फिल्म ‘पद्मावती’ पर चली वरिष्ठ पत्रकार वैदिक की कलम...

Tuesday, 14 November, 2017

वेद प्रताप वैदिक

वरिष्ठ पत्रकार ।।

फिल्म पद्मावती के खिलाफ देश में कई स्थानों पर प्रदर्शन हो रहे हैं और जमकर बयानबाजी चल रही है। संजय लीला भंसाली बहुत भाग्यवान हैं कि उनकी फिल्म दिखाए जाने के पहले ही सारे टीवी चैनलों और अखबारों के मुखपृष्ठों पर वह दिखाई पड़ रही है। वे 100 करोड़ रु. भी खर्च करते तो उन्हें इतना प्रचार नहीं मिलता लेकिन असली सवाल यह है कि इस फिल्म में आपत्तिजनक क्या है

कुछ राजपूत संगठन इस पर आपत्ति कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में पद्मिनी या पद्मावती जैसी वीरांगना को आप जातिवादी क्यारी में कैद कर रहे हैं? याने सिर्फ देश के राजपूत ही उन पर गर्व करने का अधिकार रखते हैं, बाकी करोड़ों भारतीयों की बला से! पद्मावती का अपमान होता है तो होता रहे। 

यह हम अच्छी तरह समझ लें कि पद्मावती का अपमान हर भारतीय का अपमान है। यदि कुछ लोग इस अपमान को होने से रोकें तो यह अच्छी बात है लेकिन उन्हें कैसे पता कि उस फिल्म में कुछ अपमानजनक दृश्य हैं? जो लोग ऐसे आरोप लगा रहे हैं, क्या उन्होंने वह फिल्म देखी है? फिल्म को देखे बिना हवा में लट्ठ चलाना कहां तक ठीक है? अभी तो फिल्म रिलीज ही नहीं हुई है। यही बात पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने और अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी पूछ ली है। 

उनका मुख्य तर्क यह है कि अभी तक यह फिल्म सेंसर बोर्ड के सामने तक नहीं गई है और मानो कि सेंसर बोर्ड इसे पास कर दे, उसके बाद सेंसर का अपीलीय बोर्ड भी होता है। यदि फिर भी किसी को आपत्ति हो तो वह वहां तक जा सकता है। इस वक्त अदालतों के दरवाजे खटखटाना कोरा प्रचारप्रेमी होना है। बिल्कुल यही हाल पीकेफिल्म का हुआ था। सारे देश में सिनेमाघरों की तोड़-फोड़ करने वाले संगठनों के मुखियाओं ने वह फिल्म देखी तक नहीं थी। वह फिल्म मैंने देखी। फिर एक लेख लिखा और पीके को मैंने पाखंड खंडिनी (पीके) कहा। सारा मामला एक ही दिन में ठंडा पड़ गया।

यही हाल अब भी होना है। इस फिल्म पर बिना देखे ही तीन मुख्य आपत्तियां की जा रही हैं। एक तो पद्मावती ने झूमर नृत्य किया है, वैसा महारानियां नहीं करती हैं। ऐसा कहने वालों ने किस अन्य महारानी का नृत्य देखा है? और फिर यह फिल्म है और यह 14वीं नहीं, 21वीं सदी है, वे यह न भूलें। दूसरी आपत्ति एक याचिका में यह थी कि इस फिल्म से सती-प्रथा का मंडन होता है। उस आदमी से कोई पूछे कि महाभारत की कथा देखकर क्या वह यह कहेगा कि वह जुए का समर्थन और महारानी (द्रौपदी) को निर्वसन करने का समर्थन करती है? तीसरी आपत्ति यह है कि पद्मावती को अलाउद्दीन खिलजी (पश्तो भाषा में खिलजी नहीं, इसका शुद्ध उच्चारण गिलज़ई है) के स्वप्न लेते हुए दिखाया गया है। यह मनगढ़ंत आरोप हैं, ऐसा फिल्मवालों का कहना है। 

कहीं ऐसा तो नहीं कि पद्मावती अलाउद्दीन के सपनों में आती रही हो और हमारे दोस्तों ने अपने सपने में वह दृश्य उल्टा देख लिया हो?

(साभार: नया इंडिया)

 

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