मेरी समझ से पीएम मोदी ने अपना काफी नुकसान कर लिया है: कमल मोरारका, समाजशास्त्री

Friday, 06 October, 2017

कमल मोरारका

समाजशास्त्री ।।

भारतीय अर्थव्यवस्था: अमेरिकी फॉर्मूले से यहां कुछ हासिल नहीं होगा

ये तो अब जाहिर है कि अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर से गुजर रही है। आंकड़े और अर्थशास्त्री कुछ भी बोलते रहें, कई बातें सर्वविदित हैं। नंबर एक, महंगाई कम हुई है, लेकिन पेट्रोल के दाम सरकार बराबर बढ़ाती जा रही है। नौकरियां उपलब्ध नहीं हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं, मैं चाहता हूं कि लोग नौकरियां मांगें नहीं, नौकरियां दें। ये सब जुमले तो अच्छे लगते हैं, लेकिन नौकरियां देने का मतलब वो खुद इकाइयां खोलें, जिसमें लोगों को वो नौकरी पर रखें। इसका मतलब उनको बैंकों या दूसरी संस्थाओं से ऋण लेना पड़ेगा और आज कोई ऋण लेता नहीं है, क्योंकि ऋण की दर 14 पर्सेंट, 15 पर्सेंट, 16 पर्सेंट तक है। ये भी डर रहता है कि इस ऋण की दर पर लोन ले लिया तो वापस नहीं चुका पाएंगे। अगर इकनॉमी को पुश देना है, तो कम-से-कम तीन चीजें बहुत जरूरी हैं, क्योंकि अब इलेक्शन में दो साल से कम बचे हैं और अगर एक साल बाद तक ग्रोथ के ये आंकड़े ठीक नहीं हुए, तो न सिर्फ मोदी सरकार को इलेक्शन में दिक्कत आएगी, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी।

दो काम तो तत्काल हो सकते हैं। एक, ब्याज की दर कम करना। ये मसला एक बार आया था यूपीए के आखिरी दो साल में, तभी हमलोगों ने ये सुझाव दिए थे कि रिजर्व बैंक अपनी जगह है, लेकिन रिजर्व बैंक को आप समझते हैं कि इतना ऑटोनोमस है कि दर वही फिक्स करेगा, तो ये किसी देश में नहीं होता। अमेरिका में फेड है, जो बहुत पावरफुल है, लेकिन उसे सरकार से समन्वय करके चलना पड़ता है। समीकरण बनाकर चलना पड़ता है। यहां पर अनफॉर्च्यूनेटली रघुराम राजन, वो भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आदमी थे, उर्जित पटेल भी वही हैं। इनकी सोच एक ही है। वो क्या, इन्फ्लेशन कम रखो, डॉलर-रूपी रेट एक तरह से रखो, क्योंकि नौकरियां देना, इनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। वो सरकार का काम है। तो वित्त मंत्री को चाहिए कि वो मामला अपने हाथ में ले लें और जो थोड़ा सा बहस हो तो हो, लेकिन दो पर्सेंट कम-से-कम आज भी इंटरेस्ट रेट कम हो सकता है। ये कोई भी अर्थशास्त्री, न्यूट्रल आदमी होगा तो मानेगा। हालांकि दो पर्सेंट थोड़ा ज्यादा तीव्र गति से घटाने की बात है, लेकिन जिस मुश्किल में हमलोग पड़ गए हैं, ये इस वक्त की आवश्यकता है। समय की मांग है। दो पर्सेंट आप रेट घटाइए। डॉलर-रुपया रेट 64 रुपए पर होगा, वो 67-68 हो जाए, तो एक्सपोर्ट को बढ़ावा मिलेगा। अब ये एक बात है कि राजनीतिक रूप से आप छाती ठोक के कहना चाहते हैं कि हमारा रुपया मजबूत हो गया। तो कोई अखाड़े में लड़ाई तो नहीं हो रही है कि रुपया स्ट्रॉन्ग हो गया, कौन कमजोर हो गया।

