‘हम मीडिया वालों ने मोदी के साथ अन्याय किया था, लेकिन अब…’

‘हम मीडिया वालों ने मोदी के साथ अन्याय किया था, लेकिन अब…’

Wednesday, 04 October, 2017

हम मीडिया वालों ने मोदी के साथ अन्याय किया थालेकिन अब इस अन्याय को भूलने की कोशिश उनको करनी चाहिए अपने हित को ध्यान में रखते हुए। वह पत्रकारों से लगातार मिलते रहतेतो यशवंत सिन्हा का लेख छपने से बहुत पहले जान जाते कि छोटे उद्योगों और व्यवसायों में जीएसटी को लेकर कितनी तकलीफ है।’ हिंदी दैनिक अमर उजाला में छपे आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ महिला पत्रकार तवलीन सिंह का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:  

आर्थिक मंदी सबसे बड़ी कमजोरी

पिछले सप्ताह जब भाजपा के घर के भेदी यशवंत सिन्हा ने वित्त मंत्री पर हमला बोलातब मुझे इंदिरा गांधी का एक वक्तव्य याद आया। आपातकाल हट जाने के बाद इंदिरा जी पत्रकारों से फिर से मिलने लगी थीं। किसी ने उनसे जब पूछा कि आपातकाल में वह अपनी सबसे बड़ी गलती क्या मानती हैंतो उन्होंने कहा, ‘प्रेस पर पाबंदियां लगाना। सेंसरशिप न होतीतो मुझे बहुत पहले पता लग जाता कि जनता आपातकाल से दुखी है।

मेरे कहने का मतलब यह है कि प्रधानमंत्री मोदी चाहे जितनी बार अपनी ‘मन की बात’ द्वारा जनता के संपर्क में रहने का प्रयास करेंअसली संपर्क जनता से तब होता हैजब पत्रकारों से हर महीने या हर दूसरे महीने भेंट होती है। प्रधानमंत्री बन जाने के बाद मोदी पत्रकारों से इतना कम मिले हैं कि दिल्ली के कई वरिष्ठ राजनीतिक पंडित आज तक जानते भी नहीं कि प्रधानमंत्री से मिलना होतो किससे बात की जाए।

पत्रकारों से मोदी तब से दूर रहते आए हैंजब से गुजरात के दंगों के बाद हिंसा का सारा दोष मीडिया ने उन पर ऐसे लगाया कि अमेरिका ने उनको वीजा तक देने से इनकार कर दिया था। हम मीडिया वालों ने मोदी के साथ अन्याय किया थालेकिन अब इस अन्याय को भूलने की कोशिश उनको करनी चाहिए अपने हित को ध्यान में रखते हुए। वह पत्रकारों से लगातार मिलते रहतेतो यशवंत सिन्हा का लेख छपने से बहुत पहले जान जाते कि छोटे उद्योगों और व्यवसायों में जीएसटी को लेकर कितनी तकलीफ है।

यह नया कर इतना पेचीदा है कि अनेक अधिकारी भी समझ नहीं पाते कि क्या करना चाहिए। सिन्हा साहिब ने अपने लेख में विशेष तौर पर निर्यात करने वालों की बात की है। उनका इतना बुरा हाल है कि मेरी जानकारी के कुछ ऐसे निर्यातक हैंजो अपना कारोबार बंद करने की बात सोच रहे हैं। इनमें ज्यादातर ऐसे लोग हैंजिन्होंने दशकों से भाजपा को ही वोट दिया है। 

प्रधानमंत्री निवास के द्वार पत्रकारों के लिए बंद न किए होते मोदी नेतो शायद वह बहुत पहले जान गए होते कि उनकी सबसे बड़ी कमजोरी अर्थव्यवस्था में मंदी बन गई है। नोटबंदी और जीएसटी के अलावा कारण कई हैं। प्रधानमंत्री ने अपनी तरफ से गरीबों के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने की पूरी कोशिश की हैपर वह शायद जानते नहीं कि बड़ी योजनाओं से पैसा खिसकाने में सरकारी अधिकारी कितने चतुर हैं। केंद्र सरकार की मनरेगा जैसी बड़ी योजनाओं को वे पसंद करते हैंतो इसलिए कि इनके द्वारा अपनी जेबें भरने के मौके ऊपर से नीचे तक उपलब्ध हो जाते हैं।

छोटे उद्योगों में तकलीफ शुरू हुई नोटबंदी के बादतो बड़े उद्योगपतियों की परेशानियां उससे पहले ही शुरू हो गई थींक्योंकि काला धन खोजने के बहाने आयकर विभाग के अधिकारी उन्हें तंग करने में लग गए थे। यही मुख्य कारण है कि निजी क्षेत्र में निवेश अभी तक शुरू न हो पाया हैऔर निवेशक अगर वापस नहीं आएंगेतो रोजगार के नए अवसर भी पैदा नहीं होंगे।

ये सारी बातें प्रधानमंत्री बहुत पहले जान गए होतेअगर हम पत्रकारों से उन्होंने इतनी दूरियां नहीं रखी होतीं। वह शायद भूल गए हैं कि मीडिया लोकतंत्र का इतना महत्वपूर्ण खंभा है कि उसके कमजोर होने से पूरा ढांचा कमजोर हो जाता है। ऐसा होने से बड़े राजनेताओं का सबसे ज्यादा नुकसान होता हैजो जनता से दूर सुरक्षा की ऊंची दीवारों के पीछे रहने को मजबूर हैं। ये दूरियां ‘मन की बात’ करने से कम नहीं होती हैं प्रधानमंत्री जी।



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