'लॉन्चिंग के दिन टीवी चैनल ने ऐसा प्रपंच रचा, जिससे पूरी पत्रकारिता शर्मसार हो गई'

Saturday, 08 April, 2017

‘टीआरपी के भूखे कई सारे टीवी संपादकों को पत्रकारिता के मानदंडों से कुछ लेना-देना ही नहीं है’ हिंदी दैनिक नवभारत टाइम्स में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

रेटिंग की रेस में खबर से खिलवाड़

एक मंत्री का सेक्स चैट, जिसमें मादक बातें हो रही हों, किसी टीवी चैनल की लॉन्चिंग के दिन के लिए बड़ा उपयोगी साबित हो सकता है। इस स्टोरी के हिट होने की पक्की गारंटी है, बशर्ते जो ऑडियो क्लिप एयर किया जाए, वह प्रामाणिक हो और दोनों पक्षों की बातें समझ में आ रही हों। लेकिन केरल के एक टीवी चैनल ‘मंगलम टीवी’ ने अपने लॉन्चिंग के दिन के लिए ऐसा प्रपंच रचा, जिससे पूरी पत्रकारिता शर्मसार हो गई।

मलयाली भाषा के इस रीजनल चैनल ने अपने पहले ही न्यूज बुलेटिन में दो ऑडियो क्लिप चलाना शुरू किया, जिसमें एक शख्स कामुक बातें कर रहा था। चैनल का दावा था कि उस क्लिप में आवाज केरल के परिवहन मंत्री ए.के. सशीन्द्रन की है। कथित सेक्स चैट के एयर होते ही केरल की राजनीति में भूचाल आ गया और पिनारायि विजयन सरकार की आलोचना शुरू हो गई।

प्रामाणिकता पर सवाल

कामुक बातों वाली इस ऑडियो क्लिप में सिर्फ मर्द की आवाज सुनाई जा रही थी और बार-बार दावा किया जा रहा था कि मंत्री एके सशीन्द्रन एक महिला से बात कर रहे हैं, जो उनसे किसी शिकायत के सिलसिले में मिली थी। इस क्लिप के एयर होने के कुछ घंटे बाद ही सशीन्द्रन ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

लेकिन सशीन्द्रन के इस्तीफे से बात खत्म नहीं हुई। अब उस ऑडियो क्लिप की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े होने लगे थे, क्योंकि उसको ध्यान से सुनने के बाद लग रहा था कि क्लिप की जबर्दस्त एडिटिंग की गई है। सरकार ने भी आनन-फानन में इस पूरे मामले की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग गठित कर दिया और एसआईटी को भी इस प्रकरण की जांच के आदेश दे दिए। तब तक ऑडियो क्लिप की प्रामाणिकता और मंत्री सशीन्द्रन जिस महिला से बात कर रहे थे, उसकी आवाज नहीं सुनाने को लेकर चैनल की चौतरफा आलोचना भी शुरू हो गई थी। खुद को चारों तरफ से घिरता पाकर चैनल के सीईओ सामने आए। उन्होंने बगैर शर्त माफी मांगी और बताया कि मंत्री एक स्टिंग ऑपरेशन के शिकार हो गए थे। यह भी कि उनके चैनल की एक महिला पत्रकार ने ही मंत्री से बात की थी। मतलब यह कि महिला पत्रकार हनी ट्रैप की टूल बनीं।

सार्वजनिक माफी के बाद भी यह मामला शांत होता नहीं दिख रहा है क्योंकि उन दोनों ऑडियो क्लिप्स ने एक मंत्री के सार्वजनिक जीवन पर दाग लगा दिया, उन्हें मानसिक प्रताड़ना झेलने को मजबूर किया, उनका इस्तीफा हो गया आदि-आदि।

