ankara escort porno sex izle porno izle sex izle पीएम मोदी के व्यक्तित्व को लेकर रहस्य बना रहता है, जिज्ञासा बनी रहती है: जयदीप कर्णिक, संपादक, वेबदुनिया

पीएम मोदी के व्यक्तित्व को लेकर रहस्य बना रहता है, जिज्ञासा बनी रहती है: जयदीप कर्णिक, संपादक, वेबदुनिया

Saturday, 17 September, 2016

जयदीप कर्णिक

संपादक, वेबदुनिया ।।

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने आज अपने जीवन के 66 साल पूरे कर लिए हैं। 2014 के महाजनादेश पर सवार होकर जबसे उन्होंने देश की बागडोर संभाली है, उनको और उनके व्यक्तित्व को लेकर जिज्ञासा भी बढ़ी है और जानकारी भी। ये भी सही है कि जितनी जिज्ञासा है उतनी जानकारी नहीं बढ़ी। बावजूद इसके कि उनके प्रधानमंत्री बनने के एक साल के भीतर ही 60 से अधिक छोटी-बड़ी किताबें उनको लेकर लिखी जा चुकी हैं। फिर भी ऐसा क्यों है कि उनको लेकर, उनके व्यक्तित्व को लेकर एक अजीब-सा रहस्य और जानने की जिज्ञासा बनी रहती है? मुख्य कारण है उनका अपना संवाद, जिसे उन्होंने बहुत बारीकी से और करीने से निर्धारित किया है। कब, कहां, किससे कितना संवाद करना है इसको लेकर वो बहुत ही सावधान रहे हैं, ख़ास तौर पर पिछले 4 सालों में।

इसीलिए आज जब उनके जन्मदिवस पर समाचार4मीडिया ने उनकी संवाद कला पर कुछ लिखने को कहा तो ये बहुत मौजूं ही लगा। इस पूरी बात को कुछ बिन्दुओं के आधार पर समझने की कोशिश करते हैं–

प्रधानमंत्री बनने के पहले -

एक संघ कार्यकर्ता के रूप में तो मोदी जी ज्यादातर परदे के पीछे के कलाकार ही रहे हैं। उन्होंने आयोजनों और रैलियों में ख़ूब मेहनत की, प्रबंधन देखा पर संवाद बहुत हद तक कार्यकर्ताओं और नेताओं तक सीमित रखा। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में और उसकी तैयारी में जरूर वो ख़ूब मुखर हुए। लेकिन फिर 2002 से लेकर 2012 तक एक तरह से गोधरा और मोदी एक दूसरे के पर्याय बन गए थे। वो बहुत चाह कर भी इससे अपना पीछा नहीं छुड़ा पाए। यहां तक कि 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने उन्हें इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द घेरा। पर 2012 की गुजरात विजय के साथ ही वो दिल्ली पर भी नज़र गड़ा चुके थे। अपने पुराने अनुभवों से सीख लेते हुए उन्होंने अपने संवाद के जरिए अपनी छवि पर जमकर काम किया। वो केवल गुजरात के बाहर चुनिंदा मंचों पर हिन्दी बोलते थे। लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने लगातार अधिकांश भाषण हिन्दी में दिए। लगातार युवाओं से संवाद बनाया। उन्हें पता था कि दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचाने में इन्हीं युवाओं की बड़ी भूमिका रहेगी। अलग-अलग शहरों में कॉलेज के छात्रों को सतत संबोधित किया। दूसरा वर्ग उन्होंने चुना हर शहर के बुद्धिजीवियों का। तीसरा उन्होंने बात की ब्लॉगरों से और सोशल मीडिया पर सक्रिय लेखकों से। उन्हें पता था कि ये लोग समाज में विचार कायम करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

पूरा कैम्पेन उन्होंने अपने हिसाब से चलाया। टेलीविजन और अखबार के लिए साक्षात्कार भी अपनी सहूलियत से ही दिए। रैलियों में अपने भाषणों में ख़ूब गरजे पर सवाल-जवाब वाले फ़ॉर्मेट से दूर ही रहे। एकदम आख़िर में जाकर पहले एएनआई और फिर दूरदर्शन सहित कुछ चैनलों को साक्षात्कार दिए, पर अपनी शर्तों पर और अपने हिसाब से ही।