ये तो अर्थव्यवस्था की बात है। अब क्या होता है इसमें, साधारण आदमी भी समझ जाएगा कि आज फॉरेन इन्वेस्टमेंट जो आता है इंडिया में, एफडीआई, फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट, यानी यहां इकाइयां लगाने के लिए रुपया, जितना आ रहा है, उससे ज्यादा भारतीय उद्योगपति दूसरे देशों में निवेश कर रहे हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां चीन में जाकर माल बनवाती हैं, मतलब एफडीआई, अपोजिट एफडीआई हो रहा है। अगर यही रहा तो पांच साल बाद अचानक आपको अहसास होगा कि इंडिया की इंडस्ट्री बहुत कम हो गई। मेक इन इंडिया, प्रधानमंत्री की सोच बहुत बड़ी है। सवाल ये है कि उस सोच को क्रियान्वित कौन करेगा? अगर कोई समझदार आदमी नहीं है आपके पास, जो वित्त  और अर्थ की बारीकी को समझे, तो ये मामला सेटल कैसे होगा? अरविंद सुब्रमण्यम चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर हैं, लेकिन उनसे भी ज्यादा सलाह ये नहीं करते। हालांकि वे भी अमेरिकी सोच के हैं। भारत में भारतीय सोच के लोग चाहिए। जो भारत की अर्थव्यवस्था समझते हों, ये सब चीज आपस में जुड़ी हुई हैं। इन्फ्लेशन रेट, एक्सचेंज रेट, नौकरियों की उपलब्धि।

एक और नुकसान हुआ है, मोदी जी की गलती नहीं है, उनको तो तीन साल हुआ है, जो दो बैंकें थीं, खासकर आईडीबीआई यानि इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया, नए उद्योगों को ऋण देने के लिए, ओवरऑल रेट कमर्शियल बैंक से कम होता था। धीरे-धीरे उदारीकरण के माहौल में आपने उसको कमर्शियल बैंक बना दिया। तो आईडीबीआई से दूसरे बैंकों की तरह आईडीबीआई बैंक हो गया। आज किसी को उद्योग स्थापित करना है, तो उनको लोन कौन देगा? अगर कमर्शियल बैंक से लोन लेना है, तो कोई उद्योग बढ़ाएगा ही नहीं। इन ऋण दरों में उद्योग बढ़ेगा ही नहीं। तो अब जरूरत है कि एक नया बैंक, मोदीजी को मैं सुझाव देता हूं, नेशनल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया, एनडीबीआई आप अनाउंस कर दीजिए। एक साल में कुछ हो नहीं पाएगा उसमें, लेकिन एक संस्था की जरूरत है, जो जोर से औद्योगीकरण में लगे। मेक इन इंडिया खाली बोलने से तो नहीं होगा, मेक इन इंडिया होगा कैसे? अब व्यावसायियों का तो काम है, आपने कह दिया मेक इन इंडिया। आपने कह दिया डिफेंस इक्विपमेंट निजी क्षेत्र में बनेगा। इनकी नजर है कि जो 41 ऑर्डिनेंस फैक्ट्रीज हैं, उनका निजीकरण करने में। ये देश की समस्याओं का समाधान नहीं है।

