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वरिष्ठ पत्रकार राजीव सचान की खरी-खरी: मोदी सरकार का यह दावा खोखला नजर आता है…

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‘किसी को नहीं पता कि जांच एजेंसियां कुछ मामलों में सुस्ती और कुछ में तेजी क्यों दिखाती है उसी तरह यह भी अज्ञात है कि अदालतें और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट भी ऐसा क्यों करता है?’ हिंदी अखबार दैनिक जागरण में प्रकाशित अपने आलेख के जरिए ये कहा वरिष्ठ पत्रकार व असोसिएट एडिटर राजीव सचान ने। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

भ्रष्टाचार के खिलाफ अधूरी लड़ाई

2017 में जो कुछ होना है उसमें से बहुत कुछ पहले से तय है। जैसे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव, समय से पहले पेश किया जाने वाला आम बजट और जीएसटी पर अमल। इसी वर्ष मोदी सरकार अपने कार्यकाल का तीसरा साल पूरा करेगी। चूंकि यह उसके कार्यकाल का आधे से अधिक समय होगा इसलिए इसका आंकलन कहीं अधिक गहराई से होगा कि उसने क्या किया और क्या करना शेष है?

यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार समर्थक अपनी उपलब्धियां बढ़-चढ़कर बताएंगे तो विरोधी यह साबित करेंगे कि यह सरकार हर मोर्चे पर विफल है। यह भी तय है कि काले धन और भ्रष्टाचार से लड़ाई का सवाल सतह पर बना रहेगा। दुर्भाग्य से यह सवाल यही बताएगा कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे संदिग्ध तत्वों की सेहत पर किस तरह का कोई असर नहीं पड़ा है। ऐसे तत्वों में जिनके मामले अदालतों में हैं वे तारीख पर तारीख का उदाहरण पेश कर रहे हैं और जो जांच एजेंसियों का सामना कर रहे हैं वे इन एजेंसियों की सुस्ती का लाभ उठा रहे हैं। ऐसे लोगों में सबसे दिलचस्प मामला पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम का है।

घपले-घोटालों के गंभीर आरोपों से घिरे कार्ति के बारे में न जाने कब से यह सुनने को मिल रहा है कि वह जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि प्रवर्तन निदेशालय को इससे कोई परेशानी नहीं है। बीते सितंबर प्रवर्तन निदेशालय ने कार्ति को तीसरी बार पूछताछ के लिए तलब किया था, लेकिन पिछली दो बार की तरह इस बार भी उन्होंने उसके समक्ष हाजिर होना आवश्यक नहीं समझा। क्या इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया या फिर उनकी संपत्ति जब्त कर ली? कृपया यह खास तौर पर नोट करें कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

क्या इससे विचित्र एवं हास्यास्पद और कुछ हो सकता है कि घपले-घोटाले का कोई आरोपी बार-बार बुलाए जाने के बाद भी जांच एजेंसी के समक्ष न आए और फिर भी उसके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो? क्या कार्ति चिदंबरम पर इसलिए किसी की कृपा बरस रही है कि वह पी.चिदंबरम के बेटे हैं? क्या प्रवर्तन निदेशालय वैसी ही सुविधा सबको देता है जैसी वह कार्ति को दे रहा है?

पता नहीं सच क्या है, लेकिन मोदी सरकार का यह दावा खोखला नजर आता है कि उसके शासन में भ्रष्ट तत्वों की खैर नहीं। कार्ति के मामले को अपवाद नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उनसे गंभीर मामला सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा का है। वह रहस्यमय तरीके से एक तरह से रातों-रात करोड़पति बनने वाले रसूखदार शख्स हैं। उनके संदिग्ध जमीन सौदे किसी से छिपे नहीं, लेकिन कोई नहीं जानता कि उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हो रही है? हरियाणा सरकार ने उनके खिलाफ जांच अवश्य कराई है, लेकिन यह नहीं बताया कि उस जांच से क्या हासिल हुआ है? हैरत नहीं कि वाड्रा निश्चिंत दिख रहे हैं। पिछले दिनों वह नोटबंदी पर मोदी सरकार का मजाक उड़ाने को लेकर चर्चा में थे। भाजपा नेता जब-तब कार्ति और वाड्रा या फिर घपले-घोटालों में फंसे अन्य कांग्र्रेसी नेताओं का नाम उछालकर कांग्रेस पर कटाक्ष करते रहते हैं, लेकिन शायद वे भूल जाते हैं कि अब वह विपक्ष में नहीं, सत्ता में हैं।

