाने लगा है कि इन दिनों बेहद दुर्लभ गुण हो गया है। विशेषकर जब हम पत्रकारिता की बात करते हैं तो इनदिनों यह आम शिकायत है कि पत्रकारिता अब निष्पक्ष नहीं रह गई है। पत्रकारिता जिसने मीडिया के रूप में एक व्यापक आकार ले लिया है, अब सिर्फ कोरे कागज पर प्रकाशित अखबार और पत्रिकाओं तक ही सीमित नहीं है, अब इसका स्वरूप बेहद विकसित तकनीक पसंद और व्यापक हो गया है। अखबारों और पत्रिकाओं के साथ साथ टेलिविजन समाचार चैनलों, समाचार वेबसाइटों और सोशल मीडिया के आयाम भी इसमें शामिल हो गए हैं। इसलिए अब मीडिया शब्द का प्रचलन और प्रयोग ज्यादा सार्थक और स्वीकार्य होता जा रहा है।

सवाल है कि मौजूदा दौर में मीडिया की तटस्थता कहां लुप्त होती जा रही है या यूं कहा जाए कि निष्पक्ष और तटस्थ पत्रकार लुप्त होती प्रजाति क्यों बनते जा रहे हैं। मीडिया या पत्रकारिता की निष्पक्षता या तटस्थता को लेकर मेरी धारणा थोड़ी अलग है। हालांकि पत्रकारिता के आरंभिक दिनों से लेकर आज तक मीडिया शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता को पत्रकारिता की पहली और अनिवार्य शर्त के रूप में पढ़ाया जाता है। 1980 के मध्य के दशक में जब मैने नवभारत टाइम्स से अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत की थी, तब भी मेरे वरिष्ठ संपादकीय सहयोगियों ने मुझे यही बताया था कि पत्रकार को पूरी तरह निष्पक्ष होना चाहिए। उसे किसी का पक्ष लेकर अपनी कलम नहीं चलानी चाहिए। मैंनें भी पत्रकारिता के इस मूलमंत्र को अंगीकार किया, उसका पालना करने की कोशिश आज तक कर रहा हूं।

लेकिन तीन दशकों से भी ज्यादा अपने पत्रकारीय सफर में मैने निष्पक्ष पत्रकारिता की परिभाषा को एक अलग तरीके से विकसित किया है। मेरी राय में निष्पक्ष या तटस्थ पत्रकारिता का मतलब तथ्य और सत्य के साथ खड़े होना है। इसे जनपक्षधरता भी कहा जाता है, लेकिन अगर जनसमूह भीड़तत्रं में बदल जाए तब पत्रकार को सत्य और तथ्य के साथ धारा के विरुद्ध अकेले भी खड़ा होना पड़ सकता है। पत्रकार डाकिया नहीं होता कि सिर्फ इधर से सूचना या जानकारी लेकर अपने पत्र- पत्रिका, समाचार चैनल, वेबसाइट इत्यादि के जरिए दूसरी तरफ पहुंचा दे। पत्रकार का एक नजरिया भी होता है जो उसके अनुभव, समझदारी और तथ्यों के विश्लेषण से विकसित होता है, इसमे उसकी वैचारिक निष्ठा का भी प्रभाव होता है। इसलिए अक्सर हम एक ही मुद्दे घटना या विषय पर अलग-अलग पत्रकारों की रिपोर्ट विश्लेषण या मौखिक राय अलग-अलग देखते हैं।

मुझे लगता है कि यह गलत भी नहीं है और इससे पाठकों को एक ही मुद्दे विषय और घटना पर अलग-अलग नजरिया पढ़ने और सुनने को मिलता है। लोकतंत्र की मजबूती और विकास के लिए यह बेहद सकारात्मक पहलू है और इससे समाज में बहस और विमर्श को बल मिलता है। दुनिया के विकसित लोकतांत्रिक देशों में मीडिया की यह प्रवृत्ति आम है। जबकि इसके उलट एकाधिकारवादी और तानाशाही व्यवस्था वाले देशों में मीडिया सिर्फ चुनिंदा तथ्यों और उनके सरकारी विश्लेषण तक ही सीमित रहता है। इसलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्वस्थ मीडिया के लिए जरूरी है कि उसमें मुद्दों, घटनाओं और तथ्यों के विश्लेषण पर अलग-अलग नजरिये से बहस और विमर्श होता रहना चाहिए। निष्पक्ष पत्रकारिता की शास्त्रीय परिभाषा के समर्थक इससे असहमत हो सकते हैं लेकिन सूचना क्रांति के विस्फोट के बाद पत्रकारिता अब एक नए दौर में पहुंच गई है और उसे तटस्थता की जड़ परिभाषा के दायरे में बांधे रखना मुमकिन नहीं है।

सवाल उठता है कि तब क्या पत्रकारिता में निष्पक्षता को तिलांजलि देकर उसे खुले सांड की तरह मनमाने तरीके और एकतरफा सोच के भरोसे छोड़ देना चाहिए, जिसमें न निष्पक्षता हो न कोई मूल्य हों न कोई मर्यादा और न ही तथ्यपरकता। नहीं, मैं इसके पक्ष में बिल्कुल नहीं हूं। मेरी मान्यता है कि पत्रकारिता को तटस्थ नहीं बल्कि तथ्य और सत्यपरक होना चाहिए। यानी उसे तथ्य और सत्य के साथ होना चाहिए और शुरू से ही पत्रकारिता इसी बुनियाद पर खड़ी रही है।

