महागठबंधन के नेतृत्व के लिए ममता बनर्जी क्यों हो सकती है खास, बताया वरिष्ठ आलोक मेहता ने...

महागठबंधन के नेतृत्व के लिए ममता बनर्जी क्यों हो सकती है खास, बताया वरिष्ठ आलोक मेहता ने...

Wednesday, 30 August, 2017

आलोक मेहता

वरिष्ठ पत्रकार ।।

लोकनायक बनने-बनाने की चुनौती

गांधी मैदान में एक बार फिर नए जन-आंदोलन का शंखनाद। पटना का वही ऐतिहासिक गांधी मैदान। नारा भी वही सत्ता से संघर्ष। लेकिन स्थितियां भिन्न, विचारधाराएं भिन्न, एकजुट नेताओं की महत्वाकांक्षाएं और हित भी भिन्न, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर विरोधाभासी तेवर। फिर भी लंबे अर्से के बाद देश में प्रतिपक्ष की बड़ी एकजुटता के साथ सत्ता से विमुख गंभीर आरोपों से घिरे नेता लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल के झंडे तले असाधारण भीड़ भरी रैली। निश्चित रूप से 1973-74 की तरह लोकनायक जयप्रकाश जैसा कोई नेता देश में नहीं है। न ही मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, जार्ज फर्नांडिस, मधु लिमये, राजनारायण जैसे जुझारू नेता प्रतिपक्ष के खेमे में हैं। जे पी. के पदचिन्हों पर चलने वाला एकमात्र बड़ा चेहरा शरद यादव का है, जो इमरजेंसी से पहले जे.पी. के ही ओदश पर 1974 में जेल से चुनाव लड़कर सत्ताधारी कांग्रेस को पराजित करके विजयी हुआ था। यों लालू प्रसाद यादव भी जे.पी. के बिहार आंदोलन के छात्र नेता के रूप में राजनीति में आए थे, लेकिन तब वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध मैदान में उतरे थे और इस बार स्वयं ऐसे ही आरोपों के कारण कठघरे में खड़े-दिखने के बावजूद सत्ता के विरुद्ध मोर्चा बनाए हैं।

समय का खेल देखिए कि आज 40 वर्षों के बाद नए लोकनायक की तलाश में जीवन भर एक दूसरे का विरोध करने वाले कांग्रेसी और प्रतिपक्ष के अधिकांश नेता अपने अस्तित्व के लिए एक साथ एक स्वर में बोल रहे हैं। पटना की रैली में सर्वाधिक दर्द और ईमानदार आवाज शरद यादव की ही सुनाई दे रही थी और उन्होंने बार-बार जयप्रकाश नारायण, महात्मा गांधी तथा कर्पूरी ठाकुर का नाम लेकर संघर्ष के आदर्शों की चर्चा की। उनके समर्थक भले ही कम हों, लेकिन वे शरद यादव से जे.पी. की तरह निर्विकार भाव से संपूर्ण प्रतिपक्ष को एक साथ जोड़कर भारतीय जनता पार्टी के तेज दौड़ते रथ को रोकने के अभियान की अगुवाई देखना चाहते हैं। यों राजनीतिक बाध्यताओं के कारण शरद यादव को भी जे.पी. की तरह 1974, 1989, 1998-99 में भाजपा-संघ के नेताओं के साथ रहना पड़ा है। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार भी वास्तव में शरद यादव के हर संभव सहयोग-समर्थन से सत्ता की राजनीति में लाभान्वित हुए हैं। हां, 1974 में सुशील मोदी के साथ रहने वाले लालू प्रसाद यादव 1989 के बाद कभी भाजपा के साथ नहीं जुड़े। लालकृष्ण आडवाणी के ऐतिहासिक सोमनाथ-अयोध्या रथ को बिहार में रोककर उनकी गिरफ्तारी का राजनीतिक साहस उन्होंने दिखाया था। उस समय नीतीश कुमार उनके साथ थे। यही नहीं नीतीश बाबू तो लालू राज के महाभ्रष्ट चारा-कांडके दौरान लालू सरकार के सहयोगी साथी थे। फिर भी शरद यादव और नीतीश कुमार पर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे। 2014-16 तक तो बिहार और राष्ट्रीय स्तर पर भरतीय जनता पार्टी के विरुद्ध संभावित प्रतिपक्ष की एकजुटता एवं महागठबंधन के लिए नीतीश कुमार के नेतृत्वकर्ता होने के अनुमान लग रहे थे। कांग्रेस पार्टी ने भी नीतीश के समक्ष समर्पण सा कर दिया था और महीने भर पहले तक लालू एवं सोनिया की पार्टी के विधायक नीतीश की सरकार में शामिल थे। इसे भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक दांव ही कहा जाएगा कि उसने गठबंधन के अगुवा नीतीश को ही अपने तंबू में खींच लिया। वर्तमान राजनीति में अब भाजपा के लिए कोई अछूत नहीं है। जब घोर विरोधी बहुगुणा बहन भाई, 50 सालों तक भयावह भर्तसना करने वाले एम.जे. अकबर को गोद लिया जा सकता है, तो 2014-15 तक सामने रखी थाली को छीनने वाले नीतीश कुमार को थाली सहित अपने खेमे में खंजर सौंपने में भाजपा को क्या कष्ट हो सकता है?

