मीडिया कब समझेगी कि कॉमिक रिलीफ और जीवन की सहजता के भी मायने होते हैं...

मीडिया कब समझेगी कि कॉमिक रिलीफ और जीवन की सहजता के भी मायने होते हैं...

Wednesday, 20 December, 2017

विनीत कुमार

मीडिया विश्लेषक ।।

गुजरात चुनाव के परिणाम आने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने चार दोस्तों के साथ फिल्म देखने चले गए। टाइम्स नाउ सहित कई दूसरे मीडिया ब्रैंड इस बात को इतनी तूल देने में लगे हैं कि जिससे लोगों के बीच राहुल गांधी की ऐसी छवि बने कि उन्हें हार का कोई दुख नहीं है। वो उन्हें लापरवाह, बेफिक्र और अमानवीय तक मानने लग जाएं।

लेकिन ऐसी छवि बनाते हुए वो इस सिरे पर खड़े होकर कभी नहीं सोच पा रहे कि कॉमिक रिलीफ और जीवन की सहजता जैसी कोई चीज भी होती है। अव्वल सिनेमा के प्रति अभी भी उनकी वही समझ है जो हमारे दादा-बाबा की हुआ करती थी।

ये चैनल, ये संस्थान शायद मानवीय आधार पर कभी इसलिए भी नहीं सोच सकते क्योंकि खुद इनके संस्थान के भीतर, इनके वर्किंग कल्चर में इन सबका मोल नहीं है। वो खुद भारी फ्रस्ट्रेशन, हताशा के बीच काम कर रहे होते हैं। मुझे खुशी है कि नेता के रूप में भी राहुल गांधी के भीतर ये सहजता बची हुई है और जीवन को जीवन की ही तरह ले रहे हैं, बहुमत की तरह नहीं।

जीवन की सहजता से कटकर यदि मीडिया काम करने लगे तो यही सारे मुद्दे आपको देखने-सुनने को मिलेंगे। लेकिन जो लोग बहुत कर्मठ नजर आते हैं, चौबीसों घंटे मतलब और काम की बातें करते हैं वो जिंदगी से कितने दूर और भटके होते हैं, इसका अंदाजा लगा पाना मीडिया संस्थानों की समझ से बाहर है। जो मीडिया इन बातों के बीच से सामाजिक प्रतिबद्धता के सवाल खोज रहा होता है, कई बार उस पाखंड को हवा दे रहा होता है जिसमे काम करता हुआ दिखाया गया आदमी भी काम और श्रम के महत्व को खत्म कर रहा होता है।

 

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