'ZEE समूह से JC का जाना साफ तौर पर ये बताता है कि...'

Saturday, 14 April, 2018

अमर आनंद

पूर्व कार्यकारी संपादक, चैनल वन ।।

अथ श्री जगदीश चंद्र कथा 

सरल, सफल और सार्थक शख्सियत वाले जगदीश चंद्र क़ातिल जी की विनम्रता और उनकी व्यापाकता की तारीफें खूब सुनी थी। मिलना तब हुआ जब नौकरी के सिलसिले में पिछले साल  मई में उन्हें फोन किया था। फोन नहीं लगा और तुरंत मेरे मोबाइल पर उनका फोन घनघनाने लगा। उस वक्त मैं नोएडा में तैनात किसी बहुत बड़े आईएएस अफसर के हाथ में मेरा फोन था। मैं उन्हें कुछ दिखा रहा था। मैंने उनके हाथ से फौरन फोन लिया और जगदीश जी से बात हुई पूरी विनम्रता के साथ। इतनी विनम्रता के साथ की जगदीश जी से अपरिचित उन अफसर से मैं उनके गुण गाने लगा। उन्होंने अपने किसी अधीनस्थ से मिलने को कहा और कुछ दिन के बाद ताज मान सिंह होटल में बुलाया, जहां वो खुद रहते थे और लोगों से मिलते थे। ठीक 11 बजे से उनसे मिलने वाली की कतार मौजूद रहती थी। उन्होंने कुछ दिन बाद इसलिए बुलाया था क्योंकि वो बीच में उपराष्ट्रपति के साथ विदेश दौरे पर गए थे। 

वे रोज सैकड़ों लोगों से मिलते हैं बात करते हैं, लेकिन उन्होंने मुझे जाते ही पहचान लिया कि मैं कौन हूं और उनसे क्यों मिलने आया हूं। मैं समझता हूं उनके स्तर पर बात करने और मिलने जुलने वालों का हिसाब रखना काफी मुश्किल काम है और बातचीत को फॉलो करना और उसे मूर्त रूप देना तो है ही। खैर जैसे ही मैंने किसी और से बातचीत करने में मशगूल जगदीश चंद्र जी को नमस्कार किया, उन्होंने पहचानते हुए अपने से थोड़ी दूर बैठे अपने एक अधीनस्थ की ओर इशारा करते हुए कहा कि जाकर उनसे मिलिए मैं थोड़ी देर में आपसे मिलता हूं। मैं जगदीश जी से मिले रिस्पॉन्स से आगे की संभावनाओं का तानाबाना बुनने में जुट गया और उनके बताए हुए अधीनस्थ जो मुझसे उम्र और अनुभव में छोटे लेकिन पद में बड़े थे और उस वक्त के हिसाब से मेरे लिए काफी अहम थे, से मिलने पहुंचा उनको अपना सारा काम समझाया-बताया। थोड़ी देर में जगदीश जी उसी जगह आ गए, जहां हम बैठे थे और उन्होंने मुझे थोड़ी देर अपने अधीनस्थ से अलग टेबल पर बैठने को कहा। उनसे कुछ बात करने लगे  और फिर मुझे वहीं बुलाया। कहां- तुम्हारा काम बहुत अच्छा है। ये भी तुम्हारी तारीफ कर रहे हैं। तीन दिन में तुम्हारे पास मैसेज आने वाला हैं इंतजार करो। समाचार प्लस की नौकरी छोड़ने के बाद नौकरियों की तलाश में घूमते हुए  जिस निराशाजनक दौर से मैं गुजर रहा था, उस दौर में इन लम्हों ने मेरे अंदर आशा का संचार किया। ऐसा लगा कि बस  मंजिल बहुत दूर नहीं बल्कि बहुत पास है। मगर शायद मेरे नसीब में जगदीश जी की ओर से जी के लिए दी जाने वाली नौकरी नहीं थी। इसलिए मुझे नहीं मिली। जी समूहके कई चैनलों की बतौर सीईओ जिम्मेदारी संभाल रहे जगदीश चंद्र के संस्थान को अलविदा कहने के बाद उनसे मुलाकात की यादें ताजा हो गईं।

