लोगों पर उंगली उठाने वाले पत्रकार खुद संवेदनशील कहां हैं?

लोगों पर उंगली उठाने वाले पत्रकार खुद संवेदनशील कहां हैं?

Tuesday, 25 July, 2017

नीरज नैय्यर

युवा पत्रकार ।।

आजकल दम तोड़ते घायल को अस्पताल पहुंचाने के बजाए उसे कैमरे में उतारने के किस्से आम हो गए हैं। हाल में ही पुणे में सड़क हादसे का शिकार हुआ एक युवक लोगों की इस सनक के चलते जान गंवा बैठा। इस तरह की ख़बरें जब मीडिया में आती हैं, तो खबर लिखने वाला पत्रकार जनता की संवेदनशीलता पर उंगली उठाना नहीं भूलता। खबरिया चैनलों पर अगली-पिछली सभी ख़बरों को जोड़कर संवेदनशून्यता का पैकेज तैयार कर लिया जाता है। लोगों को बार-बार यह बताने का प्रयास किया जाता है कि वो मानसिक दिवालियापन की स्थिति में पहुंच गए हैं। लेकिन जब एक पत्रकार का सामना ऐसी स्थिति से होता है तो क्या वो अपनी संवेदनशीलता का परिचय दे पता है?

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बात केवल घायल को अस्पताल पहुंचाने की ही नहीं है, ख़बरों के चयन में भी संवेदनशीलता की ज़रूरत होती है, जो पत्रकारों में लुप्त होती जा रही है। जब तक खबर में मसाला न हो, वो खबर नहीं बनती फिर भले ही उसमें कितना भी दर्द छुपा हो। करीब दो माह पूर्व रेलवे से जुड़ी एक ख़बर से मेरा सामना हुआ। ट्रेनिंग पर आए कर्मचारी से अफसरों की चाकरी करवाई जा रही थी और इसी दौरान उसकी मौत हो गई। उसके साथियों ने स्वीकारा कि उन्हें ट्रेनिंग के अलावा ऐसे कई दूसरे काम भी करने पड़ते हैं जिनका उनके ड्यूटी मैन्युअल से कोई लेना-देना नहीं। जैसा कि अक्सर होता है रेलवे ने मामले से हाथ झाड़कर मृतक के भाई को नौकरी देने से इनकार कर दिया।

चूंकि यह मुद्दा रेलवे में चल रही दास प्रथा उजागर करता है, और तमाम कर्मचारियों के भविष्य से जुड़ा है। मैंने इस पर काम करना शुरू किया। मैंने कई कर्मियों के बयान रिकॉर्ड किया, अधिकारियों से सच्चाई को खंगाला। सबकुछ सामने आने के बाद मैंने दिग्गज मीडिया घरानों से संपर्क किया, संपादकों को वॉट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर हर संभव माध्यम पर खबर के बारे में जानकारी दी। मुझे पूरी उम्मीद थी कि कोई न कोई इस मुद्दे को उठाने के लिए हामी ज़रूर भरेगा, मगर ऐसा नहीं हुआ। पत्रकारिता में सबसे विश्वसनीय नाम माने जाने वाले समूह के डिजिटल विंग के संपादक ने उल्टा मेरे से सवाल किया कि आखिर एक व्यक्ति की मौत राष्ट्रीय खबर कैसे हो सकती है? इस सवाल ने ही उनके इरादे स्पष्ट कर दिए, हालांकि मैंने उनसे तर्क-वितर्क किए लेकिन फायदा नहीं हुआ।

क्या मरने वाला मुस्लिम या दलित होता तो भी संपादक महोदय का रुख यही रहता? इस पर मुझे संशय है। उक्त संपादक के लिए शायद पहली माहवारी के अनुभव को लोगों तक पहुंचना सिस्टम की भेंट चढ़ चुके व्यक्ति को न्याय दिलाने से ज्यादा ज़रूरी था। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि संबंधित वेबसाइट ने इस विषय पर एक ख़ास सीरीज भी चलाई थी। बावजूद इसके मैं संपादक महोदय का आभारी हूं कि कम से कम उन्होंने मेरी बात सुनी, वरना आजकल तो संपादक अपनी व्यस्तता और रुतबे को प्रधानमंत्री से कम नहीं आंकते।

यहां से निराशा हाथ लगने के बाद मैंने कई भाषाओं में ख़बरें देने वाली वेबसाइट के संपादक से संपर्क साधा पर उन्होंने जवाब तक देना मुनासिब नहीं समझा। सोशल मीडिया पर अति सक्रिय रहने वाले संपादक दो शब्द लिखने में खुद को इतना असहज महसूस करेंगे, उम्मीद नहीं थी। इसके बाद मैंने तकरीबन हर बड़े पत्रकार को इस विषय से अवगत कराया पर नतीज़ा सिफर रहा। संभवत: सब इस तलाश में होंगे कि किसी मुस्लिम या दलित को कहां पीटा जा रहा है, क्योंकि इनके समर्थन में बोलो या खिलाफ सुर्खियां तो मिल ही जानी हैं।

मैंने तो जनप्रिय रवीश कुमार के लिए भी सोशल मीडिया पर संदेश छोड़ा, मगर उन्होंने देखकर भी अनदेखा कर दिया। क्या इन सभी पत्रकारों की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े नहीं किए जाने चाहिए? मैं शुक्रगुजार हूं समाचार4मीडिया का जिन्होंने इस खबर को खबर के नज़रिए से देखा और अपनी वेबसाइट पर जगह दी। ख़बरों को लेकर पत्रकारों का यह दोहरा मानदंड बताता है कि उन्हें खबर नहीं मसाले की तलाश रहती है और मोदी-योगी राज में यह मसाला उन्हें बहुत मिल रहा है।


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