वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने बताया, कैसे अटलजी के एक फैसले से बदला मोदी का करियर...

Saturday, 17 September, 2016

विजय त्रिवेदी

वरिष्ठ पत्रकार ।।

28 सितम्बर, 2014। न्यूयॉर्क का खचाखच भरा हुआ मैडिसन स्कवायर गार्डन। प्रवासी भारतीयों और खासतौर से गुजरातियों का मेला सा लगा हुआ था। केवल न्यूयॉर्क से ही नहीं, अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों से लोग हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देखने, मिलने और उनका भाषण सुनने के लिए पहुंचे हुए थे। कोई मोदी को विकास पुरुष कह रहा था तो कोई हिंदू हृदय सम्राट। 2002 में हुए गुजरात दंगों के बाद 2005 में अमेरिका ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को वीज़ा देने से इनकार कर दिया था। उसके बाद मोदी का यह पहला अमेरिका दौरा था। वो भी सरकारी दौरा।

राष्ट्रपति बराक ओबामा समेत पूरा अमेरिकी प्रशासन मोदी के स्वागत के लिए तैयार था। बहुत से कार्यक्रम रखे गए थे। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में मोदी का भाषण हुआ। मैडिसन स्कवायर में ‘मोदी – मोदी’ के नारे लग रहे थे। विडियो स्क्रीन पर चल रही फिल्म में भारत के आगे बढ़ने की कहानी और बीजेपी के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी सरकार की तारीफों का ज़िक्र भी था। मोदी ने अपने भाषण में कई बार वाजपेयी का ज़िक्र किया।

कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद मैं अपने कैमरामैन के साथ लोगों की प्रतिक्रिया ले रहा था। उत्साहित लोग, जोश से भरी भीड़। उसी दौरान एक सज्जन से सवाल जवाब हो रहे थे कि उन्होंने एक खुलासा किया मोदी के बारे में। वे सज्जन गुजराती थे, बीजेपी समर्थक, नरेन्द्र मोदी के मित्रों में से एक। उन्होंने बताया कि सन 2000 में जब वाजपेयी प्रधानमंत्री के तौर पर अमेरिका दौरे पर आए थे तब उनका भी प्रवासी भारतीयों के साथ एक कार्यक्रम था। उस वक्त नरेन्द्र भाई अमेरिका में ही थे राजनीतिक अज्ञातवास पर, लेकिन वो उस समारोह में शामिल नहीं थे। मोदी के उन गुजराती मित्र ने जब वाजपेयी से मुलाकात में मोदी के वहां होने के बारे में बताया और पूछा कि क्या मोदी से वे मिलना चाहेंगे तो वाजपेयी ने हामी भर दी। अगले दिन जब वाजपेयी और मोदी की मुलाकात हुई। मोदी से वाजपेयी ने कहा, “ऐसे भागने से काम नहीं चलेगा, कब तक यहां रहोगे? दिल्ली आओ...”। वाजपेयी से उस मुलाकात के कुछ दिनों बाद नरेन्द्र मोदी दिल्ली आ गए। उनका वनवास खत्म हो गया और मोदी तैयार हो गए एक नई राजनीतिक पारी खेलने के लिए।

अक्टूबर 2001 की सुबह। मौसम में अभी गर्माहट थी, लेकिन वातावरण में एक स्याह सन्नाटा पसरा हुआ था। चेहरे मानो एक दूसरे से सवाल पूछते हुए से, बिना किसी जवाब की उम्मीद के... दिल्ली के एक श्मशान गृह में एक चिता जल रही थी। एक प्राइवेट चैनल के कैमरामैन गोपाल बिष्ट के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने कुछ पत्रकार साथी और इक्का-दुक्का राजनेता थे।अंतिम संस्कार चल ही रहे थे कि एक नेता के मोबाइल फोन की घंटी बजी। प्रधानमंत्री निवास से फोन था।

फ़ोन करने वाले ने पूछा, “कहां हैं?”