जगदीश चंद्र यानी जेसी विहंगममता, व्यापकता और विशालता को समेटे हुए एक शख्सियत का नाम है, जो राजस्थान में बतौर प्रमोटी आईएस प्रशासनिक सेवा से रिटायरमेंट के बाद ई टीवी में दाखिल हुए और अपनी संपर्क क्षमता की वजह से लगातार बढ़ते चले गए और उस ग्रुप के लिए अपरिहार्य और अनिवार्य से हो गए। मीडिया जेसी का सफर ईटीवी में राजस्थान से शुरू हुआ था। बढ़ते दायरे के जरिए दम बढ़ाने का हुनर जानने वाले जगदीश चंद्र के व्यक्तित्व को जेसी शो ने एक नई ऊंचाई दी जिसे अंबानी के हिस्से में आने के बाद भी ई टीवी के सभी चैनलों और न्यूज18 में दिखाया जाने लगा। लेकिन ये स्थिति काफी दिन तक बरकरार नहीं रह पाई। जब दो धाराओं और दो ताकतों और दो वर्ककल्चर का मिलन होता है, तो कुछ न कुछ जुड़ता है और कुछ न कुछ टूटता है। जाहिर है इन्हीं वजहों से जगदीश चंद्र को अपने लिए ई टीवी समूह बेहतर नजर नहीं आया और मीडिया जगत में एक हलचल के साथ अचानक सभी ने ये खबर सुनी कि एक लंबे करार के साथ जेसी के लिए जी समूह में संभावनाओं के द्वार खुल गए। ज़ी समूह के सभी रीजनल चैनलों के सीईओ और एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर के पद पर विराजमान जेसी जैसे नए आसामान पर नई उड़ान के लिए तैयारी में नजर आए। अपने पुराने चैनल से कई साथियों को रातोरात नए चैनल में लाकर स्थापित करने और आगे की योजना पर अमल करने का जो दम जेसी ने दिखाया उससे लगा कि जी समूह में कुछ वैसा होकर रहेगा जो अब तक नहीं हुआ है। 

22 साल से भी ज्यादा पुराने इस चैनल में जब जेसी की ताकत बढ़ने लगी तो जाहिर है किसी न किसी का आसमान उनके हिस्से में आने लगा था। किसी की जमीन छिनती हुई दिखाई पड़ने लगी थी। उनमें से कई ऐसे लोग भी हैं, जो वहां काफी पुराने और मालिक के काफी करीबी हैं। जेसी के आने से ऐसे कई लोगों के प्रभार बदले गए या फिर उन्हें साइडलाइन होना पड़ा। जीं समूह स्वाभाविक रूप से ऐसी हलचल का आदी नहीं रहा।, इसी वजह से जेसी का कद धीरे-धीरे घटता चला गया। उनका आसमान धीरे-धीरे सिमटता चला गया और आखिरकार उन्होंने जी से खुद को अलग कर लिया। उनके हिस्से की जिम्मेदारी इसी समूह को पुराने सिपहसलार पुरुषोत्तम वैष्णव को दे दी गई। जी समूह से जेसी का जाना साफ तौर पर ये बताता है कि ताकत स्थायी नहीं होती और मीडिया की नौकरी तो बिल्कुल नहीं।  मीडिया में बड़ा से बड़ा पद भी आज के समय में गर्व और स्थायित्व का विषय नहीं हो सकता। 

 रीजनल चैनलों के अर्थशास्त्र की नब्ज समझने वाले जेसी की हस्ती की  मीडिया जगत में  पूछ-परख रही है आगे भी रहेगी ऐसी उम्मीद की जाती है। 



(लेखक चैनल वन के पूर्व कार्यकारी संपादक, ईवेंट्स एंड प्लानिंग रहे हैं। ईवेंट जर्नलिज्म की खुद की बनाई राह पर काम कर रहे हैं। हिन्दुस्तान, अमर उजाला, दैनिक भास्कर, इंडिया टीवी, लाइव इंडिया, कोबरापोस्ट, समाचार प्लस में काम कर चुके हैं। पत्रकारों की संस्था प्रेस फाउंडेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय संयोजक की भी जिम्मेदारी संभाली है।)  

 

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