आलोक मेहता का आंकलन: इंदिरा गांधी को अपनी उदारता की कीमत बार-बार चुकानी पड़ी...

आलोक मेहता का आंकलन: इंदिरा गांधी को अपनी उदारता की कीमत बार-बार चुकानी पड़ी...

Monday, 27 November, 2017

 आलोक मेहता

वरिष्ठ पत्रकार ।।

खतरों की सेनानी इंदिरा गांधी

इंदिरा गांधी अपने युग में आयरन लेडी की तरह दुनिया में इसलिए जानी गईं क्योंकि उन्होंने घर-परिवार, समाज, पार्टी और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी निरंतर खतरे मोल लिए और निर्भीक निर्णयों से सबको चौंकाया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बहुत कम उम्र में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के आदर्शों को ध्यान में रखकर बच्चों की वानर सेना बनाई ताकि अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन में उनकी भी भागीदारी हो सके। इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व में लगातार परिवर्तन आए। एक तरफ भारतीय संस्कृति और परंपरा के प्रति सम्मान तो दूसरी तरफ समाजवादी आधुनिकता के विचारों को महत्व देना अद्भुत संतुलन कहा जा सकता है।

इंदिरा गांधी के संबंध में दशकों से बहुत-कुछ लिखा और बताया गया है। लेकिन इससे अलग-अलग तरह की छवि भी बनी है। सत्ता में रहकर क्रांतिकारी निर्णय करने और इमरजेंसी लगाने के कारण उन पर तानाशाह होने के आरोप भी लगते रहे हैं। लेकिन जिन पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने निरपेक्ष भाव से आंकलन किया है, वे यह मानते हैं कि इंदिरा गांधी में मानव संवेदना के साथ उदार लोकतांत्रिक मानसिकता हमेशा हावी रही। श्रीमती गांधी के अनुसार अंतरात्मा ही सर्वोच्च शक्ति है। यही जीवन की अच्छाई और बुराई को निर्देशित करती है। उनका यही दृष्टिकोण राजनीति में नई चुनौतियां लाता रहा। इमरजेंसी से पहले और उसके बाद भी एक युवा संवाददाता के रूप में मुझे उनसे मिलने के अवसर भी मिले और उनकी छत्रछाया में होने वाले कांग्रेस अधिवेशनों में खुलकर आलोचना और गुणगान के स्वर भी सुने।

इंदिरा गांधी के विचारों में दृढ़ता होती थी। लेकिन अधिकाधिक लोगों से मिलने और समाज की असलियत को समझने में उनकी क्षमता अद्भुत थी। कांग्रेस पार्टी के दिग्गज पुराने नेताओं से टकराना और बांग्लादेश के निर्माण के लिए पाकिस्तान के साथ युद्ध करने जैसी चुनौती स्वीकार कर उन्होंने एक नया इतिहास बनाया।

इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं को अपने मधुर स्वभाव, स्पष्ट विचारधारा और दृढ़ता के बल पर परिवार की तरह आगे बढ़ाया। इंदिरा गांधी के सत्ताकाल के प्रारंभिक दौर में नेहरू की तरह प्रादेशिक क्षत्रपों का विशेष महत्व रहा। कांग्रेस विभाजन और उसके बाद चुनाव में ऐतिहासिक सफलता के कारण केवल राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनके विरुद्ध षडयंत्र होते रहे। अमेरिका का निक्सन प्रशासन सर्वाधिक बौखलाया था। उस महाशक्ति से टकराने के लिए ही सोवियत संघ के साथ रिश्तों को मजबूत बनाया। पश्चिमी देशों के विरोध के कारण भारत में भी बड़ी आर्थिक चुनौतयों का सामना करना पड़ा था।

महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के कारण जयप्रकाश नारायण को बल मिला। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि 1975 में उनके चुनाव को अदालत से रद्द किया जाना कहीं न कहीं बड़े षडयंत्र की आशंका को जन्म देता था। इसका एक प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि अदालत का फैसला आने से पहले मास्को में बैठे भारतीय राजदूत और इंदिरा गांधी के बहुत करीबी डी.पी. धर सिद्धार्थ शंकर रे और हेमवतीनन्दन बहुगुणा से संपर्क करके बार-बार यह जानकारी भी दे रहे थे कि अदालत का फैसला इंदिरा गांधी के विरुद्ध आ सकता है। जबकि सिद्धार्थ शंकर रे और बहुगुणा यही विश्वास जताते रहे कि फैसला इंदिरा गांधी के पक्ष में ही आएगा। सचमुच मामला भी बहुत छोटा था। चुनाव अभियान के दौरान उनके सहायक यशपाल कपूर इस्तीफा दे चुके थे। लेकिन फाइलों में वह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी तथा कपूर इंदिरा गांधी की चुनावी सभाओं के साथ यात्रा भी कर रहे थे। इस तरह उत्तर प्रदेश की चुनावी सभाओं के मंच राज्य सरकार द्वारा बनाए गए। जबकि कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी होने के कारण यह व्यवस्था पहले से लागू थी कि प्रधानमंत्रियों की सभा के मंच के निर्माण और सुरक्षा का दायित्व राज्य सरकारों का होगा।

