इस कदम से अब भाजपा को सतर्क होना ही पड़ेगा: डॉ. सिराज कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार

इस कदम से अब भाजपा को सतर्क होना ही पड़ेगा: डॉ. सिराज कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार

Tuesday, 10 April, 2018

डॉ. सिराज कुरैशी

वरिष्ठ पत्रकार ।।

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का मिलन और पं. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की गठबन्धन करने हेतु भागदौड़- क्या गुल खिलायेगी 2019 के लोक सभा चुनाव में, यह कहना अभी मुश्किल है। लेकिन इन तीनों की गतिवधियों ने भाजपा के सामने थोड़ी मुश्किलें जरूर खड़ी कर दी हैं- इनकी (खासकर ममता की) भागदौड़ को दृष्टिगत रखते हुए भाजपा को सतर्क होना ही पड़ेगा।

इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि प्रतिस्पर्धी को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए ममता और सोनिया गांधी की 10 जनपथ पर हुई मुलाकात ने भाजपा के दिग्गजों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि इन दोनों का मन भी बदलता दिख रहा है। हां, इन दोनों दिग्गज सियासी लेडीज की क्या बात हुई, बातचीत का एजेन्डा सियासी था या सियासत से हट कर था, यह आज तक मालूम ही नहीं पड़ा। लेकिन सियासी लोग मिलेंगे तो अवश्य ही देश की वर्तमान और 2019 के चुनाव पर बातचीत हुई होगी, क्योंकि जितने दिन ममता दिल्ली में रहीं (जब भी प. बंगाल में साम्प्रदायिकता रूपी आग फैली हुई थी), उतने दिन देश के हर उस राजनैतिक नेता से मिली, जो प्रधानमंत्री मोदी को 2019 के चुनाव के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा हुआ देखना नहीं चाहते।

सोनिया गांधी द्वारा दी गई डिनर पार्टी के पीछे भी शायद यही सोच रही थी कि कांग्रेस पार्टी भी विपक्षी एकता की पहल कर रही है, लेकिन जो विपक्षी पार्टियों के वरिष्ठ नेतागण एवं नामी सियासतदां सोनिया की डिनर पार्टी में पधारे थे, उनकी क्या सोच रही? या वह गठबन्धन के हामी थे या नहीं? और कांग्रेस के पीछे चलने को तैयार हुए हैं या नहीं, यह कहना अभी बहुत मुश्किल है। लेकिन अनुभव के नाते मैं कह सकता हूं कि हर क्षेत्रीय पार्टी का मुखिया अपना वर्चस्व कायम रखना चाहता है (खासकर अपने राज्य में) इसलिये वह कांग्रेस का दामन थामकर चलने में गुरेज कर सकता है।

मैं एक पत्रकार और लेखक के नाते कह सकता हूं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन चार सालों में भारतीय राजनीति में ऐसा परिवर्तन ला दिया है जिसकी पहले कल्पना नहीं थी। कौन सोच सकता था कि बसपा और सपा एक साथ आ सकते हैं, जब ममता ने शिव सेना सुप्रीमों से मुलाकात की तो आज वह भी शिव सेना को साम्प्रदायिक पार्टी नहीं मान रही। ऐसी सोच की पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

कांग्रेस की डिनर पार्टी, सपा-बसपा का मिलन, ममता द्वारा शिव सेना की तारीफ, इन सब घटनाओं से पूरी तरह लगता है कि नरेन्द्र मोदी का वजन अभी भारी है और एक साल और बीत जाने के बाद (यानी 2019 में) तक कम होने वाला नहीं दिखाई देता।

हां, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि 2019 में सपा और बसपा का मजबूत मिलन रहा तो उत्तर प्रदेश में भाजपा को लोहे के चने चबाने पड़ सकते हैं, क्योंकि गोरखपुर और फूलपुर के लोक सभा चुनाव का परिणाम भाजपा के सामने है।

यह पूरी तरह सच है कि चुनावों में माहौल का बहुत ज्यादा महत्व होता है। 2014 में नरेन्द्र मोदी के पक्ष में अभूतपूर्व माहौल बना था और मोदी ने उस माहौल को भांपते हुए जनता के बीच जाकर यूपीए सरकार की कमियां गिनाना शुरू कर दी थी और भाजपा और मेादी के पक्ष में हवा बनती चली गई उस हवा में (बल्कि मोदी आंधी में) सभी सियासी पार्टियां उड़ गई।

यह कहना भी एक बुजुर्गबार का सच है कि 2014 में मोदी सियासत के राष्ट्रीय क्षितिज पर उदित हुए थे लेकिन 2014 जैसा माहौल अब दिखाई नहीं दे रहा। भाजपा को अब स्वयं अपने लिए इस बचे हुए एक साल में अभियान चलाना होगा, क्योंकि अब विपक्ष में कोई सरकार नहीं है।

विपक्षी सरकार के विरोध में अभियान चलाना आसान होता है, जबकि अपने स्वयं की सरकार को कायम रखने के लिये स्वयं ही अभियान चलाना बड़ा मुश्किल होता है।

जब कोई पार्टी सरकार चला रही होती है तेा इसको एहसास नहीं होता कि आपके किस कदम, किस नीति एवं कौन से वक्तव्य को कितने लोग पसंद कर रहे हैं और कितने लोग नापसंद कर रहे हैं। विरोधी नापसंद लोगों का लाभ उठाने में कोई कमी भी नहीं छोड़ते।

इसलिये भाजपा को इसकी काट अभी से काटने की सोच बनानी होगी। अभी पूरा एक साल बाकी है चुनाव में। अभी से ऐसा रास्ता बनाना पड़ेगा जिससे 2014 जैसा नहीं तो उससे थोड़ा कम माहौल भाजपा और मोदी जी के पक्ष में बने। चार लोक सभा के उप चुनावों में भाजपा अपनी पराजय देख चुकी है। इन चारों में मुख्य दो (गोरखपुर और फूलपुर) वह भी ये जब 20-25 सालों से भाजपा के ही पास थे।

2019 के चुनाव के वक्त विपक्षी गठबन्धन बने या न बने लेकिन यह सच है कि मोदी सरकार के विरोधियों के बीच संवाद और निकटता तो स्थापित हो ही गई है। अगर भाजपा के दिग्गजों ने विपक्ष की वर्तमान गतिविधियों को हल्के में लिया तो उसके लिए (भाजपा के लिए) आत्मघाती साबित होगा। वैसे मेरी राय में मेरे देश को अभी नरेन्द्र मोदी की जरूरत है।

 

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