आज तीन सबसे जरूरी बातें हैं, दो पर्सेंट इंट्रेस्ट रेट कम करिए। डॉलर को स्लाइड होने दीजिए। रुपया को मजबूत रखने से अपने को कोई फायदा नहीं है और तीसरा एक बड़े इंस्टीट्‌यूशन की घोषणा करिए, जो दस साल तक जॉब ओरिएंटेड औद्योगीकरण करे। आज जो आंकड़े आते हैं कि फॉरेन से इतना रुपया आ गया है, इतना बिलियन आ गया है। सरकार भी खुश है, फाइनेंस मिनिस्टर भी खुश हैं। उसमें खुश होने की बात ही नहीं है। क्योंकि रुपया आता है शेयर मार्केट में। वहां ब्याज की रेट कम है, यहां ब्याज की रेट ज्यादा है। इसको अंग्रेजी में आर्बिटराज बोलते हैं, तो उसका जो नफा-नुकसान होता है डिफरेंस का, उसके लिए रुपया यहां आता है। वो कमाकर अपने यहां चले जाते हैं। उससे एक नौकरी नहीं मिलती, एक उद्योग नहीं लगता, आंकड़े जरूर आ जाते हैं कि इतना बिलियन इन्वेस्टमेंट हुआ। जरा आंकड़ों को अलग-अलग करके बता दें वित्त मंत्री जी कि डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट कितना आया और पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट कितना आया। अगर डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट नहीं आया तो हमारे यहां तो कुछ नहीं आया। साथ में ये फीगर भी दें कि कितना डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट भारतीय उद्योगपतियों ने चाइना में और दूसरे देशों में लगाया। इन आंकड़ों को लेंगे, तो मोदीजी पाएंगे कि तीन साल में काफी नुकसान हुआ है। मैं उनकी आकांक्षाओं का आदर करता हूं कि नौकरियां बढ़े। भारत सेल्फ सफिशिएंट हो जाए, डिफेंस का इक्विपमेंट भी बनाए। उसमें भी दिक्कतें हैं, आप वहां की डिफेंस की टेक्नोलॉजी लाएंगे, जो उनकी रिसर्च एंड डेवलपमेंट, जो उन्होंने किया है, तो वो टेक्नोलॉजी कभी आपसे साझा नहीं करेंगे। कोई भी नहीं करेगा। स्वाभाविक कमर्शियल बात है। चाहे अमेरिका हो, फ्रांस हो, वो आपकी उतनी मदद करेगा जितना बना लें। टेक्नोलॉजी नहीं देगा आपको, तो ये जटिल समस्याएं हैं। एक दिन में सॉल्व नहीं होतीं और कोशिश करने में मोदी जी ने जल्दबाजी कर दी। एक तो डिमोनेटाइजेशन कर दिया, बहस में जाने की जरूरत नहीं है, उन्होंने अच्छी नीयत से किया, लेकिन वो चला नहीं। दूसरा, जीएसटी जल्दबाजी में कर दिया। वो बहुत वैज्ञानिक सही टैक्स क्लेक्शन का सिस्टम है, लेकिन 30 स्टेट हैं। वो भी धीरे-धीरे अरुण जेटली ने मेहनत करके तीसों स्टेट्‌स को एक टेबल पर ले आए, लेकिन इम्प्लीमेंटेशन जल्दी में कर दिए। पहले, अप्रैल  2018 से करते, सारी प्रक्रियाएं पूरी करके तो उतनी परेशानी नहीं होती, छोटे व्यावसायियों को।

आज बड़ी लिमिटेड कंपनी, कॉर्पोरेट सेक्टर में कोई फर्क नहीं पड़ता है इससे, लेकिन दुकानदार को फर्क पड़ता है। अभी मैं राजस्थान गया था। दुकानदार मिलने आए थे। तो मैंने कहा, इसमें क्या आपत्ति है? बहुत अच्छा हो गया आप लोगों के लिए भी। उन्होंने कहा, हमको आपत्ति नहीं है। आपत्ति ये है कि पहले एक रिटर्न हम टाइम पर नहीं भर पाते थे, अब 37 भरने हैं। आप हमको कहेंगे कि कम्प्यूटर से हो जाता है, हम भी मानते हैं। उसमें कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन एक कम्प्यूटर ऑपरेटर की दस हजार से कम तनख्वाह है नहीं, हमारा व्यवसाय इतना छोटा है कि दस हजार का हमारा खर्चा बढ़ जाएगा। हमको कुछ मिला नहीं, तो मैं समझता हूं अभी अरुण जेटली का बयान है कि वो शायद लिमिट बढ़ा रहे हैं। मैं समझता हूं कि एक करोड़ रुपए का जो धंधा करता है, टर्नओवर उससे कम वाले को तो ये फॉर्म-वॉर्म का चक्कर हटा देना चाहिए। थोड़ा ईज करिए। ईज ऑफ डुइंग बिजनेस करिए, नहीं तो अगले एक साल में समस्याएं इतनी बढ़ जाएंगी कि पिछली छह तिमाही से ग्रोथ रेट कम होता जा रहा है। इस बहस में मैं पड़ता ही नहीं कि 57 है, तो पहले वाले टेबल से कितना है। ये छोड़िए। नए टेबल से भी छह तिमाहियों से बराबर गिरते जा रहे हैं और अगले तीन-चार तिमाहियों तक गिरेगा। ये बहुत-बहुत-बहुत गंभीर समस्या है। इसमें पॉलिटिक्स की जरूरत नहीं है।

