"BBC हिन्दी के टॉप-10 सबसे लोकप्रिय पोस्ट देखे, तो पांव तले से ज़मीन खिसक गई'

Wednesday, 14 March, 2018

राजनीति में हम कहते हैं कि हर आने वाली सरकार पिछली सरकार से अधिक बुरी साबित होती है, वैसे ही हमारे मीडिया में भी हो गया है। हर आने वाला मीडियम पिछले मीडियम से अधिक बुरा साबित हो रहा है।अपनी फेसबुक पोस्ट के जरिए यह कहना है टीवी पत्रकार अभिरंजन कुमार का। उनका ये पोस्ट आप यहां पढ़ सकते हैं-

क्या भारत में डिजिटल मीडिया का भविष्य पोर्न, सेमी-पोर्न या सेक्स-संबंधी कंटेंट पर आश्रित हो गया है? यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं कि अखबार या टीवी चैनल चलाने वाले किसी भी प्रतिष्ठित भारतीय मीडिया समूह की वेबसाइट को देख लीजिए। उस पर कम से कम 30-40 प्रतिशत कंटेंट पोर्न, सेमी-पोर्न या सेक्स-संबंधी है। इतना ही नहीं, इस पोर्न, सेमी-पोर्न या सेक्स-संबंधी कंटेंट में भी अक्सर सेक्स के भी उन वर्जित क्षेत्रों में प्रवेश कर जाने की हवस दिखाई देती है, जिसकी समाज और कानून में इजाज़त नहीं है।

जैसे "इनसेस्ट" न्यूज़ (चाहे ये फेक हो या रियल, लेकिन सनसनीखेज तरीके से अवश्य परोसे जाते हैं)। वे इसे "ट्रैफिक बूस्टर" के रूप में प्रकाशित-प्रसारित करते हैं और इसके लिए उनके भीतर कोई गिल्ट या अपराध-बोध भी नहीं होता है, न कोई "एथिक्स" आड़े आते हैं। हमारे देश का मीडिया अब "एथिक्स" की सरहदों को लांघकर अति-आज़ाद हो गया है।

यहां तक कि आज जब BBC हिन्दी के टॉप-10 सबसे लोकप्रिय पोस्ट देखे, तो पांव तले से ज़मीन खिसक गई। 10 में से 4 ख़बरें पोर्न, सेमी-पोर्न या सेक्स-संबंधी हैं। दूसरी तरफ़ जब हम BBC अंग्रेज़ी साइट देखते हैं, तो वहां इस तरह का कंटेंट नहीं दिखाई देता है। चीनी मल्टीनेशनल अलीबाबा ग्रुप द्वारा भारत में संचालित UCNews पर भी भारी मात्रा में इसी तरह का कंटेंट दिखाई देता है। वहां तो भाषा का भी संस्कार नहीं है। यहां तक कि उनके कथित सेलिब्रिटी राइटर्स भी उनके प्लेटफॉर्म पर गलत हिन्दी का धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं।

इन उदाहरणों से एक एंगल तो यह स्पष्ट रूप में समझ आता है कि मीडिया भी "बदचलन" हो गया है और पैसे के लिए जैसे "प्रॉस्टीट्यूट" अपना तन बेचती है, वैसे ही इसने पैसे के लिए अपनी आत्मा बेच दी है। इसलिए जनरल वीके सिंह द्वारा मीडिया को "प्रेस्टीट्यूट" कहने वाली बात काफी हद तक सही प्रतीत होती है। यह टिप्पणी इस डिस्क्लेमर के साथ है कि जनरल वीके सिंह का मैं कोई फैन नहीं हूं, क्योंकि आर्मी में अपने आखिरी दिनों से लेकर वाया अन्ना आंदोलन बीजेपी में प्रवेश करने और मंत्री बनने तक उन्होंने जितने रंग बदले, वह कई बार अशोभनीय भी लगा। जनवरी 2013 में पटना में अन्ना हज़ारे के मंच से उनका भाषण हास्यास्पद था, जिसके बाद हमने उनके बारे में नए सिरे से समीक्षा शुरू की।

