भारतीय मीडिया की आंख-कान, हाथ पर बंधन का कितना औचित्य है: आलोक मेहता

भारतीय मीडिया की आंख-कान, हाथ पर बंधन का कितना औचित्य है: आलोक मेहता

Monday, 24 July, 2017

आलोक मेहता

वरिष्ठ पत्रकार ।।

माननीय सभासदों बदनाम ना करो

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद के उच्च सदन में आवाज गूंजती है- माननीय सभासदों-माननीय सभापति।सभी सदस्य सभापति यानी उपराष्ट्रपति का खड़े होकर अभिवादन करते हैं, तो पूरा देश गौरवान्वित महसूस करता है। राज्य विधानसभाओं से चुने गए और नामजद योग्य, अनुभवी, विद्वान-जन प्रतिनिधि। उसी सदन में जब कोई सदस्य अभद्र भाषा का उपयोग और संसदीय नियम परंपरा के विरुद्ध व्यवहार करता है, तो क्या सदन के अंदर और देश-दुनिया में राज्यसभा टीवी के चैनल के सीधे प्रसारण को देख रहे करोड़ों लोग मूकदर्शक की तरह आंखें बंद कर प्रणाम करेंगे?

ताजा मामला राज्यसभा में समाजवादी पार्टी के माननीय सदस्य नरेश अग्रवाल की घोर असंसदीय असंवैधानिक, धर्म विरोधी, समाज के लिए अति उत्तेजक टिप्पणी का है। सदन में दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार जैसे गंभीर विषय पर बहस के दौरान सम्मानित सदस्य नरेश अग्रवाल ने देवी-देवताओं के नामों को तोड़-मरोड़कर शराब की विभिन्न ब्रैंड के साथ तुलना की, तो सदन में हंगामा होने से अधिक टीवी पर राज्यसभा की कार्यवाही देखकर लाखों लोग हतप्रभ, आहत और उत्तेजित हो गए। हंगामे और विरोध के बाद उपसभापति ने नरेश अग्रवाल की टिप्पणी सदन की कार्यवाही को रिकॉर्ड से निकालने का निर्देश दे दिया।

समस्या यहीं से अधिक गंभीर होती है। संसद और राजनीति की रिपोर्टिंग करते हुए मुझे भी लगभग 45 वर्ष हो गए हैं और संसद की गरिमा, विशेषाधिकार, लोकसभा के अध्यक्षों अथवा राज्यसभा के सभापतियों द्वारा समय-समय पर सांसदों तथा पत्रकारों के साथ संवाद में भागीदारी के अवसर मिले हैं। इसमें कोई शक नहीं कि नब्बे के दशक से पहले संसद की कार्यवाही का अक्षरशः रिकॉर्ड केवल सदन में बैठे स्टेनोग्राफर दर्ज करते थे और टाइप होने के बाद आवश्यक भाषा इत्यादि के संशोधनों के साथ संसदीय रिकॉर्ड में रखा जाता रहा। इस व्यवस्था के साथ पहले दूरदर्शन, फिर लोकसभा और राज्यसभा के टीवी चैनलों का सीधा प्रसारण होने लगा, ताकि देश-दुनिया की जनता भारतीय लोकतंत्र के रक्षकों के महत्वपूर्ण योगदान को निरंतर देखती-समझती रहे। जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका जैसे अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है। कुछ देशों में तो महत्वपूर्ण संसदीय समितियों की बैठकों का भी टीवी प्रसारण होता है। प्रिंट मीडिया के प्रभाव वाले दौर में सांसद कई बार अपनी बातें रखते हुए प्रेस गैलरी की तरफ भी देखा करते थे, ताकि यह अंदाज लग जाए कि उनकी बात के दूर-दराज तक पहुंचने की संभावना है। टीवी कैमरे लगने के बाद शालीन व्यवहार, सुंदर वेश-भूषा और चर्चा के दौरान गंभीर मुद्दे, आक्रोश-विरोध एवं शेरो-शायरी पर भी उनका ध्यान रहने लगा। इसी दृष्टि से पिछले डेढ़ दशक से हम जैसे संपादकों-संसदीय संवाददाताओं ने लोकसभा-राज्यसभा के सभापतियों का ध्यान आकर्षित किया था कि सीधे प्रसारण और डिजिटल क्रांति के दौर में सदन में व्यक्त विचार के किसी अंश को लिखित रिकॉर्ड से भले ही हटा दिया जाए, मीडिया में उसके प्रसारण और प्रकाशन पर अंकुश कितना व्यावहारिक और संभव है?

