स्मृति शेष: खुशवंत सिंह ने हिन्दुस्तान मैनेजमेंट को दिया था ये जवाब  

Monday, 20 March, 2017

प्रदीप सौरभ

वरिष्ठ पत्रकार ।।

खुशवंत सिंह उस अंतिम पीढ़ी के लेखक थे जिनसे लेखकीय अनुशासन सीखा जा सकता था। उनका कॉलम न काहू से दोस्ती,न काहू से बैर जितने लंबे समय तक चला, शायद इतनी लंबी अवधि का कॉलम किसी भी पत्रकार ने नियमित नहीं लिखा है, यह उनके अनुशासन की ही अद्भुत मिसाल थी।

जब उनके बेटे राहुल सिंह को टीवी पर सुना था, तो उसकी बातों से पता चला था कि वे देश के बारे में कितना सोचते थे। 99 साल की उम्र में देश को लेकर उनकी चिंता उनके व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ स्वत: ही बताती थी।

एक बार जब उनका साक्षात्कार करना था, तो उनसे उनके घर पर मुलाकात हुई। स्वास्थ्य ठीक न  होने के कारण उनका साक्षात्कार तो नहीं ले सका, पर उस समय एक युवा पत्रकार के तौर पर अपने प्रति उनका उदार भाव देखकर उनसे प्रभावित जरूर हुआ था। मैं पहली बार उनसे मिला, तो बड़ी नम्रता के साथ उन्होंने अपनी खराब तबियत का हवाला देते हुए साक्षात्कार के लिए मना किया, पर साथ ही साथ तुरंत स्कॉच का ऑफर दिया।

खुशवंत सिंह का जिक्र करते समय यह जरूर कहूंगा कि वे कट्टरवादिता के घोर खिलाफ थे। वे देश में सांप्रदायिक शक्तियों के उभार से काफी चिंतित थे। उन्होंने भिंडरवाले का खुलकर विरोध किया था, पर वे संजय गांधी के समर्थक भी रहे थे।

पत्रकारिता की बात करे तो खुशवंत सिंह ने दशकों पहले ही आधुनिक पत्रकारिता की विधा का खूब प्रयोग किया, उनकी क्रिएटिविटी लाजवाब थी।

‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ में उन्होंने भारत के विभाजन की त्रासदी चित्रण जिस मार्मिकता के साथ किया है, वे अतुलनीय है। वे हमेशा ही पुरातन विचारों, पाखंडवाद, कर्मकांड के विरोधी थे। उनके लेखन में जो बेबाकपन और बैलोसपन होता है वे उनके साफ दिल को दिखाता है। हां यह जरूर है कि उनको लेकर तमाम किवदिंतिया गढ़ी गईं है, जिसमें से कई असत्य भी है।

उनकी उदारता का एक उदाहरण यह है कि वे बीजेपी के वरिष्ठ नेता आडवाणी को पसंद नहीं करते थे, पर जब आडवाणी उनसे मिलने गए तो उन्होंने उनका दिल खोलकर स्वागत किया। यहां यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि वे अटल बिहारी बाजपेयी को पसंद करते थे। उनकी बात करते हुए एक बात जरूर याद आ गई जो हिन्दुस्तान संस्थान में काम करने वाले हर शख्स को पता होती है क्योंकि हिन्दुस्तान में काम करने वालों के बीच उन्हें लेकर चर्चा होना आम है। बताया जाता है कि एक बार अखबार प्रबंधन ने किसी बात पर नाराज होकर खुशवंत सिंह से कहा कि आप अब विश्राम कीजिए, आपकी तनख्वाह आप तक पहुंच जाया करेगी, इसके जवाब में खुशवंत सिंह ने कहा था कि विश्राम तो बस निगम बोध पर ही करूंगा...

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