‘इस ज्वलंत समस्या की ओर मीडिया का ध्यान कम ही गया’

Wednesday, 12 July, 2017

पी. के. खुराना

वरिष्ठ पत्रकार ।।

ममता, मोदी और गोरखालैंड

असम में बाढ़ है लेकिन राजदीप सरदेसाई जैसे बड़े पत्रकार को भी कहना पड़ रहा है कि मीडिया इस प्राकृतिक आपदा पर खामोश है। हमारा मीडिया किसी एक मुद्दे में इतना खो जाता है मानो देश भर में कहीं और खबर बनने लायक कुछ बचा ही न हो। अमरनाथ में निर्दोष तीर्थयात्रियों पर हमले में 7 तीर्थयात्रियों की जान जाना, सुरक्षा प्रबंध में चूक के कई पहलुओं को उजागर करने वाला हादसा था। इसके हर पहलू पर चर्चा हो रही है। होनी ही चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी किसी घटना की पुनरावृत्ति न हो। थोड़ी बहुत चर्चा इस बात को लेकर भी हे कि विपक्ष ने उपराष्ट्रपति पद के लिए संयुक्त उम्मीदवार बना कर मोदी से पहल छीन ली है। लेकिन एक अन्य ज्वलंत समस्या की ओर मीडिया का ध्यान कम ही गया है।

पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग क्षेत्र में गोरखालैंड की मांग ने जोर पकड़ लिया है। गोरखा समुदाय उबल रहा है और मरने-मारने पर उतारू है। हमारी सेना में गोरखा बटालियन का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है और गोरखालैंड के समर्थक आंदोलनकारी यह भी कहते हैं कि वे आतंकवादी नहीं हैं, वे आतंकवादियों को मारते रहे हैं। इससे उनका आशय यह है कि सरकार को उनकी मांगों की उपेक्षा करने के बजाए उनकी बात सुननी चाहिए।

राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आरोप लगा रही हैं कि इस आंदोलन को विदेशों से शह मिल रही है और केंद्र की भाजपा सरकार समस्या के समाधान के लिए उनसे सहयोग नहीं कर रही है। ममता बनर्जी की इस बात में दम है कि केंद्र सरकार उनसे सहयोग नहीं कर रही है। ममता बनर्जी दबंग राजनीतिज्ञ हैं और वे किसी से दबना नहीं जानतीं। मोदी और शाह की जोड़ी उन्हें भाजपा खेमे में ला पाने में कामयाब नहीं हो पाई इसलिए ममता को दबाने के लिए मोदी एक दूसरी ही रणनीति पर काम कर रहे हैं। जिन राज्यों में गैर भाजपा सरकारें हैं वहां मोदी ऐसी हर चाल चल रहे हैं जिससे राज्य सरकार को बदनाम किया जा सके, तोड़ा जा सके या कमजोर किया जा सके। राष्ट्रपति चुनाव, उपराष्ट्रपति चुनाव और सन् 2019 की तैयारी इस रणनीति के मूल में है।

यह ध्यान देने योग्क्य बात हे कि मोदी क्रूर प्रतियोगी हैं और वे विपक्ष को हराने में नहीं, बल्कि विपक्ष का सर्वनाश करने में विश्वास रखते हैं। वे विरोधियों को जड़ से मिटाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। गोरखालैंड की समस्या का हल न होने के पीछे एक कारण यह भी है। नरेंद्र मोदी कई मोर्चों पर एक साथ काम कर रहे हैं। एक तरफ वे सीमा पर आतंकवाद से जूझ रहे हैं तो दूसरी तरफ चीन की चुनौती उनकी पेशानी की लकीरें गहरा रही है। पाकिस्तान और चीन की संयुक्त चुनौती के समाधान के रूप में वे विश्व भर में भारत के  प्रति समर्थन को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन देश के अंदर विपक्ष को नेस्तनाबूद करने की उनकी रणनीति का खामियाजा विपक्ष द्वारा शासित राज्यों को भुगतना पड़ रहा है। वीरभद्र सिंह और लालू परिवार को घोटालों में घेर कर, अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के उपराज्यपाल के माध्यम से शक्तिहीन बनाकर, राहुल गांधी के विरुद्ध सोशल मीडिया पर तरह-तरह के चुटकुले चलवा कर तथा अपने ही दल के अंदर लालकृष्ण आडवाणी को बार-बार उनकी औकात बताकर वे स्पष्ट कर चुके हैं कि उनके मन में क्या है।

