वरिष्ठ पत्रकार निर्मलेन्दु का सवाल- क्या मायावती की चाल कामयाब होगी?

वरिष्ठ पत्रकार निर्मलेन्दु का सवाल- क्या मायावती की चाल कामयाब होगी?

Wednesday, 19 July, 2017

निर्मलेंदु

कार्यकारी संपादक

दैनिक राष्ट्रीय उजाला

क्या मायावती की चाल कामयाब होगी?

लीजिए मानसून सत्र की शुरुआत राजनीतिक दांव के साथ शुरू हुई है। मायावती ने पहले तो धमकी दी और उसके बाद इस्तीफा दे दिया। किसी ने नहीं सोचा होगा कि वह ऐसा कर सकती हैं। दलितों पर अत्याचार और अपनी बात नहीं रखने देने का लगाया आरोप। वह इसलिए खफा हो गई थीं, क्योंकि तीन मिनट का समय पूरा होते ही उपसभापति ने घंटी बजाकर मायावती को बात जल्द खत्म करने के लिए कहा। इस पर बिफर पड़ीं। गला रूंध गया और आवाज लुप्त सी हो गई। वह बोल नहीं पार्इं। हालांकि उन्होंने विरोध किया और कहा कि मैंने भाषण अभी पूरा नहीं किया है, इसलिए आप ऐसा नहीं कर सकते। माया ने विरोध करते हुए कहा कि यदि मुझे दलित अत्याचार पर अपना नजरिया नहीं रखने देंगे, तो मेरा सदन में बने रहने का नैतिक अधिकार ही नहीं है। मैं आज ही इस्तीफा देती हूं और उन्होंने सचमुच शाम को इस्तीफा दे दिया। सरकारी पक्ष का मानना है कि यह राजनीतिक स्टंट है, तो विपक्ष का मानना है कि यह अपमान है। समूचा विपक्ष माया के समर्थन में दिखा।

दूसरी ओर से उपसभापति की आवाज आई- नियमों के तहत किसी सदस्य को बोलने का असीमित समय नहीं दिया जा सकता। दरअसल, मंगलवार को मायावती ने राज्यसभा में सहारनपुर में दलितों पर अत्याचार का मुद्दा जोर-शोर से उठाया था। हम सब जानते हैं कि दलित समुदाय के बीच मायावती का आधार धीरे धीरे दरक रहा है। सच तो यही है कि देश की सबसे बड़ी दलित नेता की उनकी छवि धीरे धीरे धूमिल होती जा रही है और इसका प्रभाव फ्रस्ट्रेशन के रूप में दिख रहा है। शायद यही वजह है कि उन्होंने आक्रामक रुख अपनाया और भाजपा के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। राज्यसभा में उन्होंने सीधे भाजपा को निशाने पर लेते हुए कहा कि जहां-जहां भी इस पार्टी की सरकार है, वहां दलितों पर अत्याचार हो रहा है। हालांकि लालू ने सीधे शब्दों में मायावती का समर्थन किया और कहा कि हम राज्यसभा भेजेंगे माया को। उन्होंने कहा कि अगर वह चाहेंगी, तो उन्हें फिर राज्यसभा भेजेंगे। उधर विरोधियों का कहना है कि सियासी जमीन बचाने के लिए मायावती ने खेला यह पत्ता। राजनीतिक पंडितों का तो यह भी मानना है कि जाटव वोट बैंक का खेल है यह। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि चुनावों में बुरी तरह हारने के लिए वह परेशान हो गई हैं और उसी परेशानी का यह नतीजा है। यह इस्तीफा नहीं, खेल है, राजनीतिक खेल, जिस खेल में मायावती माहिर हैं। हालांकि अब मतदाता काफी समझदार हो गये हैं। वे समझते हैं कि इस तरह की सियासत का मतलब क्या है।

राजनीतिक पंडितों का यह भी मानना है कि इस इस्तीफे का स्वीकार होने की संभावना कम ही दिख रही है। दरअसल, नियम के मुताबिक इस्तीफे के साथ न कोई कारण बताया जाता है और न ही उस पर कोई सफा दी जाती है। ऐसे में वर्तमान स्वरूप में मायावती का इस्तीफा स्वीकार होने की संभावना कम ही दिख रही है। अब अगर हम यह कहें कि भावुकता में आकर उन्होंने इतना बड़ा कदम उठाया है, तो शायद गलत होगा। दरअसल, यह एक सोची समझी राजनीतिक रणनीति है। हड़बड़ी में उठाया गया कदम नहीं है। ऐसे में यह कह सकते हैं कि सियासी दांव है बसपा प्रमुख का यह त्यागपत्र।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो। उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। मायावती ने भी हिम्मत दिखाई और अपनी बात रखने की कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हुईं और उन्हें अपनी धमकी को जायज ठहराने के लिए इस्तीफा देना ही पड़ा। भले ही विपक्ष उनका साथ दे, लेकिन सवाल तो यह उठता ही है कि क्या मायावती की यह चाल कामयाब होगी?


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