युवा पत्रकार ऋषभ सक्सेना ने बताया- समाज के लिए यह किया था श्रीदेवी ने....

Wednesday, 28 February, 2018

सोशल मीडिया के बिज्जू उन्हें मुक्ति नहीं लेने दे रहे। मीडिया को तो लाशों पर दावत उड़ाने की आदत है। लेकिन हमारी संवेदनाएं कहां मर गई हैं?’ अपने फेसबुक अकाउंट के जरिए ये कहा युवा पत्रकार ऋषभ कृष्ण सक्सेना ने। उनका ये पोस्ट आप यहां पढ़ सकते हैं-

श्रीदेवी आज होम हो जाएंगी। कल से मीडिया... म्लेच्छ इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया उन्हें भूल जाएगा। आप भी भूल जाइए। आप सभी... जो पिछले चार दिन से मीडिया की म्लेच्छता को फेसबुक पर टक्कर दे रहे हैं।

एक जानवर होता है- बिज्जू। अपनी तरह का इकलौता खतरनाक और घिनौना जानवर होता है बिज्जू। कब्र खोदकर मुर्दे को भी खा जाता है। संवेदनाशून्य होना एक बात है और बिज्जू बन जाना दूसरी बात।

मुझे नहीं पता कि शनिचर की रात को जब दुबई के होटल में श्री बाथटब में धीरे-धीरे समा रही थीं... पानी उनके फेफड़ों के मुहाने तक पहुंच गया था... उखड़ती सांस पांव जमाए रखने के लिए जद्दोजहद कर रही थी... उस लम्हें में श्री डरी थीं या नहीं, मुझे नहीं पता... उन्हें तकलीफ हुई थी या नहीं... मुझे नहीं पता और यह भी नहीं पता कि उस खौफ के बाद उन्हें मुक्ति मिली या नहीं। मगर यह जरूर पता है कि सोशल मीडिया के बिज्जू उन्हें मुक्ति नहीं लेने दे रहे। मीडिया को तो लाशों पर दावत उड़ाने की आदत है। लेकिन हमारी संवेदनाएं कहां मर गई हैं?

श्री बोटॉक्स लेती थीं... श्री जवान दिखने के लिए हर साल चार बार कैलिफोर्निया जाती थीं... श्री ने अनगिनत सर्जरी कराई थीं... युवा और सुंदर दिखने की श्री की अंधी चाहत का ही यह परिणाम है... ऐसा लिखने वाले यह नहीं कबूलते कि श्रीदेवी के उसी यौवन को देखने के लिए सिनेमा के कितने टिकट खरीदे थे उन्होंने। कोई कहती हैं कि सुंदर दिखने के लिए सर्जरी कराने का यह दुष्परिणाम है। लेकिन अपनी टाइमलाइन पर भद्देपन की हद तक रंग-रोगन किए अपने ही चेहरे की तस्वीरें उसे नजर नहीं आतीं। वह यह नहीं कबूलती कि श्रीदेवी या दूसरी तारिकाओं के प्रचार को देखकर उसने कितने हजार या लाख रुपये सौंदर्य प्रसाधनों पर फूंके हैं। केवल इसीलिए कि उम्र की किताब में कुछ कम पन्ने नजर आएं।

अब सुनिए। जिस तरह डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और पत्रकार को भी अपने पेशे के लिए लगातार नया सीखना पड़ता है, तैयार रहना पड़ता है। वैसे ही सिने तारिकाओं को भी सुंदर दिखना होता है। सुंदर दिखना उनके लिए पहली शर्त होती है, जो आप ही ने तय की है। वरना फूहड़ शक्ल के साथ श्रीदेवी की आलोचना करने वाली भी किसी की रूप की रानी कहलातीं। लेकिन नहीं कहलाती हैं और उसकी भड़ास बिज्जू बनकर निकालती हैं, किसी श्रीदेवी की मौत के बाद। उसी पेशे के लिए श्रीदेवी को सुंदर दिखना था। वही उसकी आय का जरिया था। उसी के लिए वह खुद को तैयार करती थीं। और उस तैयारी के लिए वह आपकी जेब नहीं काटती थीं। आप बाकायदा टिकट खरीदते थे, जिसकी कमाई का एक हिस्सा उसे भी मिलता था।

कुछ लोग तो बेशर्मी के साथ यह तक पूछ डालते हैं कि श्रीदेवी ने समाज के लिए किया ही क्या है? उन्हें पता होना चाहिए कि जब कोई मजदूर हाड़तोड़ मेहनत के बाद मनोरंजन के लिए सिनेमा हॉल में घुसता है न, तो उसे विद्या बालन या नंदिता दास या स्वरा भास्कर जैसी कथित गंभीर और गरिष्ठ फिल्में नहीं चाहिए। उसे बीन की धुन पर बदन लहराती, बारिश में फिरोजी साड़ी पहनकर अंगड़ाई लेती, सफेद लिबास में चुहल करती या गजब की कॉमिक टाइमिंग के साथ हंसाती श्रीदेवी चाहिए। समाज के लिए यही किया था श्रीदेवी ने। जिंदगी की बुनियादी जरूरतों में से एक मनोरंजन दिया था उसने।

आप चार साल की उम्र से चौवन साल की उम्र तक काम करने वाली महिला को देखिए। दक्षिण की देहरी लांघकर हिंदी में सिफर लड़की ऐसे ही तो फीमेल अमिताभ बच्चन नहीं बन जाती। उसकी मेहनत देखिए। खुद भी मेहनत करिए... उसकी दक्षिण भारतीय फिल्में देखिए... बालपन में उसके चेहरे पर आए भाव देखिए। स्कूल से महरूम, सखियों से महरूम, झूले से महरूम, खिलौनों से महरूम श्रीदेवी को देखिए, जिसने अपनी चौवन साला जिंदगी में पचास साल सेट पर लाइटों के नीचे ही गुजारे। जब मीडिया नहीं था, पब्लिसिटी मैनेजर नहीं थे, केवल टिकट से कमाई होती थी, उस वक्त पूरे बॉलीवुड की बेताज मल्लिका रहीं श्रीदेवी को याद कीजिए। शायद अपने लिखे पर आपको शर्म आ जाए।

और श्रीदेवी के निधन के बाद मुक्तक, छंद, कविताएं रचने वालों... उनकी आठ फिल्मों के नाम शामिल कर कथित कविता केवल लाइक्स के लिए लिखी जा सकती है, श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं।

माफ कर दीजिए उन्हें... चैन से सोने दीजिए उन्हें।

 

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