मोदी और शाह की रणनीति में कोई राज्य छोटा नहीं है और वे किसी राजनीतिक लाभ के मामले में किसी क्षेत्र की उपेक्षा नहीं करते। गोरखालैंड को लेकर पिछले तीस-बत्तीस साल से आंदोलन चल रहा है। सन् 1984 में सुभाष घीसिंग ने गोरखा नैशनल लिबरेशन फ्रंट का गठन किया। शुरू में तो केंद्र सरकार उन्हें एक अकेला व्यक्ति मानकर उपेक्षित करती रही पर जैसे जैसे समय बीतता गया, उनके साथ लोग जुड़ते गए और अंतत: एक आंशिक स्वायत्त का गठन किया गया। गोरखा समुदाय अपनी अलग पहचान चाहता है और ममता बनर्जी द्वारा राज्य के स्कूलों में बंगाली को अनिवार्य भाषा बनाने के उनके निर्णय ने आंदोलन को तूल पकड़ने का एक और मौका दे दिया। मोदी की समस्या यह है कि वे बंगाल में भाजपा का विस्तार चाहते हैं और अपने बंगाली समर्थकों को नाराज नहीं करना चाहते, दूसरी तरफ वे राज्य पर ममता की पकड़ कमजोर करने के लिए राज्य का विभाजन भी चाहते हैं, इसलिए संघ के अनुषंणी संगठन धार्मिक ध्रुवीकरण का सहारा ले रहे हैं। संतोष की बात है कि क्षेत्रीय मीडिया ने इस मामले में अत्यधिक संयम दिखाया है और जहां अखबारों ने पूरे-पूरे पृष्ठ में दोनों समुदायों के पारस्परिक रिश्तों का हवाला देकर उन्हें मजबूत करने का प्रयास किया है, वहीं टीवी ने भी इस प्रयास को बढ़ावा दिया है।

भाजपा की दूसरी समस्या यह है कि दार्जिलिंग जिला एक स्वतंत्र राज्य की दृष्टि से बहुत छोटा क्षेत्र है। लगभग 12 लाख की आबादी वाले कुल 3150 वर्ग किलो मीटर के इस क्षेत्र में तीन विधानसभा सीटें हैं और यह एक लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा मात्र है। न्यायमूर्ति श्यामलाल सेन आयोग ने भी गोरखा समुदाय की उस मांग को जायज नहीं माना जिसमें उन्होंने क्षेत्र के विस्तार की मांग की थी। ऐसे में राज्य का विभाजन न तर्कसंगत है न व्यावहारिक। दार्जिलिंग से भाजपा सांसद और बंगाल प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष छोटे राज्य का समर्थन करने का हुंकारा तो भरते हैं लेकिन वे स्पष्ट रूप से गोरखालैंड का समर्थन नहीं कर रहे हैं। केंद्र सरकार इस मुद्दे को सुलगने दे रही है क्योंकि वह अंतत: ममता बनर्जी को कमजोर करना चाहती है। समस्या यह है कि केंद्र और राज्य सरकार की राजनीतिक लड़ाई के कारण इस क्षेत्र में चीन की घुसपैठ का खतरा बढ़ गया है और यदि ऐसा हो गया तो यह देश का दुर्भाग्य होगा।

पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश आदि राज्य मोदी के निशाने पर हैं। पंजाब इसलिए बचा हुआ है क्योंकि यहां कांग्रेस सरकार अभी बनी ही है और राज्य में भाजपा का कोई बड़ा वजूद नहीं है। दार्जिलिंग में आंदोलन का परिणाम सिक्किम को भुगतना पड़ रहा है जो लगभग अघोषित आर्थिक नाकेबंदी के से हालात का शिकार है। यह स्पष्ट है कि अलग राज्य की मांग पर राज्य सरकार निर्णय नहीं ले सकती और केंद्र सरकार इस मुद्दे को सुलझाने के लिए संबंधित पक्षों से बातचीत की कोई पहल तक नहीं कर रही है।

मोदी और शाह की जोड़ी को पूरा अधिकार है कि वे भाजपा के विस्तार का प्रयास करें या इसके लिए वे संघ के कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज का सहारा लें, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अपनी इस मंशा की पूर्ति के लिए वे धार्मिक ध्रुवीकरण का सहारा लें या किसी आंदोलन को हिंसक हो जाने दें ताकि वे विपक्ष को कमजोर कर सकें। यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है कि ऐसी नौबत न आये कि ममता, मोदी और गोरखालैंड की इस उलझन में दार्जिलिंग कश्मीर बन जाए।   


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