फ़ोन उठाने वाले ने जवाब दिया, “श्मशान में हूं।“

फ़ोन करने वाले ने कहा, “आकर मिलिए।“

इस बहुत छोटी सी बात के साथ फोन कट गया। श्मशान में आये उस फोन ने हिन्दुस्तान की राजनीति के नक्शे को बदल दिया।

गोपाल बिष्ट का निधन उस हवाई जहाज दुर्घटना में हुआ था जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माधव राव सिंधिया को लेकर दिल्ली से कानपुर की उड़ान पर था। दोपहर 1.50 पर उसे उतरना था लेकिन करीब 1 बजकर 35 मिनट पर हवाईजहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस विमान में सवार सभी आठ लोग मारे गए थे। सिंधिया के अलावा विमान के पायलट और सह पायलट, उनका निजी सहयोगी रुपिंदर सिंह, तीन पत्रकार इंडियन एक्सप्रेस के संजीव सिन्हा, हिन्दुस्तान टाइम्स से अनु शर्मा, आजतक से रंजन झा और कैमरामैन गोपाल बिष्ट शामिल थे।

ग्वालियर के राजपरिवार से जुड़े होने के बावजूद आम आदमी के बीच काफी लोकप्रिय माधव राव सिंधिया कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा रैली में हिस्सा लेने चार्टेड विमान दस सीटर सेसना सी-90 में दिल्ली से 12 बजकर 49 मिनट पर उड़े थे। यात्रा को कवर करने के लिए ये पत्रकार भी उनके साथ दौरे पर थे। मौसम में अचानक खराबी या बादल फटना दुर्घटना की वज़ह बताई गई।

नौजवान नेता माधव राव सिंधिया की मौत कांग्रेस के लिए तो बड़ा झटका थी ही,लेकिन देश भर में भी उस पर गहरा शोक दिखाई दिया। शवों को दुर्घटनास्थल से दिल्ली लाने के लिए केन्द्र सरकार के दो मंत्री - कानून मंत्री अरुण जेटली और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री विजय गोयल, और कांग्रेस के नेता सलमान खुर्शीद गए थे।

उत्तरप्रदेश में मैनपुरी के पास के गांव में हुई इस दुर्घटना के बाद सड़क मार्ग से पार्थिव शरीरों को आगरा लाया गया और वहां से वायुसेना के विशेष विमान से दिल्ली। सिंधिया का अंतिम संस्कार ग्वालियर में उस जगह होना था जहां उनकी मां राजमाता विजया राजे सिंधिया की समाधि बनी हुई है। उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत कई राजनेताओं को पहुंचना था।

दिल्ली में सफदरजंग रोड पर सिंधिया के सरकारी निवास पर लगे बड़े शामियाने में भी नेताओं, कार्यकर्ताओं और आम लोगों का आना बदस्तूर जारी था। 30 सितंबर के दिन दुर्घटना की खबर आते ही कानपुर में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा की जनसभा शोकसभा में बदल गई।

टेलिविजन चैनलों पर सिंधिया को लेकर कार्यक्रम और खबरों की बाढ़ सी आ गई। हर कोई  उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा था। लेकिन उस दुर्घटना में मारे गए अन्य सात लोगों को याद करने की फुर्सत शायद किसी को नहीं थी। चैनलों पर छोटी सी खबर आई गई हो गई। अगले दिन के अखबारों में भी सिर्फ सिंधिया ही थे। हर राजनेता ग्वालियर पहुंचना चाहता था। ऐसे में किसी राजनेता का किसी कैमरामैन के अंतिम संस्कार में पहुंचना एक बड़ी बात थी।

ये राजनेता थे नरेन्द्र मोदी। भारतीय जनता पार्टी के गुजरात से नेता, जिन्हें केशूभाई पटेल के विरोधियों का साथ देने के लिए उनकी  नाराज़गी झेलनी पड़ी थी। उन दिनों वे दिल्ली में अशोका रोड़ पर बीजेपी के पुराने दफ्तर में पिछवाड़े में बने एक छोटे से कमरे में रह रहे थे जिसमें फर्नीचर के नाम पर एक तख्त और दो कुर्सियां हुआ करती थी। उस वक्त पार्टी में प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली जैसे नेताओं का ही दबदबा सा था।

आधी बाहों के कुर्ते और पायजामे में थोड़ी दूर खड़े होकर नरेन्द्र मोदी जलती हुई चिता को देख रहे थे तभी उनके पास प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का फोन आया था। जब मोदी उस रात अटल बिहारी वाजपेयी के घर पहुंचे तो उन्हें एक नई ज़िम्मेदारी दी गई - गुजरात जाने की ज़िम्मेदारी। पार्टी के दिग्गज नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल को हटाकर नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री बनने की जिम्मेदारी।

तब शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि मोदी का राजनीतिक करियर अचानक पार्टी हाईकमान और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के एक फ़ैसले से इस तरह बदल जाएगा।

 



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