संप्रग सरकार के समय हुए जिन तमाम घोटालों को भाजपा ने जमकर भुनाया उनमें प्रमुख थे 2जी घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला और कोयला घोटाला। इन घोटालों में शामिल लोगों को सजा देना अदालत का काम है, लेकिन किसी न किसी स्तर पर सरकार को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन मामलों का निपटारा जल्द हो। नि:संदेह सरकार अदालतों पर दबाव नहीं डाल सकती, लेकिन वह उनसे यह आग्रह-अनुरोध तो कर ही सकती है कि घपले-घोटालों के बड़े मामलों का निस्तारण जल्द किया जाए। यह समझ आता है कि रक्षा सौदों में दलाली के मामलों की जांच में देरी होती है, क्योंकि कई बार संबंधित देश की सरकारें या वहां की अदालतें सहयोग नहीं करतीं, लेकिन आखिर उन मामलों की जांच में देरी का क्या औचित्य जिनमें किसी अन्य देश के सहयोग की जरूरत नहीं? क्या कोई बताएगा कि नेताओं के आय से अधिक संपत्ति के मामलों का निस्तारण कब होगा? रसूख वाले लोग जिस तरह अपने मामलों की जांच टालने अथवा अदालती कार्यवाही की गति बाधित करने में सक्षम हैं उसे देखते हुए ऐसा दावा नहीं किया जा सकता कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जो कथित जंग छेड़ दी गई है उसके तहत भ्रष्ट तत्वों की खैर नहीं। वे तो अभी भी मजे करते दिख रहे हैं। इस स्थिति के लिए जांच एजेंसियों के साथ-साथ अदालतों की सुस्ती भी जिम्मेदार है।

जिस तरह किसी को नहीं पता कि जांच एजेंसियां कुछ मामलों में सुस्ती और कुछ में तेजी क्यों दिखाती है उसी तरह यह भी अज्ञात है कि अदालतें और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट भी ऐसा क्यों करता है? इन दिनों सुप्रीम कोर्ट बीसीसीआई में सुधार के लिए प्रतिबद्ध है। यह उचित ही है, लेकिन क्या किसी को याद है कि एक समय उसने पुलिस में सुधार का भी बीड़ा उठाया था। यह भी सबको पता है कि सुप्रीम कोर्ट ने काले धन से भी लड़ने का बीड़ा उठा रखा है। काले धन के खिलाफ विशेष जांच दल का गठन न केवल उसकी पहल पर हुआ, बल्कि वह उसकी निगरानी भी कर रहा है। नि:संदेह काले धन को लेकर गठित विशेष जांच दल कुछ न कुछ कर ही रहा होगा, लेकिन आम जनता इससे अनजान ही अधिक है कि वह वस्तुत: कर क्या रहा है? यह वह सवाल है जिसका जवाब सुप्रीम कोर्ट को देना है। सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताना चाहिए कि सभी न सही, लेकिन भ्रष्टाचार के बड़े मामलों की सुनवाई तेज गति से क्यों नहीं हो सकती?

यह एक तथ्य ही है कि जब कभी जांच एजेंसियां अपना काम समय से पूरा कर देती हैं तो अदालतों की धीमी गति उनका काम मुश्किल कर देती है। रसूख वाले लोग बड़ी आसानी से अदालत-अदालत खेलने में सक्षम हो जाते हैं। वे यह खेल खेलने में पहले भी सक्षम थे और आज भी हैं। उनके रुख से यह भी नहीं लगता कि वे किसी दबाव में हैं। यह और अच्छे से बीते 50 दिनों में उजागर हुआ है। काले धन वाले सभी संदिग्ध तत्वों ने अपना सारा काला धन सफेद कर लिया है। न तो सरकार की एजेंसियां कुछ कर सकीं और न ही सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम कर रहा विशेष जांच दल यह बता सका कि ऐसा क्यों हुआ? जिस तरह के भ्रष्टाचार के तमाम मामले ऐसे हैं जिनकी जांच वर्षों से चल रही है उसी तरह कई मामले ऐसे भी हैं जो अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे हैं। यह निराशाजनक है कि जब कभी निचली अदालतें समय से फैसला सुना देती हैं तो फिर ऊंची अदालतें फैसला सुनाने में देर करती हैं। जब भ्रष्टाचार के मामलों में भी ऐसा होता है तो इससे कुल मिलाकर भ्रष्ट तत्वों का ही हित सधता है।

(साभार: दैनिक जागरण)

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