आजादी के आंदोलन के दौर में जहां अंग्रेजी पत्रकारिता आमतौर पर ब्रिटिश हुकूमत के साथ थी, वहीं भाषाई पत्रकारिता स्वतंत्रता आंदोलन के साथ थी और उसके अनेक पत्रकार जिनमें बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर महात्मा गांधी तक शामिल थे, स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी सेनानी थे। अगर ये निष्पक्ष होते तो सिर्फ अखबारों में संतुलनकारी लेख ही लिख रहे होते, लेकिन उनकी पक्षधरता थी और वह पक्षधरता देश की जनता और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति थी। लेकिन इस पत्रकारिता में तथ्य और सत्य परकता थी, जो इसकी ताकत थी जिसकी वजह से ब्रिटिश हुकूमत न उसे तोड़ सकी न झुका पाई। पक्षधरता के बावजूद यह पत्रकारिता न उन्मुक्त थी न खुले सांड़ की तरह बेलगाम थी। उसमें पत्रकारीय मूल्य भी थे और मर्यादा भी थी।

आजादी के बाद की पत्रकारिता की पक्षधरता राष्ट्र निर्माण के प्रति हो गई। उस जमाने के पत्र-पत्रिकाओं में राष्ट्र निर्माण और सामाजिक विकास के विमर्श की भरमार थी। उसमें सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों की जानकारी, आलोचना, विश्लेषण और सुझाव होते थे। लेकिन साठ के दशक के आखिर और सत्तर के दशक की शुरुआत में जब देश में मौजूदा कांग्रेस सरकार के प्रति असंतोष बढ़ रहा था, तब जनपक्षधरता और खोजी पत्रकारिता का नया दौर शुरू हुआ। सरकारों और प्रशासन के घपले घोटाले नेताओं और अफसरों के भ्रष्टाचार, गरीबों दलितों वंचितों पर अत्याचार, सांप्रदायिकता के उन्माद में अल्पसंख्यकों पर हिंसक हमलों की खबरें सुर्खियां बनने लगीं। विचारोत्तेजक संपादकीय और लेखों से सरकारी नीतियों सामाजिक कुरीतियों राजनीतिक दलों के पाखंड पर तीखे हमले किए जाने लगे। यह तटस्थ नहीं बल्कि सत्य और तथ्यपरक पत्रकारिता का नया दौर था। लेकिन आपातकाल में पत्रकारिता सेंसरशिप की जंजीरों में जकड़ गई। लेकिन जल्दी ही यह दौर भी बीता।

अस्सी के दशक में आते आते पत्रकारिता का यह आयाम और व्यापक हो गया। राज्यों के बाद केंद्र की सत्ता से भी उसका टकराव बढ़ गया। इसी दौर में उस पर अंकुश लगाने के लिए बिहार प्रेस विधेयक और मानहानि विधेयक जैसे कानून बनाने की कोशिश भी हुई लेकिन पत्रकारों और जनता के विरोध की वजह से सरकारों के अपने कदम वापस खींचने पड़े। तबसे लगातार पत्रकारिता और अब मीडिया नया रूप ले चुकी है। पत्रकारिता में वैचारिक लाइन पर विभाजन कोई नई बात नहीं है। पहले भी वैचारिक आधार पर पत्रकारों के खेमे स्पष्ट दिखाई पड़ते थे और अब भी। लेकिन अब वैचारिक आधार के साथ-साथ अवसरवाद और व्यवसायिक हितों के दबाव ने पत्रकारों और मीडिया की तथ्यपरकता और सत्यनिष्ठा को प्रभावित किया है।

बड़े मीडिया संस्थानों में सीधे तौर पर कार्पोरेट जगत की हिस्सेदारी और मिल्कियत, राजनीतिक दलों की घुसपैठ और मीडिया मुगलों की राजनीतिक और व्यसायिक महत्वाकांक्षाओं ने पत्रकारिता को तथ्य और सत्य से दूर करते हुए अपने स्वार्थों की पूर्ति के हथियार और आथिर्क साम्राज्य के रक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।

पत्रकारिता पर दबाव पहले भी थे और आज भी हैं। लेकिन मुझे विश्वास है कि पत्रकारिता इन दबावों से पहले भी लड़ी है और आज भी लड़ रही है। सोशल मीडिया के इस दौर में खबरों, घटनाओं के खुलासे और मुद्दों पर विमर्श पर बड़े मीडिया समूहों का एकाधिकार खत्म होता जा रहा है। हाल ही सत्ता प्रतिष्ठान को अखरने वाली कई खबरें जिन्हें कथित मुख्यधारा के मीडिया ने छापने या दिखाने की हिम्मत नहीं दिखाई लेकिन बाद में इंटरनेट मीडिया में सामने आने के बाद उसे सामने लाना उसकी मजबूरी हो गई।

अब तो टीवी समाचार चैनलों ने 'वायरल सच' के नाम से सोशल मीडिया की खबरों को भी जगह देने का रास्ता निकाल लिया है। इसलिए सूचना विस्फोट के इस दौर में निष्पक्षता जिसे मैं तथ्य और सत्यपरकता का पर्याय मानता हूं, पत्रकारिता की जरूरत ही नहीं मजबूरी भी बनती जा रही है।

 

 

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