चैनल के माफी मांगने के बावजूद एसआईटी ने उसके सीईओ समेत नौ कर्मचारियों के खिलाफ केस दर्ज कर सीईओ और चार अन्य को गिरफ्तार कर लिया है। जांच चलेगी, संभव है सजा भी हो जाए और चैनल पर केबल एंड टेलिविजन एक्ट के तहत कार्रवाई भी हो, लेकिन पत्रकारिता के पेशे पर इससे जो दाग लगा है, वह आसानी से मिटने वाला नहीं है। केरल की पत्रकार और बौद्धिक बिरादरी इस घटना से सन्न है। लेखकों ने एक बयान जारी कर इसकी निंदा की और पत्रकारों के संगठन ने चैनल के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन किया।

सच कहा जाए तो खबरिया टीवी में जब से नादान संपादकों की फौज आई है, ऐसी घटनाएं ज्यादा होने लगी हैं। पहले जो संपादक होते थे उनको पत्रकारिता की परंपरा के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारी का अहसास भी होता था। आज के ज्यादातर टीवी संपादकों को पत्रकारिता के मानदंडों से कुछ लेना-देना ही नहीं है। उन्हें अपने पेशे की साख को लेकर भी कोई चिंता नहीं। उनकी चिंता सिर्फ यह रहती है कि कुछ भी चलाकर रेटिंग आ जाए। इस दौर में, खासकर हिंदी चैनलों में चंद ही टीवी संपादक बचे हैं, जो इस द्वंद-फंद से दूर रहते हैं। कई संपादकों को तो लगता है कि वे बैठे-बिठाए खबर बना भी सकते हैं।

मंगलम टीवी की घटना खबर बनाने की इसी अतिशय समझदार नादानी का एक शर्मनाक नमूना है। पहले भी खबर बनाने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिसमें कार्रवाई भी हुई। लेकिन सवाल तो वही है कि खबर दिखाने के बजाय बनाने की प्रवृत्ति क्यों/ टीवी में जिस तरह से युवा संपादकों की रट सामने आती है वह अच्छी बात है, लेकिन उनको अनुभव पर भी ध्यान देना चाहिए। मंगलम टीवी जैसी घटना को सिर्फ अनुभवी पत्रकार ही रोक सकता है, या कम से कम इस बारे में दूसरों को सचेत कर सकता है।

भूत-प्रेत, नाच-गाना, मंदिर का रहस्य, पेड़ से टपकती श्रद्धा जैसे विषयों को लेकर न्यूज चैनलों पर जिस तरह से घंटों प्रोग्रामिंग की जाती है, उसमें संपादकों की मौन या मुखर सहमति तो रहती ही है, बाजार का परोक्ष या प्रत्यक्ष दबाव भी रहता है। एक अनुमान के मुताबिक टीवी पर साल भर में करीब तीस हजार करोड़ रुपये के विज्ञापन आते हैं। इन विज्ञापनों का आधार अमूमन टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट (टीआरपी) ही रहता है। अब जब विज्ञापन का आधार ही टीआरपी है तो इसको हासिल करने का दबाव रहेगा ही।

अंधविश्वास का खेल

अनुभवी संपादक इस तरह के दबाव को झेल जाते हैं और रेटिंग हासिल करने का प्रामाणिक रास्ता तलाशते हैं। लेकिन नादान संपादक तुरत-फुरत रेटिंग के चक्कर में गलती कर बैठते हैं, कई बार तो अपने अनुभवी साथियों की सलाह को दरकिनार करके भी। पत्रकारिता की साख ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। जिस तरह से खबरें बनाने की प्रवृत्ति बढ़ी है, उससे पत्रकारिता की साख छीजती है। यह बेहद चिंता की बात है। मंगलम टीवी जैसी घटनाएं आगे न हों, इसके लिए एडिटर्स गिल्ड, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स असोसिएशन और न्यूज ब्राडकास्टर्स असोसिएशन जैसी संस्थाओं को तुरंत कदम उठाने की जरूरत है।

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