'जिन्ना जबर्दस्त राष्ट्रवादी थे, उन्होंने भगतसिंह का मुकदमा भी लड़ा था'

Monday, 03 April, 2017

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

वरिष्ठ पत्रकार ।।

जिन्ना  हाउस का क्या करें?

महाराष्ट्र के एक विधायक ने मांग की है कि मुंबई के ‘जिन्ना हाउस’ को ढहा दिया जाए और वहां एक नया सांस्कृतिक केंद्र बना दिया जाए। यह ऐसी मांग है कि यदि इसे तूल दे दिया जाए तो भारत में इसका समर्थन करनेवाले ढेरों लोग मिल जाएंगे। आम लोग भावना में बहते हैं। वे गहरे में नहीं उतरते। वे आगा-पीछा भी नहीं सोचते। इसमें जरा भी शक नहीं है कि यदि मोहम्मद अली जिन्ना नहीं होते तो पाकिस्तान भी नहीं होता। यों तो मुस्लिम लीग 1906 में बनी और बड़े-बड़े मुस्लिम नेता इसके अध्यक्ष बनते रहे लेकिन इकबाल के सपने को जिन्ना ने ही साकार किया। जिन्ना तो कांग्रेस के सक्रिय सदस्य रहे। वे जितने दिन मुस्लिम लीग में सक्रिय रहे, उससे ज्यादा वे कांग्रेस में रहे।

महात्मा गांधी जिन दिनों दुनिया के पोंगापंथी मुसलमानों के ‘खिलाफत आंदोलन’ का समर्थन कर रहे थे, जिन्ना उसका विरोध कर रहे थे। गांधी और जिन्ना की टक्कर 1920 की नागपुर कांग्रेस में हुई और वह दरार फैलती गई। इसके पहले जिन्ना इतने बड़े नेता बन चुके थे कि सरोजनी नायडू ने उनकी जीवनी लिखी थी। जिन्ना की मां का नाम मिठूबाई और पत्नी का नाम रतनबाई था। दो पीढ़ी पहले जिन्ना हिंदू थे। अब वे खोजा शिया हो गए थे। जिन्ना जबर्दस्त राष्ट्रवादी थे। उन्होंने भगतसिंह का मुकदमा भी लड़ा था।

1930 तक जिन्ना इतने निराश हो चुके थे कि वे लंदन जा बसे थे। लियाकत अली और उनकी बेगम उमा पंत उन्हें वापस ले आए। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम 10-11 वर्षों में वह अलगाववादी रुप दिखाया, जिसे औसतन भारतीय निंदनीय समझता है। लेकिन जिन्ना की दो बातों को हम न भूलें। एक तो यह कि वे पाकिस्तान से लौटकर मुंबई के अपने जिन्नाहाउस में ही रहना चाहते थे और दूसरी यह कि उन्होंने पाकिस्तान के कायदें-आजम (महान नेता)  के तौर पर अपने भाषण में साफ-साफ कहा था कि आजाद पाकिस्तान में मजहब के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। उनके इस भाषण को भाजपा के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने भी उद्धृत किया था। किसे पता है कि जिन्ना यदि सितंबर 1948 के बाद भी जीवित रहते तो शायद भारत-पाक महासंघ जैसा कोई सपना साकार हो जाता।

ढाई एकड़ में बने जिन्ना के बंगलों की कीमत इस समय कई अरब रु. है। नेहरु ने उसे शत्रु-संपत्ति घोषित नहीं किया। वे उसे जिन्ना को लौटाना चाहते थे। जिन्ना की मर्जी से वे उसे किसी यूरोपीय नागरिक को किराए पर भी देना चाहते थे लेकिन जिन्ना साल भर बाद ही चल बसे। हमारे कई प्रधानमंत्रियों ने उसे पाकिस्तान सरकार को लौटाना चाहा लेकिन वे कोई फैसला नहीं कर सके। यदि उसे पाकिस्तान को नहीं लौटाना है तो भी उसको ढहाना तो वज्र मूर्खता होगी। यह वह बंगलो है, जिस पर गांधी और नेहरु जैसे नेता दर्जनों बार जाते रहे हैं। क्या ही अच्छा हो कि ‘जिन्ना हाउस’ को एक ऐसे संग्रहालय में तब्दील कर दिया जाए, जो जिन्ना के 60 साल भारत मां के पुत्र की तरह दिखाए और उनके अंतिम 11 साल पाकिस्तान के पिता की तरह दिखाए।

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