पत्रकार भी शाहूजी काल के उन मुस्लिम आकाओं की तरह हैं, जिन्हें...

Friday, 15 September, 2017

नीरज नैयर ।।

हर राज्य का अपना अलग इतिहास और गौरव गाथाएं हैं। जब आप अलग-अलग शहर घूमते हैं तो आपको इस इतिहास को ज्यादा करीब से जानने-समझने का मौका मिलता है। हाल ही में मैंने कर्नल पाटिल की किताब शिवाजी की जिहादपढ़ी। दरअसल अंग्रेजी में लिखी गई इस किताब को हिंदी भाषा में पिरोने का काम मैंने ही किया था, इसलिए काफी गहराई से उसके सार को समझ सका।

कर्नल पाटिल ने इस सोच से पर्दा उठाने का प्रयास किया है कि शिवाजी महाराज केवल मराठा समुदाय के हितैषी थे और उन्हें मुस्लिमों से बैर था। पाटिल ने अतीत के समुन्दर में छलांग लगाकर कई ऐसे तथ्यों को सामने रखा है, जो यह साफ़ करते हैं कि शिवाजी के लिए सभी धर्म समान थे। शिवाजी के विश्वासपात्र योद्धाओं में हिंदू भी थे और मुस्लिम भी। सही मायनों में वे एक सेकुलर राजा थे, जिन्होंने हमेशा व्यक्ति को तवज्जो दी, उसके धर्म को नहीं। इस किताब में शाहूजी महाराज के विषय में भी कई दिलचस्प तथ्य मौजूद हैं। शाहूजी एकमात्र एक ऐसे शासक थे, जो मुस्लिमों को शिक्षित करने पर जोर देते रहे।

1902 में जब शाहूजी विदेश दौरे से लौटे तो उन्होंने कोल्हापुर में ऐलान किया कि यदि मुस्लिम नेता अपने समुदाय के लिए शिक्षा आंदोलन की शुरुआत करते हैं और शैक्षिक संस्थानों की स्थापना करते हैं, तो उन्हें हर संभव सहायता मुहैया कराई जाएगी। लेकिन किसी भी मुस्लिम नेता ने अपनी कौम का भविष्य संवारने के इस अवसर का लाभ उठाने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने भी नहीं जो महाराज के दरबार में उच्च पदों पर आसीन थे या उनकी फ़ौज का हिस्सा थे। दूसरे शब्दों में कहें तो मुस्लिम आका ही नहीं चाहते थे कि उनकी कौम तालीम की रोशनी में आगे बढ़े। 

कुछ ऐसा ही हाल आजकल पत्रकारिता और पत्रकारों का है। बड़ा मुकाम हासिल करने वाले पत्रकारों के लिए न साथियों का साथ कोई मायने रखता है और न ही पत्रकारिता में सुधार की कोई गुंजाइश उन्हें नज़र आती है। कल तक जिस शोषण और भेदभाव को लेकर वो नारे बुलंद करते थे, कुर्सी बड़ी होने के साथ ही वो नारे उन्हें शोर सुनाई देने लगते हैं। अगर ऐसा न होता तो क्या पत्रकारों के संसद-विधानसभा पहुंचने के बाद भी पत्रकारिता की स्थिति जस की तस बनी रहती? बात केवल संसद या विधानसभा की ही नहीं है, आम पत्रकार का चोला उतारकर संपादक की कुर्सी पर बैठने वाले भी पल भर में सबकुछ भूल जाते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो पत्रकार खुद अपनी कौम के लिए कुछ करना नहीं चाहते, फिर सरकार या खबरनवीसों को मजदूरों की तरह हांकने वाले मीडिया घरानों से उम्मीद रखना बेमानी है।

एबीपी यानी आनंद बाज़ार पत्रिका ने जब एक झटके में अपने सैंकड़ों पत्रकारों को नौकरी से निकाला, तो उनके समर्थन में कौन आया? न तो पत्रकार संघ ने सक्रियता दिखाई और न ही कलम के बूते देश की राजनीति में शरीक होने वालों को कुछ सुनाई दिया। लोकमत समूह द्वारा रातों रात पुणे के अपने हिंदी संस्करण पर ताला जड़ने की घटना पर भी तथाकथित पत्रकार खामोश रहे और अभी ताज़ा मामला एनडीटीवी का है। पत्रकारों की स्थिति आजकल हलवाई की दुकान पर काम करने वाले लड़के से ज्यादा बेहतर नहीं है, जिसे लाला जब चाहे लात मारकर बाहर निकाल सकता है। आप चाहे किसी छोटे अख़बार में काम करें या देश के किसी विख्यात मीडिया घराने में जॉब सिक्योरिटी जैसी चीज़ आज भी पत्रकारों के लिए दूर की कौड़ी है। पत्रकारों की इस दशा का ज़िम्मेदार कोई और नहीं बल्कि स्वयं पत्रकार ही हैं। जब बात मीडिया की स्वतंत्रता या इसके जैसे मुद्दों की आती है, तो मोमबत्ती की रोशनी में पत्रकारों की एकजुटता नज़र आती है, लेकिन नौकरी से जुड़े मसलों पर ये एकजुटता एक-एक में विभिक्त हो जाती है। यानी हर कोई बस अपने ही हित तक सीमित होकर रह जाता है।

महाराष्ट्र से ताल्लुख रखने वाले एक टीवी पत्रकार जब विधानसभा में पहुंचें, तो साथियों को उनसे काफी उम्मीदें थीं। मगर जनाब अपने रुतबे के भार में उन उम्मीदों को दबा बैठे। आलम यह है कि बतौर पत्रकार भी अगर आप किसी समाचार के सिलसिले में उनसे बात करना चाहें, तो आपको समझ आ जाएगा कि आप किसी खालिस नेता से बात कर रहे हैं, जो आपको घुमाएगा, लटकायेगा और फिर हाथ जोड़ देगा। मुश्किल वक्त में इस भूतपूर्व पत्रकार की मदद करने वालों को भी यह अहसास हो गया कि अब उनकी दोस्ती भी भूतपूर्व हो गई है। पत्रकारिता के लिए इससे बदतर स्थिति और क्या हो सकती है कि अपने ही अपनों की सुध लेने से कतराते हैं। शायद ही कोई पत्रकार ऐसा होगा, जिसे अपनों के पराया होने का अनुभव न हुआ हो, लेकिन अफ़सोस की बात तो यह है कि कुर्सी का आकार बढ़ते ही यह अहसास भी काफूर हो जाता है। हम भले ही सैंकड़ों पत्रकार संघ खड़े कर लें पर पत्रकार और पत्रकारिता की स्थिति बदलने वाली नहीं है, क्योंकि पत्रकार भी शाहूजी काल के उन मुस्लिम आकाओं की तरह हैं, जिन्हें अपनी कौम की नहीं बल्कि अपने उत्थान की फ़िक्र है।


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