शायद यही कारण है कि अदालत के फैसलों को कई नेताओं ने पूर्वाग्रही भी करार दिया। फिर इमरजेंसी लगाने के सुझाव देने वाले लोगों में सिद्धार्थ शंकर रे ही सबसे आगे थे। लागू करने वाले प्रगतिशील विचारधारा वाले हेमवतीनन्दन बहुगुणा भी इस निर्णय के समर्थक थे। कांग्रेस के वरिष्ठतम मंत्री और पूर्व अध्यक्ष जगजीवन राम इंदिरा गांधी के इमरजेंसी के निर्णय और जनवरी 1977 तक साथ देने वालों में से थे लेकिन इमरजेंसी को शिथिल करते हुए चुनाव की घोषणा के साथ ही जगजीवन राम और बहुगुणा उनका साथ छोड़ गए।

सिद्धार्थ शंकर रे जो इलाहाबाद की अदालत में दायर चुनाव याचिका के मामले में सबसे बड़े कानूनी सलाहकार और इमरजेंसी की राय देने में अग्रणी होने के बावजूद सत्ता से विमुख होने के बाद इंदिरा गांधी से नाता तोड़कर ज्यादतियों के लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहराने लगे। इसी तरह जो देवकांत बरुआ कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में इंदिरा इज इंडिया कहकर हर संभव चापलूसी करते थे, चुनाव के बाद पराजय का ठीकरा इंदिरा गांधी पर ही फोड़ने लगे। यही नहीं जनता पार्टी का शासन आने पर कांग्रेस के कई नेता इंदिरा गांधी का साथ छोड़ गए और मोरारजी देसाई या चरण सिंह की अल्पकालिक सरकार में हाथ-पैर जोड़कर मंत्री तक बन गये इनमें ऐसे लोग भी शामिल थे जो नेहरू के सत्ताकाल में बहुत कम उम्र में महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचे और सत्ता के लाभ अर्जित किए।

वसंत साठे, विद्याचरण शुक्ल, ए.आर. अंतुले जैसे नेताओं ने अपनी वफादारी नहीं छोड़ी। इमरजेंसी की ज्यादतियों के लिए सर्वाधिक बदनाम हुए हरियाणा के नेता बंसीलाल अवश्य पार्टी से बाहर किये गए। लेकिन 1980 के बाद फिर कांग्रेस के साथ ही वापस आ गए। इंदिरा गांधी 1977 के बाद अपनों के विश्वासघात से सबसे अधिक आहत हुईं। जनता पार्टी की सरकार में मोरारजी देसाई और चरण सिंह भी इंदिरा गांधी को दंडित करने के लिए लगातार कड़ रुख अपनाते रहे। उन्हीं दिनों अपनी पत्रिका के लिए इंटरव्यू लेने के लिए जाने पर इंदिरा गांधी ने इस बात पर भी गहरा दुःख व्यक्त किया था कि सरकार उनके आंगन के बगीचे के लिए पाइपलाइन तक को कटवा रही है। यही नहीं, खजाना जमीन में गाड़ने जैसा अनर्गल आरोप भी लगा रही है।

जनता राज में इंदिरा गांधी के विरुद्ध चले अभियान में एक आरोप यह भी फैलाया गया कि जयपुर के पुराने महल के भूमिगत खजाने से निकले हीरे-जवाहरात और सोने के बक्से रातोरात इंदिरा गांधी के पास ही भिजवा दिए गए थे। दुःखद बात यह है कि आज भी जयपुर के इस किले में जाने वाले पर्यटकों को कुछ अर्द्धज्ञानी गाइड यही कहानी सुनाते हैं। जबकि असलियत यह थी कि आयकर विभाग के एक सौ से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों ने इस भूमिगत खजाने को बाहर निकालने में दिन-रात काम किया था और सुरक्षित ढंग से सरकारी खजाने में जमा किया गया।