बहरहाल, दूसरा एंगल मुझे साज़िश का भी नज़र आता है। क्या सचमुच कुछ विदेशी ताकतें हमारी सभ्यता और संस्कृति पर योजनाबद्ध तरीके से चोट करना चाहती हैं और इसके तहत खासकर युवाओं में विकृतियों को उभारने का प्रयास किया जा रहा है? इसके लिए दमित यौन भावनाओं को उभारना और उन्हें आज़ादी और मनोरंजन से जोड़ना क्या उनका एक हथियार है, जिसे हमारे ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा रहा है? सवाल यह भी है कि क्या BBC अपने अंग्रेज़ी ऑपरेशन्स में या UCNews चीन में अपने ऑपरेशन्स में वैसी सामग्रियां प्रसारित करते या कर सकते हैं, जैसी वे भारत में कर रहे हैं?

दुर्भाग्यपूर्ण है, पर सच है कि जैसे राजनीति में हम कहते हैं कि हर आने वाली सरकार पिछली सरकार से अधिक बुरी साबित होती है, वैसे ही हमारे मीडिया में भी हो गया है। हर आने वाला मीडियम पिछले मीडियम से अधिक बुरा साबित हो रहा है। अख़बारों से गया-गुज़रा टीवी निकला। अब टीवी से भी गया गुज़रा डिजिटल मीडिया साबित हो रहा है। आज डिजिटल स्पेस में फेक न्यूज़, घृणा फैलाने वाली भड़काऊ सामग्रियां और पोर्न-रिलेटेड कंटेंट ने कब्ज़ा कर लिया है।

जब तक केवल अखबार-पत्रिकाएं थीं, मुख्यधारा के मीडिया में थोड़ा चरित्र और सरोकार बचा हुआ था। फिर जब टीवी आया, तो सनसनी बेचने और टीआरपी कमाने के प्रयास में उसने मीडिया के मूल चरित्र और सरोकारों से बढ़-चढ़कर समझौता किया। लेकिन डिजिटल मीडिया में तो इस चरित्र और सरोकार को आप ढूंढ़ते ही रह जाएंगे। पूरे कुएं में भांग पड़ी है। लेकिन हमारे यह सब कहने का मतलब नई टेक्नोलॉजी या डिजिटल मीडिया के विचार का विरोध करना नहीं, बल्कि उसके बढ़ते दुरुपयोग पर अपना एतराज जताना है।

अधिक रीडरशिप और व्यूअरशिप या प्रकारांतर से अधिक रेवेन्यू कमाने के लालच में मीडिया मालिकों और संपादकों का ज़मीर सो गया है। वे अब इस बात पर ज़रा भी दिमाग नहीं लगाते कि क्या छापना या दिखाना चाहिए और क्या नहीं? करीब-करीब समस्त मीडिया संस्थानों में संपादक नाम के व्यक्ति या पद की भूमिका समाप्त हो गयी है। अब संपादक नाम से जो भी व्यक्ति या पद आपको किसी मीडिया संस्थान में दिखाई देते हैं, वे संपादक नहीं, मूल रूप से सेल्स और मार्केटिंग मैनेजर हैं। जो वास्तव में संपादक हैं, वे आज मुख्यधारा के मीडिया से बाहर हैं।

यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। चलते-चलते सबूत के तौर पर केवल उस BBC के भारतीय पोर्टल से 10 सबसे लोकप्रिय पोस्ट की यह तस्वीर पेश कर रहा हूं, जिसे मीडिया की दुनिया में पैमाना माना जाता है। इसके बाद किसी और मीडिया हाउस के वेब प्लेटफ़ॉर्म से उदाहरण पेश करने की ज़रूरत बचती है क्या?


(फेसबुक वॉल से साभार)


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