तो सारा ठीकरा मीडिया के सिर फोड़ दिया...

Thursday, 21 December, 2017

डॉ. प्रदीप कुमार राय

हर दिन जो संदेश हमें मीडिया या नजदीकी लोगों से मिलते हैं, उसको कैसे छानें? अर्थात उनमें निष्पक्षता और पक्षपात को कैसे जांचे? इस विषय पर एक चर्चा का संचलान करने का मौका मुझे मिला। चर्चा के प्रतिभागियों को साफ साफ बताया गया कि संसार के ज्यादतर देशों ने स्वीकार कर लिया है कि सच और झूठ तोलने में दर्शकों, पाठकों को पूरी भूमिका निभानी पड़ती है। इसके अलावा कोई रास्ता नहीं।

यह भी बताया कि संसार के अधिकांश देशों ने अपने नागरिकों को मुख्यधारा मीडिया व सोशल मीडिया के सदेंशों का विश्लेषण करने में सक्षम बनाने के लिए विशेष कोर्स चलाए हैं ताकि उनके देश में सक्रिय, पाठक-दर्शक बन सके और भ्रामक सूचनाओं से लोकतंत्र की रक्षा करें। लेकिन हमारी चर्चा में सम्मानित प्रतिभागियों ने कहा हमें क्या लेना देना दुनिया से। दो महाश्यों ने तो यहां तक कहा कि हम तो ये भी यकीन नहीं करते कि उन देशों को ऐसे कोर्स चलाकर फायदा हुआ होगा। मैंने कहा नेट पर चेक करो। वो बोले हमें क्या लेना देना दुनिया में क्या हो रहा है? हमें तो ये जवाब चाहिए कि भारतीय मीडिया हमें निष्पक्ष खबरें क्यों नहीं दे रही? पहले पन्ने पर विज्ञापन क्यों होता है आदि आदि...।

मैंने कहा, भाई बड़े अखबार की प्रति 40 रुपए की छपती है और तीन रुपए में बेचते हैं। फिर विज्ञापन से खर्चा न निकाले तो कहां जाएं। इस बात का उनके पास कोई जवाब नहीं। मैंने कहा चलो मुख्यधारा की मीडिया आपको सही खबरें नहीं देती, आपकी बात मान ली। लेकिन जब आप सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हैं आप भी तो पत्रकार से कम नहीं। आप पूरी जिम्मेदारी से संसार को पूरा-पूरा सच बताते हैं। इससे पहले कि वो महाश्य जवाब देते- बगल वाले एक भैया ने कहा, भाई अपने बीव- बच्चों के साथ गॉगल पहनकर फोटो खिंचवाने और सेल्फी के लिए ही तो सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं।

मैंने कहा देखो, कोई संदेश देते समय या लेते समय बहुत जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। इस पर भी कई महाश्यत तिड़के- कहने लगे कि ये भारत है, ऋषि मुनियों का देश है। यहां सचेत भाव खून में है। कोई फेसबुक, ट्विटर से भ्रामक सूचनाएं देकर इस देश का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मैंने कहा फिर आप ये बताएं कि जब आपको फेसबुक और ट्विटर पर प्रोपेगंडा की चिंता नहीं, हे ऋषियों की संतानों, फिर मुख्यधारा मीडिया में पक्षपात पर इतने व्याकुल क्यों हैं। बोले ये मामला और है। मैंने कहा चलो तुम्हे ऋषियों की दुहाई देता हूं। भारत के ऋषियों ने तो हजारों साल पहले संदेशों को छलनी से छानने के लिए पूरे कोर्स तैयार कर दिए थे, अब आप लोग उसके महत्व को आज क्यों नहीं समझ रहे।

फिर अचानक सभा में मुद्दा बदल जाता है। सवाल उठता है कि मुख्यधारा की मीडिया पर ही पूरी जिम्मेदारी है। मैंने कहा चलो ठीक है। पर एक सवाल का जवाब दीजिए कि समाज को पूरा सच बताने का ठेका सिर्फ पत्रकारों का ही है क्या? जब अन्य फील्ड से जुड़े लोग कोई किताब लिखते हैं, वो भी तो समाज से संवाद करते हैं, वो दुनिया को अपने क्षेत्र का पूरा सच बताएं। बहुत क्षेत्रों के लोग ब्लॉँग लिखते हैं, मैनें कहा कि भारतीय संदर्भ में ऐसा कम ही देखा गया है कि कि कोई ऐसा लेखक समाज को वो बता रहा हो जो मुख्यधारा मीडिया न बता पाया। बस इस बात पर फिर वही जिद है- न जी सारा जिम्मा मीडिया का है।

एक डॉक्टर साहब मीडिया पर सबसे ज्यादा तीर मार रहे थे। मैंनें कहा डॉक्टर साहब समाज हित का जिम्मा तो हर पेशे के लोगों का है, बुरा न मानिएगा कि डॉक्टर के पेशे से लोगों का विश्वास चकनाचूर हो गया। हाल में कितने मामले हुए। वो बोले देखिए डॉक्टर भी एक इंसान है, उससे गलती हो जाती है। मैंने कहा ठीक है- लेकिन श्रीमान जी मीडिया में कौन सा देवताओं की भर्ती होती है, वहां भी तो इंसान ही हैं। इस बात पर फिर वही जिद नहीं जी मीडिया सबसे ज्यादा गड़बड़ी कर रहा है। देखिए चर्चा संचालाक के तौर पर, पत्रकार व पत्रकारिता के शिक्षक के नाते मैं इन सब प्रतिभागियों के भावों का कोई विरोध नहीं करता, उन्हें अपनी बात रखने की पूरी आजादी थी। लेकिन सवाल ये था-

ये कैसे मुन्सिफी है कि महफिल में तेरी

करे जुर्म कोई भी, पाए सजा हम।

और अंत में अभी भारत मीडिया लिटरेसि के तैयार नहीं हो पाया। अभी भारत में मीडिया को लेकर परिपक्व समझ नहीं बन पाई है। केन्या में भी भारत से ज्यादा मीडिया चेतना है। ये मेरे लिए पीड़ा का विषय है।

 

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