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मुकेश कुमार के कीबोर्ड से: नए साल में मीडिया- सरकार और बाजार के चंगुल से निकलने की चुनौती

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डॉ. मुकेश कुमार

वरिष्ठ पत्रकार

mukeshनए साल में मीडिया के समक्ष चुनौतियों पर लिखते हुए मेरे सामने एक दुविधा है और वह ये कि मुझे मीडिया के किस पक्ष के बारे में लिखना चाहिए? उसके कारोबार के बारे में या फिर उन पहलुओं के बारे में जिनका संबंध लोकतंत्र से है, जन सरोकारों से है?

मुझे लगता है कि कारोबारियों को कारोबार के बारे में सोचने के लिए छोड़ देना चाहिए और बतौर पत्रकार मुझे उन चुनौतियों के बारे में ध्यान खींचने का प्रयत्न करना चाहिए, जिनकी वजह से मुख्यधारा का मीडिया आज अपनी साख खो बैठा है। बिना विश्वसनीयता के मीडिया का कोई सार्थक उपयोग नहीं हो सकता, बल्कि वह तो समाज के लिए घातक ही सिद्ध होगा।

मुख्यधारा के मीडिया के सामने सबसे बड़ा संकट ये है कि भले ही वह कितना ही क्यों न देखा-पढ़ा-सुना जाता हो, मगर उसकी विश्सनीयता क्षीण हो चुकी है और विश्वसनीयता क्षीण हुई है इसलिए सम्मान भी बहुत कम बचा है। सोशल मीडिया के प्रसार तथा खुलेपन ने उसके इस कमजोर पहलू को और भी उजागर कर दिया है। वास्तव में जब मीडिया पर नजर रखने वाली तमाम संस्थाएं पंगु साबित हो रही हैं तब सोशल मीडिया मुख्यधारा के मीडिया के लिए वॉच डॉग की तरह काम कर रहा है।

वह उसकी हर चाल पर नजर रखे हुए है और जब तब उसका भांडा फोड़ता रहता है। जाहिर है कि ऐसे पारदर्शी समय में जब आर-पार देखने के यंत्र विकसित हो चुके हों, आप पाप करके छिप नहीं सकते। ये और बात है कि बेशर्मी दिखाते हुए आप उन पापों को ही पुण्य बताकर चलते रहें, जैसा कि बहुत सारे चैनल और अखबार कर भी रहे हैं। लेकिन ऐसा करने से उनकी विश्वसनीयता बचती नहीं, एक पाएदान और नीचे चली जाती है।

मीडिया की विश्वसनीयता के दो प्रमुख शत्रु हैं- बाजार और सरकार। चूंकि मीडिया बड़ी पूंजी का खेल है और विलय एवं अधिग्रहण के खेल ने बड़ी कंपनियों के लिए इसे बेहद आसान बना दिया है इसलिए वह बड़ी आसानी से मीडिया को अपने हित में इस्तेमाल करने में सक्षम साबित हो रही है। उसने पत्रकारों को भ्रष्ट बना दिया है और जिन्हें भ्रष्ट बनना मंजूर नहीं, उन्हें वह सिस्टम से बाहर करती जा रही है।

यह स्वयंसिद्ध है कि बड़ी पूंजी केवल बाजार के बारे में सोचती है। उसे एक ऐसा मीडिया चाहिए जो बाजार का पोषक हो, बाजार के नियंताओं का पोषक हो। उन्हीं की जरूरत के हिसाब से उसने मीडिया को ढाल भी दिया है। मीडिया में स्वामित्व का सवाल इसलिए सबसे महत्वपूर्ण समस्या बनकर उभरा है। उससे कोई नहीं भिड़ना चाहता और आतंकवादी पूंजी को नियंत्रित करने का न तो दम किसी में दिख रहा है और न ही इच्छाशक्ति।

मीडिया की दूसरी दुश्मन यानी सरकार। भले ही ऊपर से यही दिखलाई देता हो कि वह तो प्रसार भारती भर का दुरूपयोग कर रही है, मगर असल में वह कार्पोरेट से साठ गांठ करके निजी मीडिया को भी नियंत्रित एवं संचालित कर रही है। निजी मीडिया का सरकार के प्रति रुख देखकर इसे आसानी से समझा जा सकता है।

ये सरकार और बाजार की ओर से पड़ने वाले दबाव ही हैं कि मीडिया अपनी भूमिका नहीं निभा रहा। वह जन सरोकारों से कट गया है, अपनी जिम्मेदारियों को भूल गया है। वह कभी सांप्रदायिक हो जाता है, कभी दलित विरोधी, कभी अमीरपरस्त। गरीबों और कमजोर आदमी की आवाज वह कभी बनता ही नहीं। यही वजह है कि आज चौथा खंभा बिका हुआ दिखता है। नतीजतन लोकतंत्र की इमारत में भी दरारें दिखने लगी हैं।

कहने को मीडिया के सामने खड़ी चुनौतियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, लेकिन सचाई ये है कि नई समस्याएं या चुनौतियां भी पुराने संकटों का विस्तार हैं, एक्सटेंशन हैं। उन्हें कई खानों में बांटा भी जा सकता है। मसलन, टेक्नालॉजी में नित नए परिवर्तनों से तालमेल बैठाना भी एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते प्रचलन से टीवी और पत्र-पत्रिकाओं के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती तो दिख भी रही है। फिर बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बढ़ते खर्चों की समस्या तो है ही। लेकिन जैसा कि मैंने ऊपर कहा, ये सब पुरानी चुनौतियों की कोख से उत्पन्न होने वाली चुनौतियां हैं।

मीडिया की आत्मा उसकी विश्सनीयता में बसती है। अगर उसने उसे सरकार और बाजार के पास गिरवी रख दिया है तो पहली और आखिरी चुनौती तो उसे मुक्त करवाना ही हो सकती है।

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