इस पूरे अभियान का नेतृत्व वरिष्ठ आयकर आयुक्त टी.पी. झुनझुनवाला ने किया था और केवल हमने अपने साप्ताहिक हिन्दुस्तान में ही नहीं, देश के अन्य अखबारों और पत्रिकाओं ने भी इस पूरी कार्यवाही का ब्योरा विस्तार से छापा था। यह भी इस बात का प्रमाण है कि अफवाहों के कारण देश के राजनेताओं की छवि कितनी खराब होती रही है। नेहरू परिवार की बात तो दूर रही, महात्मा गांधी को लेकर भी इतना ही अनर्गल प्रचार 70 वर्षों के दौरान होता रहा है। बहुत कम लोगों को यह बात भी मालूम है कि इंदिरा गांधी के उसी सत्ताकाल में प्रणव मुखर्जी भी वित्त राज्यमंत्री के रूप में कालाबाजारियों और तस्करों के विरुद्ध कार्रवाई करने में लगे हुए थे। लेकिन कांग्रेस की पराजय के बाद विरोधियों ने ब्लिट्जजैसे बड़े साप्ताहिक में भी यह अफवाह छपवा दी थी कि प्रणव मुखर्जी और इंदिरा गांधी के चुनाव के लिए सरकारी बैंक के एक बड़े महाप्रबंधक टीन के बक्से में 9 करोड़ रुपये लेकर मतदाताओं के बीच बंटवाने पहुंच गए थे।

प्रणव मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा में भी इस हास्यास्पद खबर का जिक्र किया है क्योंकि 9 करोड़ रुपये इस तरह टीन के बक्से में न जा सकते थे और न कोई अधिकारी ऐसा भारी बक्सा उठाकर ले जा सकता था। छापेमारी और सीबाआई के सारे दबावों के बावजूद इंदिरा गांधी ने हिम्मत नहीं हारी और एक बार फिर से पार्टी को खड़ा कर दिया तथा सत्ता में आ गईं। यदि वह सचमुच तानाशाह बनना चाहतीं तो इमरजेंसी को चार-पांच वर्षों तक जारी रख सकती थीं। लेकिन वह अंदर से लोकतंत्र के लिए ही अधिक समर्पित भाव रखती थीं। इसलिए उन्होंने जल्दी से जल्दी इमरजेंसी हटाने का फैसला कर लिया। एक कारण यह भी था कि उनके आसपास रहे नेता तथा राजनीति में सक्रिय छोटे बेटे संजय गांधी यह विश्वास दिला रहे थे कि चुनाव होने पर कांग्रेस ही विजयी होगी। जबकि चुनाव की घोषणा के बाद कई नेताओं को यह एहसास होने लगा था कि जीत मुश्किल होगी।

इंदिरा गांधी इमरजेंसी के दौरान भी अंदर ही अंदर किसी भी ज्यादती की सूचना मिलने पर बहुत विचलित होती थीं। जयप्रकाश नारायण सहित विरोधी नेताओं के स्वास्थ्य की जानकारी भी लगातार मंगवाती थीं। बाद में कई नेताओं को स्वास्थ्य के आधार पर ही रिहा भी करवाया गया। दिल्ली के एक नामी पत्रकार प्राण सभरवाल विपक्ष के नेताओं के साथ गहरे संबंधों और सरकार के विरुद्ध अभियान में शामिल होने के कारण इमरजेंसी के दौरान कुछ समय के लिए गिरफ्तार किए गए। जब यह सूचना इंदिराजी को मिली तब वह स्वयं श्रीमती सभरवाल के निवास पर हालचाल जानने पहुंची और यह भी आश्वासन दिया किया किसी तरह की परेशानी होने पर उन्हें सम्पर्क किया जाए। आवश्यक कानूनी कार्रवाई पूरी होने पर संभवतः सभरवालजी जल्द ही रिहा भी हो जाएंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई नेताओं के प्रति भी उनके मन में सम्मान था और यह घारणा थी कि वे  राष्ट्रीय हित के लिए काम कर सकते हैं। यही कारण है कि पूर्वोत्तर राज्यों में ईसाई मिशनरियों की आड़ में कुछ विदेशी तत्वों द्वारा की जाने वाली गतिविधियों को नियंत्रित करने एवं भारत के हितों की रक्षा करने वाली गतिविधियों के लिए संघ से जुड़ी संस्थाओं और नेताओं को भी 1980 में सत्ता में आने के बाद हर संभव सरकारी सहायता दिलवायी। यह बात संघ के पुराने नेता जानते हैं। शायद यही कारण है कि उनसे राजनीति का पाठ पढ़ने वाले राजीव गांधी ने भी सत्ता में आने के बाद अयोध्या में राम मंदिर के दरवाजे खोलने के साथ शिलान्यास के लिए भी अनुमति देने की पहल की। यह बात गांधी परिवार के सबसे बड़े आलोचक भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी आज भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते हैं।

