'मदर्स डे के दिन जो ऊर्जा मिलती है, वे पत्रकारिता की महत्वकांक्षा, हूक मिटा देती है...'

Sunday, 13 May, 2018

राजलक्ष्मी त्रिपाठी

फ्रीलांस जर्नलिस्ट।।

मां बच्चे का प्यार बड़ा अनूठा होता है। एक बार बच्चे को जन्म देने के बाद मां को बच्चे के साथ समय गुजारना उसके बचपने के रंग में खुद भी रंग जाना सबसे अच्छा लगता है। बच्चे के आगे मां का करियर सेकेंडरी हो जाता है। मां बच्चे के प्यार की बॉन्डिंग को और मजबूत बनाने और बच्चे द्वारा अपनी मां के प्रति प्यार को दर्शाने का एक खूबसूत दिन 'मदर्स डे' है।

पूरे समय मां अपने बच्चे की देखभाल करती है उसकी छोटी बड़ी जरूरतों को पूरा करती हैवह उसकी देखभाल में पूरी तरह से थक जाती हैलेकिन जब 'मदर्स डे' के दिन बच्चा अपने छोटे छोटे हाथों से अपनी मां को कार्ड बना के देता हैया फिर बड़े होने पर 'मदर्स डे' के दिन उसे स्पेशल ट्रीटमेंट देता हैतो मां की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। उसकी सारी थकान, सारा तनाव छूमंतर हो जाता हैपूरे साल के लिए वो ऊर्जा से भर जाती है। उस समय उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसने अपने करियर को छोड़कर बच्चे की परविरिश को प्राथमिकता देकर कोई गलती नहीं की है।

मीडिया में काम करने वाली औरतें चाहे वो प्रिंट मीडिया से जुड़ी हों या फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से, बच्चा हो जाने के बाद कुछ सालों तक उनके करियर की गाड़ी ठप्प हो जाती है। इसका कारण टाइड शैड्यूल और डेडलाइन में काम करना होता है। औरतें चाहे हाउस मेकर हों या फिर कामकाजी, घर को संभालने की पूरी जिम्मेदारी उनकी ही रहती है। बच्चा हो जाने के बाद उन्हें अपने पति और परिवार के लोगों का सहयोग भले ही मिल जायेलेकिन अपने बच्चे के परवरिश की अधिकांश जिम्मेदारी उन्हीं की होती हैयही वजह है कि मीडिया जगत से जुड़ी महिलाएं विवाह के बाद बच्चा हो जाने पर कुछ सालों के लिए पूरी इंडस्ट्री से विलुप्त सी हो जाती हैं। मैं भी मीडिया जगत से जुड़ी थी, विवाह से पहले मैने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया। मैं कई सालों से हिंदी के प्रतिष्ठित अखबार अमर उजाला से जुड़ी रहीं और कई अहम जिम्मेदारियों का निर्वहन किया।

विवाह होने के बाद भी कई सालों तक वहां पर काम किया। लेकिन दो-दो बार मिसकैरेज हो जाने के चलते मैंने अपनी नौकरी को अलविदा कह दिया। मैंने साल 2009 में नौकरी छोड़ी और साल 2010 में अपने पहले बच्चे को जन्म दिया। उसके लालन-पालन में मैं पूरी तरह से व्यस्त हो गई। नौकरी छोड़ी है ऐसा सोचकर मैंने दूसरे बच्चे की प्लानिंग भी कर ली, साल 2011 में मैंने अपनी दूसरी संतान को जन्म दिया। दोनों बच्चों की परवरिश में मैं पूरे पांच साल तक अपने काम से एकदम दूर रही। बड़े बच्चे के पांच साल के और दूसरे बच्चे के तीन साल के हो जाने के बाद मैंने दुबारा से अपना करियर की शुरुआत करने का मन बनाया और एक पब्लिकेशन हाउस से जुड़ गयी। साथ ही अपने मित्रों के सहयोग से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन का काम भी शुरू कर दिया।

जब मैंने ऑफिस जाना शुरू किया उस समय मेरे बच्चों ने स्कूल जाना शुरू कर दिया था। बेटा केजी में था और बिटिया प्री नर्सरी में, पहली बार मैंने उनके लिए स्कूल वैन लगायी। समाचार पत्रों में बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं के बारे में पढ़-पढ़कर मैं अपने बच्चों के प्रति हमेशा आशंकित रहती थी। हालांकि बच्चे घर में अपनी दादी मां के साथ रहते थेलेकिन मुझे संतुष्टि नहीं रहती थी, दिन में ऑफिस से कई कई बार घर पर फोन करती। शाम को जब मैं सात-आठ बजे घर आती तो अपने बच्चों के उदास चेहरों को देखकर बहुत ग्लानि होती। मुझे देखते ही दोनों मुझसे चिपक जाते, देर तक मुझे छोड़ते नहीं थे। मैंने उस संस्थान में साल भर काम किया लेकिन वहां काम करते हुए मैं अपने बच्चों को लेकर हमेशा परेशान रहती। मेरे मन में हमेशा यही बात गूंजती रहती थी कि क्या मैं बच्चों के प्रति अपने जिम्मेदारियों की अवहेलना कर रही हूं और मेरे मन से अकसर यही जवाब मिलता, 'हां'। फिर क्या था, इसी उधेड़ बुन में एक दिन मैंने अपना इस्तीफा देकर अपनी नौकरी को एक बार दुबारा से अलविदा कह दिया।

अब मैं अपने बच्चों के साथ घर पर रहकर ही काम करती हूं, विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में लेख लिखती हूं और अनुवाद का काम करती हूं। कभी-कभी अपने सहयोगियों को आगे बढ़ते देखकर मन में हूक सी तो उठती हैलेकिन अपने बच्चों को देखकर यह हूक खुदबखुद दूर हो जाती है। मेरे बच्चे थोड़े और बड़े हो जायेंतो एक बार दुबारा से मैं अपने करियर की शुरुआत करुंगी, खुद को यही कह कर आश्वासन देती हूं।

नौकरी करने का आश्य पैसा कमाना नहीं है, बात पैसों की नहीं होती है, बात होती है आत्मसंतुष्टि की, उसके लिए मैं अखबारों और पत्रिकाओं के फीचर पेज के लिए लेख लिखती रहती हूं. इससे मुझे यह संतुष्टि मिलती है कि मैं पूरी तरह से अपने काम से दूर नहीं हूं। हर हफ्ते मेरी बाइलाइन अखबारों और पत्रिकाों में छपती तो है, बच्चों की अच्छी परवरिश के साथ यह कुछ कम भी नहीं है।

 

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