प्रधानमंत्री बनने के बाद-

सब लोग ये उम्मीद कर रहे थे कि चुनाव को लेकर मोदीजी बहुत संभले हुए थे, सतर्क थे पर अब महाविजय के बाद वो एकदम खुल जाएंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। वो और अधिक सावधान हो गए। उन्होंने अपनी बात राजनीतिक और औपचारिक मंचों से ही जारी रखी। पत्रकारों से वो मिले ही नहीं ऐसा नहीं है। वो चुने हुए संपादकों, पत्रकारों और भाजपा कवर करने वाले संवाददाताओं से समय-समय पर मिलते रहे हैं। उन्हें भोजन पर बुलाकर, निजी अनौपचारिक बातचीत के लिए। पर उनका सार्वजनिक संवाद वैसा ही बना रहा अपनी पसंद, अपने तरीके से। उन्होंने रेडियो का अभिनव प्रयोग किया। मन की बात ने शुरुआत में तो इतना ध्यान खींचा कि बाकी सबकी टीआरपी फेल!

वो ट्‍विटर पर भी लगातार सक्रिय रहते हैं। उनकी पूरी टीम और पीएमओ उनके इस संवाद को लेकर ख़ासा सतर्क और सजग रहता है। उनके ट्वीट बहस और चर्चा का विषय बनते रहते हैं। वो इस माध्यम का उपयोग करना बखूबी जानते हैं। पर यहां भी मंच उनका चुना हुआ है और सुविधा भी उनकी है। वो संसद में दिए अपने भाषणों का इस्तेमाल भी जनसंवाद के एक बेहतरीन मौके के रूप में करते हैं। इसीलिए वो केवल सदन को नहीं, पूरे देश को वहां से संबोधित करते हैं। उन्होंने कुल जमा दो निजी टेलिविजन चैनलों को साक्षात्कार दिए। उनमें भी उनके चुने हुए संवाद का दबाव साफ़ दिखाई दे रहा था। विदेशी चैनल को दिए साक्षात्कार को भी उन्होंने अपनी अमेरिका यात्रा को मजबूत करने के लिए ही उपयोग किया।

प्रतीकों के ज़रिए संवाद –

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी केवल भाषणों से, सोशल मीडिया से या साक्षात्कार के जरिए ही संवाद नहीं कायम करते, वो अपनी भाव-भंगिमा और उन प्रतीकों से भी संवाद करते हैं जिनको वो छूते हैं। जैसे शपथ के पहले गांधी जी की समाधि पर जाना, सार्क देशों के प्रमुखों को बुलाना, संसद की देहरी पर माथा टेकना, सरदार पटेल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लेकर सक्रिय हो जाना, झाडू लेकर सड़क बुहारना, सैनिकों के बीच त्योहार मनाना आदि ऐसे अहम प्रतीक हैं जिन्हें छूते हुए उन्होंने अपने तरीके से संवाद किया है, संदेश दिया है। ऐसे ही विदेश यात्राओं में एक रॉक स्टार के रूप में प्रस्तुति और ओजस्वी भाषण उनके संवाद की खास अदा है।

कुल मिलाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संवाद की, ख़ुद को अभिव्यक्त करने की एक अनोखी शैली विकसित की है। जितना, जहां, जिससे बोलना है, बोलते हैं। रहस्य बना रहता है, जिज्ञासा बनी रहती है। उनकी बात सब तक पहुंच जाए इसका ध्यान रखते हैं, सबकी बात उन तक पहुंच रही है या नहीं ये उनके ऊपर है। उन आवाजों और सवालों में से चुनकर अपने हिसाब से जवाब देते हैं। कुल मिलाकर वो सीधे आमने-सामने के सवालों के घेरे से ख़ुद को बचा लेने में सफल रहे हैं। हों भी क्यों ना...  उनके पास ये सुविधा भी है और सहूलियत भी।

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