इंदिरा गांधी की लोकतांत्रिक दृढ़ता का दूसरा सबसे बड़ा प्रमाण यह रहा है कि पंजाब में आतंकवाद से निपटने के लिए अमृतसर में सैनिक कार्रवाई के बाद सुरक्षा एजेंसियों की चेतावनी के बावजूद उन्होंने सिख सुरक्षाकर्मियों को नहीं हटाया। उनकी दृढ़ता ही उनकी मृत्यु का कारण भी बन गई। कठोर छवि के बावजूद असलियत यही है कि इंदिरा गांधी साहित्यकारों और पत्रकारों का बहुत सम्मान करती थीं। गिरिलाल जैन तो टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक थे और श्रीकांत वर्मा केवल दिनमान के विशेष संवाददता, लेकिन इंदिरा गांधी उनके घरों में भी पहुंचकर अनौपचारिक रूप से बात करने में संकोच नहीं करती थीं। प्रधानमंत्री रहते हुए बिना किसी पूर्व सूचना और तामझाम के किसी नाटक या संगीत के कार्यक्रम में पहुंचना भी उनके स्वभाव का हिस्सा था। दृढ़ निरपेक्षता का भाव रहते हुए शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद अथवा अन्य धर्माचार्यों को सम्मान देना हो तो पूरी निष्ठा के साथ मंदिरों में जाने में उन्होंने कभी कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई।

धीरेन्द्र ब्रह्मचारी बाद में विवादास्पद हुए। लेकिन प्रारंभिक दौर में अच्छे योग शिक्षक के रूप में ही इंदिरा गांधी ने उन्हें महत्व दिया था। बाद के वर्षों में धीरेन्द्र ब्रह्मचारी की गड़बड़ियां सामने आने पर उनके प्रवेश पर रोक लगा दी थी। इसी तरह किसी जमाने में ललित नारायण मिश्रा जैसे कुछ नेताओं के माध्यम से चन्द्रास्वामी की पहुंच इंदिरा गांधी तक हुई थी। लेकिन जब चन्द्रास्वामी सत्ता के नाम का दुरुपयोग  कर दलाली के धंधे में शामिल हो गए तो इंदिरा गांधी ने उसे भी पूरी तरह दूर कर दिया। यह बात अलग है कि चन्द्रास्वामी ने तत्कालीन गृहमंत्री और बाद में प्रधानमंत्री बने नरसिंह राव को निरंतर अपने मोहजाल में फंसाए रखा। बाद में चन्द्रास्वामी की मंडली के कारण ही नरसिंह राव को अदालत में आरोपी बनकर जाना पड़ा। मतलब यह कि इंदिरा गांधी को अपनी उदारता की कीमत बार-बार चुकानी पड़ी। पंडित नेहरू को तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चीन से ही बड़ा धोखा मिला, लेकिन इंदिरा गांधी को राष्ट्रीय राजनीति में अपनों से ही सबसे अधिक मुसीबतों का सामना करना पड़ा।

बैंकों का राष्ट्रीयकरण, पीवीपर्स की समाप्ति, कोयला खानों का राष्ट्रीयकरण या पहला परमाणु परीक्षण जैसे ऐतिहासिक निर्णयों ने सही मायने में भारत को आधुनिक और शक्तिशाली बनाया। सिक्कम में भारत का विलय भारत की सुरक्षा के हितों की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गुट निरपेक्ष देशों के संगठन और दक्षिण एशिया के देशों की एकजुटता के लिए इंदिरा गांधी के प्रयासों से अमेरिका तथा यूरोपीय देशों की दादागिरी बहुत हद तक नियंत्रित हो सकी। देर-सबेर रूस के साथ ही अमेरिका और चीन के साथ भी रिश्तों को सुधारने की पहल हुई और उनकी बनायी योजना को ही राजीव गांधी ने अमल किया। इससे भारत की राजनीतिक शक्ति बढ़ने में दूरगामी लाभ हुए। इसलिए इंदिरा गांधी के सत्ताकाल की कमियां गिनाने वालों को देश को हुई उपलब्धियों और सफलताओं को भी अवश्य याद रखना चाहिए।

(लेखक आउटलुक हिन्दी के पूर्व प्रधान संपादक हैं।)

 

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