असल में क्या होगा, ये तो डेमोक्रेसी है। लोकतंत्र है, चुनाव होगा, एक हारेगा, एक जीतेगा। उससे देश की समस्या हल नहीं होगी। देश की समस्या हल होगी, ये सब करने से और मैं मानता हूं, राजनीति में होता है। हर राजनीतिक पार्टी दिखाना चाहती है, मुझे उससे ऐतराज नहीं है। ये कहें कि डिमोनेटाइजेशन ये होगा, कैशलेस, लेस कैश, इससे जो मूल समस्याएं हैं, उन पर प्रभाव नहीं पड़ा। अब भी इनको चाहिए इंट्रेस्ट रेट कम करें। एक्सचेंज रेट को थोड़ा सा स्लाइड होने दें, ताकि एक्सपोर्ट में बढ़ावा हो और एक बड़े बैंक की घोषणा करें, जिनका सिर्फ काम हो उद्योग लगवाना और उद्योग के लिए लोन देना, कम रेट में देना। जब आईडीबीआई बैंक बना था, 60 के दशक में, तो एक पाथ ब्रेकिंग था इंडिया में। इतना बड़ा इंस्टीट्‌यूशन और सारी कंपनियां उस जमाने में, चाहे टेक्सटाइल मिल हो या शुगर मिल, सबने आईडीबीआई से लोन लिया। आज एक नए आईडीबीआई की जरूरत है। कुछ भी नाम रखिए उसका। ये समस्या अर्थशास्त्री ज्यादा समझते हैं। लेकिन सरकार में कोई है नहीं, इनके मंत्रियों में नहीं है कोई समझने वाला और सबकी नीयत अच्छी है।

नेकनियती पर मैं शक नहीं करता किसी की। आफ्टर ऑल वो सरकार चला रहे हैं और वो चाहेंगे कि जीतें। लेकिन जो काम करना है, उसके लिए एक्सपर्ट एडवाइज की जरूरत है। दो-तीन अर्थशास्त्रियों को बुलाएं। मैं नहीं कहता कि आप वामपंथियों को बुलाइए क्योंकि वो तो आपकी फिलॉसफी नहीं है, लेकिन अर्थशास्त्री जो समझें, लेकिन जो अमेरिका परस्त, अमीर परस्त है, ये आपका भला नहीं कर सकेंगे। ये गरीबों का देश है। रूरल देश है। ग्रामीण इलाकों का देश है। अमेरिका का फॉर्मूला लगाने से यहां कुछ हासिल नहीं होगा। स्टॉक मार्केट जरूर बढ़ेगा, जो बढ़ रहा है। सब लोग पैसा बना रहे हैं। जॉब उससे नहीं मिलेंगे। सामाजिक समस्याएं बढ़ेंगी और ये किसी के हाथ में नहीं है। फिर कोई मुख्यमंत्री हो या कुछ हो, क्या कंट्रोल करेगा? अगर आपको सौहार्द्र स्थापित करना है समाज में, तो वापस विश्वसनीयता स्थापित करिए कि हमलोग गंभीरता से ऋण देंगे और नए उद्योगों को बढ़ावा देंगे। नई नौकरियां पैदा करेंगे। ये नहीं करेंगे तो मैं समझता हूं कि समय बहुत कम है।

एक बजट और है इनके पास। बजट में क्या कर लेंगे? अब तो जीएसटी ऐसा मसला आ गया है, कि रोज उनको कुछ न कुछ करना पड़ रहा है। जितनी जल्दी और मैं समझता हूं कि प्रधानमंत्री को खुद को ये मसला अपने हाथ में लेना चाहिए। कुछ अर्थशास्त्रियों से डिस्कस करिए, जो अमेरिकापरस्त न हों, हिन्दुस्तानी हों। वामपंथियों को मत लीजिए। लेकिन आप करिए और कम-से-कम जो ऑब्जेक्टिव हो। यदि सिर्फ आप उनको लेंगे जिनका आरएसएस से संपर्क हों, तो उसमें दायरा संकुचित हो जाता है। उसमें भी बहुत अच्छे लोग हैं। कम से कम ये एक कथन कि जो हमारे साथ नहीं है, वो हमारे खिलाफ है। इससे कोई फायदा नहीं होगा। इससे समाज भी बिगड़ेगा, राजनीतिक स्थिति भी बिगड़ती है। मैं समझता हूं कि प्रधानमंत्री जिस गुडविल से प्राइम मिनिस्टर बने हैं, 282 सीट मिली, 1985 के बाद पहली बार। मेरी समझ से काफी उन्होंने नुकसान कर लिया है, इनको और नुकसान नहीं करना चाहिए।

(साभार: चौथी दुनिया)


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