बहरहाल, महागठबंधन के नेतृत्व के लिए फिलहाल ममता बनर्जी को महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। कांग्रेस दावा कुछ भी करती रहे, अभी जनता में न तो उसकी विश्वसनीयता की वापसी हुई है और न ही 1977 की तरह इंदिरा-संजय गांधी जैसा संघर्षशील नेतृत्व है। वह दूसरी पंक्ति में ही ताकत बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। बंगाल की तरह पटना के गांधी मैदान में गरजी-बरसी ममता बनर्जी के पास सत्ता के साथ वोट बैंक का अच्छा-खासा फिक्स डिपॉजिट वोट भी है। वह मूलतः इंदिरा युग वाली जुझारू कांग्रेसी भी हैं। बंगाल की आपसी कांग्रेसी खींचातानी में वह अकेली पड़ गई लेकिन तृणमूल कांग्रेस बनाकर वर्षों से जमे कम्युनिस्ट राज को उन्होंने उखाड़ फेंका। अब भाजपा ने उनके कुछ साथी मंत्रियों-सांसदों को भ्रष्टाचार के आरोपों में घेरा है, लेकिन स्वयं ममता बनर्जी पर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार या कोई अन्य लाभ लेने का एक आरोप नहीं लगा सकी है।

वर्षों से सत्ता में रहकर ममता की आदर्श सादगी, ईमानदारी और समाज के प्रति समर्पण सचमुच अद्भुत है। वर्तमान राजनीति में उनके और त्रिपुरा के मार्क्सवादी मुख्यमंत्री की तरह ईमानदार सत्ताधारी कम ही मिलते हैं। गांधी मैदान में ममता के विरोधी कम्युनिस्ट नेता डी.राजा की उपस्थिति भी महागठबंधन की नई राजनीति का आशाजनक संकेत है। झारखंड के घोर विरोधी मरांडी-सोरेन भी शरद-लालू मोर्चे में आ गए। फिर उ.प्र. से पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का साथ आकर दोनों प्रदेशों की 11 और 22 करोड़ जनता का विश्वास अर्जित कर संघर्ष का ऐलान कम महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता। गंभीर आरोपों के कारण उनके चाचा शिवपाल यादव और नेता मुलायम सिंह भाजपा के कोप से डरकर डांवाडोल रहेंगे, लेकिन अब समाजवादियों को अखिलेश के बल पर ही अस्तित्व बचाना होगा।

बहरहाल, सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि महागठबंधन का सामना 1974 की तरह गंभीर विवादों से घिरी केन्द्र सरकार से नहीं है। नरेन्द्र मोदी स्वयं महानायक-लोकनायक की तरह प्रधानमंत्री के सिंहासन पर विराजमान हैं। उनसे भी बड़े नेता माने जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी को 14 अन्य दलों के गठबंधन को निभाते हुए सत्ता चलानी थी। उनके निर्णयों पर भाजपा के अपने लालकृष्ण आडवाणी प्रश्नचिन्ह लगाकर राह बदल देते थे। नरेन्द्र मोदी के साथ यह स्थिति नहीं है। भाजपा के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं अन्य जुड़े संगठनों के लाखों स्वयंसेवक इस समय मोदी के नेतृत्व का समर्थन कर रहे हैं। उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। ऐसी स्थिति में किसी भी महागठबंधन को एक लोकनायक सामने रखकर संघर्ष करना संभव नहीं होगा। शरद यादव और उनके साथियों की भाजपा सरकार की कुछ कमजोरियों-विफलताओं एवं राज्यों में कट्टरवादी संगठनों के अत्याचारों के आधार पर संघर्ष चल सकने की आशा भी गलत नहीं है। लेकिन यह लड़ाई लंबी और कठिन होगी। जनता को महानायक-लोकनायक तलाशने के लिए अभी समय लग सकता है।

 

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