अनजाने में ऑनलाइन गुलामी की तरफ बढ़ रहा भारत, बोले वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास

Friday, 12 May, 2017

भारत अनजाने उस ऑनलाइन गुलामी की तरफ बढ़ रहा है जिसमें खरीदपरोख्त, व्यापार के लिए बाहरी कंपनियों पर निर्भर होंगेहिंदी दैनिक अखबार नया इंडियामें छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हरिशंकर व्यास का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

21वीं सदी व आनलाइन गुलामी!

क्या आपने अमेजॉन.कॉम का नाम सुना है? निश्चित ही सुना होगा। पर यह नहीं जाना हुआ होगा कि अमेरिका की इस ऑनलाइन खरीदफरोख्त कंपनी को चीनियों ने रुलाया। वहा देशी अलीबाबा ने अमेजॉन के ऐसे बाजे बजाएं कि साढ़े तीन साल पहले इस कंपनी ने भारत पहुंच कर संकल्प धरा कि अब सवा सौ अरब आबादी को हम अपना ग्राहक बनाएगें।

भारत के खुले चरागाह को ऐसा चरेंगे कि दुनिया में नंबर एक ब्रैंड अपने आप बने रहेंगे। जान लिया जाए कि इसने आते ही, साढ़े तीन साल में भारत में सालों पुरानी, अरबों रु. के निवेश की ऑनलाइन कंपनियों की सांस फूला दी है। फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, मिंत्रा, जबॉन्ग जैसी भारतीय कंपनियों के ग्राहको को अमेजॉन ने इस कदर तोड़ा है कि तीन साल में बहस बन गई कि वह नंबर एक है या फ्लिपकार्ट! तीन साल में सवा सौ करोड़ लोगों के बाजार में अमेरिकी कंपनी अमेजॉन का दबदबा डोनाल्ड ट्रंप के सामने इस हकीकत को रखने का तर्क होना चाहिए कि यदि वे भारत की आईटी कंपनियों का जीना हराम कर रहे है, भारत के आईटी कर्मियों के पेट पर लात मार रहे है, उनके वीजा घटा रहे है तो हम अमेजॉन, गूगल, फेसबुक, टिवटर को काम नहीं करने देंगे!

मैं फिर बता दूं कि मैं भूमंडलीकरण का, खुले व्यापार का घोर समर्थक हूं। अमेरिका के साथ साझेदारी, उसके हाथ रखने का मतलब समझता हूं मगर मैं यह भी सोचता हूं कि ऐसा क्यों करते हो कि हम उसके लिए पैदल सेना बने, बाजार बने, खुली चरागाह बने। याकि एकतरफा रिश्ता हो। भारत को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, जापान, यूरोपीय संघ आदि के साथ ही अनिवार्यतः एलायंस बनाना है तो इसमें हमारी ताकत, हमारी श्रमशक्ति, हमारे आईटी कर्मियों को उन्हे खुली छूट देनी होगी। हम उन्हें अपनाए, वे हमें अपनाए। पर यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो हम जैसे को तैसे की नीति क्या नहीं अपनाए?

अपना मानना है कि ऐसा संभव है। इन देशों को समझाया जा सकता है मगर पहले हम तो समझें। हम कुलीगिरी की मनोदशा से बाहर तो निकले। हमारे नेता, नियंता आंख से आंख मिला कर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर आदि से बात करें। आज विचारने की जरूरत इसलिए है क्योंकि अमेरिका जब भूमंडलीकरण, खुले व्यापार, श्रमशक्ती की आवाजाही को छोड़कर देश के भीतर धंधे और रोजगार की जिद्द में फैसले ले रहा है तो हमें प्रतिवाद तो करना होगा।

ताली दो हाथ से बजती है। अमेजॉन, गूगल, फेसबुक, ट्विटर भारत को खुला चरागाह मान कर कमाई करें, सवा सौ करोड़ लोगों के डाटा का खजाना बनाए और भारतीयों को अमेरिका में प्रवेश न मिले, वे सिर्फ इन कंपनियों में कुलिगिरी, सेवादारी करते रहे तो उसका नतीजा 21वीं सदी में भारत का अघोषित गुलाम बनना होगा। हमने इस सीमा तक छूट दी हुई है कि फेसबुक, गूगल, अमेजॉन.कॉम आदि भारत में कमाई जैसे भी हो कर सकते है। एक तरफ ये भारत के व्यापारी को डुबाते हुए, आईटी कंपनियों के एप को फेल कर अपनी मोनोपोली बना रहे है तो उधर अमेरिका में भारत की कंपनियों को धमकाया जाए कि तुम लोगों ने एच-1 बी वीजा का दुरुपयोग किया है, जांच करेंगे! क्या ऐसा होने देना चाहिए? तब अंत नतीजा क्या होगा?