वर्तमान युग में तो सदन की कार्यवाही के किसी भी हिस्से को दुनिया के किसी भी कोने में रिकॉर्ड किए जाने के बाद इंटरनेट, फेसबुक, मोबाइल या ट्विटर पर चलाया जा सकता है। फिर भारतीय मीडिया की आंख-कान, हाथ पर बंधन का कितना औचित्य है? इस मुद्दे पर फैसला अब तक विचाराधीन ही कहा जा सकता है। आखिरकार मामला संसद एवं सम्मानित सदस्यों के विशेषाधिकार का है।

इसी विशेषाधिकार का हवाला देकर सांसद नरेश अग्रवाल महोदय ने हिन्दू देवी-देवताओं पर की गई घोर अभद्र टिप्पणी के टीवी पर प्रसारण एवं कुछ अखबारों में प्रकाशन पर अपनी आपत्ति के साथ पत्रकारों और टीवी समाचार प्रसारण कर्ताओं पर कठोर कार्रवाईकरने, सदन में अपराधीकी तरह खड़ा कर जेल की सजा देने तक की मांग रख दी। आश्चर्य की बात यह है कि कांग्रेस सहित प्रतिपक्ष के कुछ अन्य नेताओं ने भी इसे विशेषाधिकार हननका मामला बताते हुए कार्रवाई का समर्थन किया।

आजादी के बाद पिछले 70 वर्षों में किसी पत्रकार को इस तरह जेल नहीं भेजा गया। यहां तक कि इमरजेंसी में सत्ताधारियों के भारी बहुमत के बावजूद संसद में ऐसी कार्रवाई नहीं हुई। सदन के बाहर अवश्य कुछ पत्रकार-प्रकाशक अन्य राजनेताआओं की तरह जेल गए और छूटे। पिछले महीनों के दौरान कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के एक नेता एवं विधान सभाध्यक्ष के भ्रष्टाचार के आरोपों के प्रकाशन को लेकर विशेषाधिकार हनन समिति ने संबंधित दो पत्रकारों को एक वर्ष की जेल एवं दस हजार रुपये के जुर्माने की सजा का फरमान जारी कर दिया। एडिटर्स गिल्ड एवं अन्य पत्रकार संगठनों द्वारा कड़े विरोध एवं अदालत से संतुलित दिशा-निर्देश मिलने एवं सत्ताधारियों को राजनीतिक परिणामों की समझ में आने के बाद फिलहाल यह सजा टल गई। लेकिन ये दो घटनाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था में खतरे की गंभीर घंटियां हैं।

संविधान निर्माताओं ने तब आजादी के दौर में चुने जाने वाले प्रतिनिधियों की गंभीरता, गरिमा एवं अनुशासन को ध्यान में रखकर उन्हें बाहरी हस्तक्षेप और एक हद तक अभिव्यक्ति के लिए न्यायपालिका की परिधि से दूर रखने के लिए विशेषाधिकार हनन के नियमों का प्रावधान किया था। लेकिन 70 वर्षों के दौरान गंगा-यमुना की तरह क्या विभिन्न क्षेत्रों में प्रदूषण नहीं आया है? चुने गए प्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार और अपराधों पर अदलतों के साथ जनता ने भी कठोर निर्णय दिए हैं।

टीवी प्रसारण के युग से पहले सत्तर-अस्सी के दशक में जब जनसंघ के हुकमचंद कछवाय, सोशलिस्ट नेता राजनारायण, कल्पनाथ राय (बाद में कांग्रेस में आए) जैसे सांसद सदन मे अपने विरोध पर अध्यक्ष के आसान के सामने बैठ जाते थे, तो संसदीय सुरक्षाकर्मी उन्हें बाकायदा उठाकर बाहर ले जाते थे और इस विरोध-व्यवहार की खबरें अखबारों में छपती थीं। वैसे तो उसका प्रचार-प्रसार भी उनकी बदनामी ही थी। फिर पिछले वर्षों के दौरान संसद और विधानसभाओं में हंगामों, धरनों और सदन में तोड़-फोड़ की घटनाएं देश-दुनिया में प्रचारित प्रसारित हुई हैं। ऐसे दृश्य जापान, दक्षिण कोरिया जैसे अन्य देशों में भी देखने को मिले, क्या उन घटनाओं को रिकॉर्ड से निकाला जा सका है? सवाल यह भी है कि संसदीय परंपराओं, नियमों-कानूनों की धज्जियां उड़ाने वालों को सदन से निलंबन से कड़ी सजा पर विचार क्यों नहीं होता? यदि कोई सदस्य संसद में गंभीर अपराध ही कर दे, तो न्यायालय से उसे भारतीय कानूनों के तहत अदालत से जेल क्यों नहीं हो सकती?

इन सारे तथ्यों के बावजूद श्रीमान नरेश अग्रवाल के बयान पर गंभीर अपमानजनक टिप्पणी या गैरकानूनी धमकियों को भी कोई उचित नहीं मानेगा। सांसद या विधायक भारतीय कानूनों की सहायता लेकर अपना बचाव कर सकते हैं। मीडिया भी कानून से ऊपर नहीं है। लेकिन सांसद-विधायक की अभिव्यक्ति का अधिकार भारतीय कानून-संविधान से ऊपर एवं स्वछंद नहीं माना जा सकता है। लोकतंत्र के वर्तमान संक्रांति काल में विशेषाधिकार हनन एवं मीडिया की स्वतंत्रता के मानदडों पर सर्वोच्च स्तरों पर समीक्षा की आवश्यकता है।

(लेखक एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

 

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