हिंदी का जलवा: पाक पढ़ा रहा है चीन को...

Thursday, 14 September, 2017

विवेक शुक्ला ।।

क्या आप ये मानेंगे कि पाकिस्तान से हिंदी सीख रहे हैं चीनी और खाड़ी देशों के बहुत से राजनयिक और रक्षा विशेषज्ञ? पर ये सच है और खुद पाकिस्तान के भीतर भी हिंदी को जानने-समझने-सीखने की प्यास तेजी से बढ़ रही है।

दरअसल देश के बंटवारे से पहले समूचे पाकिस्तान के पंजाब से लेकर सिंध में हिंदी पढ़ाई जाती थी। लाहौर हिंदी का गढ़ होता था। वहां पर हिंदी के कई बड़े प्रकाशन भी थे। इनमें राजपाल एंड संस खास है। पर बाद में हिंदी को भी बंटवारे का खामियाजा भुगतना पड़ा। हिंदी को शत्रुओं की भाषा माना गया। बहरहाल, चीनियों और अरब देशों के रक्षा और कूटनीति के जानकारों को हिंदी का कामचलाऊ ज्ञान मिल रहा है पाकिस्तान की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ मॉडर्न लैंगवेज (एनयूएमएल) में। ये इस्लामाबाद में है। इसके अलावा पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर, में भी हिंदी विभाग सक्रिय है 1983 से।

एनयूएमएल के हिंदी विभाग में पांच टीचर हैं। इधर हिंदी में डिप्लोमा कोर्स से लेकर पीएचडी तक करने की सुविधा है। एनयूएमएल में हिंदी के साथ-साथ पाकिस्तान में बोली जानी बहुत सी अन्य भाषाओं के अध्यापन की व्यवस्था है। उधर, पंजाब यूनिर्सिर्टी की हिंदी फैकल्टी में दो टीचर हैं। विगत जून माह में सिंगापुर में जाने का मौका मिला। वहां के लिटिल इंडिया क्षेत्र के एक रेस्तरां में लंच के दौरान एक दिन एक चीनी मूल की महिला हमारे से हिंदी में पूछने लगी, ‘क्या आप भारत से हैं?’ उसका ये सवाल सुनकर बड़ा सुखद अहसास हुआ। हमने जवाब दिया। जी, हम भारतीय हैं।उसके बाद गपशप चालू हो गई। बातचीत में उस भद्र चीनी महिला ने बताया कि उसने हिंदी बीजिंग में सीखी। उसके कई मित्र इस्लसामबाद स्थित एनयूएमएल से हिंदी का अध्ययन कर रहे हैं। एनयूएमयू में साल 1973 से हिंदी विभाग चल रहा है।

तो माना जा सकता है कि इसके अब तक के सफर में सैकड़ों हिंदी प्रेमियों ने हिंदी को और करीब से जाना होगा। कुछ साल पहले तक दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीश्नर रहे रियाज खोखर ने बताया था कि चूंकि हिंदी पाकिस्तान के पड़ोसी मुल्क भारत की अहम भाषा है, इसलिए हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते। हालांकि वे इस सवाल का उत्तर नहीं दे पाए थे कि कराची यूनिवर्सिटी का हिंदी विभाग क्यों बंद हो गया। हालांकि कराची में भारत से जाकर बसे उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार वगैरह के लोगों की भारी तादाद है। इसलिए  वहां की यूनिवर्सिटी  से हिंदी विभाग को बंद करना जायज नहीं माना जा सकता है। कराची और सिंध क्षेत्र में ही पाकिस्तान के हिन्दुओं की ठीक-ठाक आबादी भी है। इनमें हिन्दू धर्म ग्रंथों को हिंदी में पढ़ने की लालसा रहती है। जाहिर है, समूचे सिंध और कराची में हिंदी अध्यापन की व्यवस्था न होने से तमाम लोगों को कठिनाई होती होगी।

एनयूएमएल की हिंदी विभाग की प्रमुख डॉ. नसीमा खातून हैं। उन्होंने नेपाल की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी से हिंदी साहित्य में पीएचडी की है। उनके प्रोफाइल से साफ है कि वह आगरा से संबंध रखती हैं। वह आगरा यूनिवर्सिटी में भी पढ़ी हैं। उनके अलावा इस विभाग में शाहिना जफर भी हैं। वह मेरठ यूनिवर्सिटी की छात्रा रही हैं। वह कॉन्ट्रैक्ट पर इधर पढ़ाती हैं। इसी क्रम में शमीम रियाज भी हैं। वह पटना यूनिवर्सिटी से एमए हैं। जुबैदा हसन भी इधर कॉट्रैक्ट पर पढ़ा रही हैं। वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की छात्रा रही हैं। एक बात समझ आ रही है कि पाकिस्तान में हिंदी को वहां पर निकाह के बाद गई भारत की महिलाएं ही पढ़ा रही हैं।

पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर में भी हिंदी के अध्ययन की व्यवस्था है। यहां पर समूचे पंजाब के हिंदी प्रेमी आते हैं। इधर हिंदी विभाग सन 1983 में स्थापित हुए। यहां पर दो अध्यापक है फैकल्टी में।

पाकिस्तान के इतिहास के पन्नों को खंगालने पर समझ आ जाएगा कि वहां पर भाषा को लेकर सरकारी नीति शुरुआत से ही बेहद तर्कहीन रही। पाकिस्तान में उर्दू को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिला। एक उस भाषा को जो पाकिस्तान की मिट्टी की जुबान नहीं थी। उसे तो सिर्फ भारत से गए मुहाजिर जानते थे। उर्दू को देश की राष्ट्रभाषा थोपने के चलते पाकिस्तान को आगे चलतकर बड़ा नुकसान हुआ। भाषा के सवाल पर पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) की अनदेखी पाकिस्तान की आगे चलकर दो-फाड़ होने की बड़ी वजह रही।

बहरहाल भारत और पाकिस्तान में भाषीय और संस्कृतिक समानताओं के कारण पाकिस्तान में हिंदी का हाल के बरसों में प्रभाव देखने को मिल रहा है। हिंदी फिल्मों और भारतीय टीवी सीरियलों के कारण पाकिस्तान में हिंदी का बहुत प्रभाव बढ़ रहा है। दर्जनों हिंदी के शब्द आम पाकिस्तानी की आम बोल-चाल में शामिल हो गए हैं। अब पाकस्तानियों की जुबान में आप विवाद, अटूट, विश्वास, आशीर्वाद, चर्चा, पत्नी, शांति जैसे शब्द सुन सकते हैं। इसकी एक वजह ये भी समझ आ रही कि खाड़ी के देशों में लाखों भारतीय-पाकिस्तानी एक साथ काम कर रहे हैं। दोनों के आपसी रिश्तों के चलते दोनों एक-दूसरे की जुबान सीख रहे हैं। दुबई या अबू धाबी जैसे शहरों में हजारों पाकिस्तानी भारतीय कारोबारियों की कंपनियों, होटलों, रेस्तरां वगैरह में काम कर रहे हैं। इसके चलते वे हिंदी सीख लेते हैं।

एक पाकिस्तानी विद्वान बता रहे थे कि भारतीय़ समाज और संस्कृति को और गहनता से जानने वाले भी पाकिस्तानी हिंदी सीखना चाह रहे हैं।

 उधर, पाकिस्तान के हिन्दू नौजवानों में अपने धर्म ग्रंथों को हिंदी में पढ़ने की लालसा हिंदी की तरफ खींच रही है।  है। ये अपने बड़े-बुजुर्गों से हिंदी सीख रहे हैं। चंदर कुमार पाकिस्तान के सिंध से संबंध रखते हैं। अब दुबई में रहते हैं। एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ में काम करते हैं। वे बता रहे थे कि हमें हिंदी अपने बुजुर्गों से सीखने को मिल रही हैं। अब हम हिंदी अपनी अगली पीढ़ी को पढ़ाने की स्थिति में हैं। सिंध और कराची मे रहने वाले हिन्दू सिंधी के माध्यम से हिंदी का अध्ययन कर रहे हैं। पाकिस्तान में कम से कम मिडिल क्लास से संबंध रखने वाले हिन्दू तो हिंदी सीखते ही हैं। हालांकि पाकिस्तान के हिन्दुओं की मातृभाषा हिंदी नहीं है, पर वे हिंदी से भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं।

पाकिस्तान में हिंदी फले-फूले इससे बेहतर कोई बात नहीं हो सकती। आखिर भाषा का संबंध किसी धर्म या जाति से तो नहीं होता।

(लेखक यूएई दूतावास के पूर्व सूचना अधिकारी और हिंदी दैनिक 'हिन्दुस्तान' के विशेष संवाददाता रह चुके हैं)

 

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