हां, जान ली जाए दिशा कि भारत अनजाने उस ऑनलाइन गुलामी की तरफ बढ़ रहा है जिसमें खरीदपरोख्त, व्यापार के लिए बाहरी कंपनियों पर निर्भर होंगे तो पढ़ने-लिखने के औजारों, समाज के सामाजिक रिश्तों, संस्कृति की समझ-शिक्षा-दीक्षा के लिए, जीवन दिनचर्या में भी अमेरिका में रखे सर्वरों से हम नियंत्रित, गाइड हुए होंगे। भारत में सोशल मीडिया के मूर्ख हिंदू लंगूर ट्विटर, फेसबुक, वाट्सऐप में जय हो या गालियां दे कर विश्वगुरु बनने की जिस मूर्खता में जी रहे है उन्हें समझ ही नहीं है कि अभी जो हो रहा है वह खैबर पार से इस्लामी हमलावरों की कूच के इतिहास से कम खतरनाक नहीं है।

इन्हें समझना चाहिए, सोचना चाहिए कि दुनिया की बाकि सभ्यताओं, संस्कृतियों ने कैसे सावधानी बरती? अमेरिका में ईसाई याकि पश्चिमी सभ्यता और उसके प्रतिनिधी डोनाल्ड ट्रंप पाबंदिया लगा रहे है, अमेरिका को खांटी श्वेत अमेरिकीयों के लिए बना रहे हैं तो इसके पीछे जो समझ, चिंता है उसे हमें भी समझते हुए अपने आपको बचाने की क्या रीति-नीति नहीं बनानी चाहिए? चीन ने न अमेजॉन के पांव जमने दिए और न गूगल, फेसबुक, ट्विटर का वहा दबदबा बनने दिया और खुद अपना सबकुछ बनाया तो क्या यह हमारे लिए, सोशल मीडिया के अपने हिंदू लंगूरो के लिए विचारणीय नहीं होना चाहिए?

बहरहाल, मैं भटक रहा हूं। पते की बात है कि आईटी की विश्व शक्ति की गलतफहमी के बीच हमारे स्टार्टअप तिनकों की तरह उखड़ रहे हैं। याद करें, सोचे कि भारत में खरीद-बिक्री के देशी स्टार्टअप कैसे तूफान की तरह आए और उसी रफ्तार से पैसा डुबोकर डुबे। आज अमेरिका की अमेजॉन.कॉम की एकछत्रता ऐसे बन रही है मानों भारत के व्यापारियों, बनियों को, आईटीकर्मियों को धंधा करना नहीं आता हो। तीन सालों में भारतीय चूरन, हींग, साबुन, अंडे भी अमेजनॉ.कॉम से खरीद रहे हैं तो होटल, एयरटिकट बुकिंग भी अमेरिकी कंपनियों के ऐप से होने लगी है। इसलिए कि अमेरिकी कंपनियों के पीछे अमेरिकी सरकार का दम होता है। उनके पास लीडरशीप है, खरबों डॉलर की गहरी जेब है जबकि ठीक विपरित भारत सरकार याकि भारत राष्ट्र-राज्य बेसुधी में है। उसकी स्टार्टअप योजना आंकडा बनाने की, नारे की महज एक कवायद है। अपने को न समझ है और न अनुभव है पर आईटी के अपने परिचित जो छोटे-मोटे काम, ऐप बनाकर धंधे करने के प्रोजेक्ट बनाए हुए है उन सबका दो टूक कहना है कि सरकार से स्टार्टअप का दर्जा लेना, सुविधा लेना भी चक्कर काटना है!

इसलिए अपने आईटी कुलियों की अमेरिका पर, विदेशी कंपनियों पर निर्भरता, उनके लिए वर्तमान है तो भविष्य भी है। अरबों रु. के निवेश और दस-दस साल की मेहनत के बाद भी यदि अमेजॉन.कॉम भारत आ कर तीन साल में स्थापित कंपनियों की नींद हराम कर सकती है, सबके लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर सकती है तो गूगल, फेसबुक, ट्विटर आदि ने मोनोपोली बना कर भारत की डाटा खान को जैसे अपना बनाया है उस पर सोचते हुए गहराई में जाएंगे तो एक ही निष्कर्ष होगा कि अमेरिका के सर्वरों में जमा अपने जीवन की सच्चाईयों, गतिविधियों, कारोबार, बौद्धिक विमर्श, समझ सबसे तो हम बंधुआ, गुलाम कई मायनों में हो ही गए हैं। इन सर्वरों से झूठ परोसा जाए तब भी हम उसे सत्य मानेंगे। इनसे वेलेंटाइन डे का प्रेम उड़ेला जाए तो वह राष्ट्रीय उत्सव होगा और इनसे गौमांस की पौष्टिकता का ज्ञान मिले तो वह सही वचन!

फिर जान लें मैं अभिव्यक्ति की आजादी, विचारों की विविधता, भूमंडलीकरण सबका घोर समर्थक हूं। इसके लिए लड़ने की हद तक की जिद्द है बावजूद इसके यह भी मानता हूं कि कौम, सभ्यता और राष्ट्र-राज्य का तकाजा आजादी और सम्मान से जीना है। नियंत्रण या किसी की मोनोपॉली या किसी की दादागिरी से नहीं। फिर भले वह डोनाल्ड ट्रंप की हो या पैसे की ताकत पर एकाधिकार बनाने वाली अमेरिकी कंपनिया की।

इस बात पर गंभीरता से विचारे कि तलवार, तोप और कलम सबको अब ऑनलाइन पर साम्राज्य बनाने वाली अमेरिकी कंपनियों ने खा लिया है। तभी इनकी चिंता में ब्रिटेन की संसद है तो वहां के अखबार भी है। तब हम क्यों न सोचे? फिर हमारा संदर्भ तो भारत की आईटी कंपनियों पर ट्रंप के डंडे से पुख्ता है तो जायज भी।

(साभार: नया इंडिया)


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