प्रसार भारती अध्यक्ष सूर्यप्रकाश बोले-विधानसभा का यह निर्णय अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा हमला

Friday, 07 July, 2017

विधानमंडल और मीडिया के टकराव के ढेरों उदाहरण मौजूद हैं। करीब-करीब सभी प्रमुख मामलों में विधानमंडलों को न्यायपालिका के मत के आगे झुकना पड़ा है और पत्रकारों को दंडित करने की इच्छा त्यागनी पड़ी है।हिंदी अखबार दैनिक जागरण के जरिए ये कहना है प्रसार भारती के अध्यक्ष व जाने-माने स्तंभकार ए सूर्यप्रकाश का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

अपनी हद पार करती विधानसभा

कुछ विधायकों के खिलाफ लेख लिखने के कारण दो पत्रकारों को एक-एक साल जेल की सजा और दस हजार रुपये का जुर्माना लगाने को लेकर कर्नाटक विधानसभा और मीडिया के बीच टकराव जारी है। 21 जून को कन्नड़ भाषा के एक मीडिया संस्थान के दो संपादकों रवि बेलागेरे और अनिल राज को गिरफ्तार करने के राज्य विधानसभा के फैसले ने न सिर्फ कर्नाटक, बल्कि समूचे देश के मीडिया जगत को गहरा आघात पहुंचाया है। विधानसभा का यह निर्णय अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा हमला है।

विधानसभा के फैसले के बाद दोनों पत्रकारों ने कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने दोनों संपादकों को अध्यक्ष के समक्ष पेश होकर विधानसभा के निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए अपील करने का निर्देश दिया है। अब अगले सत्र में विधानसभा अध्यक्ष राज्य विधानसभा से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए कह सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा है कि यदि विधायक चाहें तो कोर्ट में मानहानि का मामला दायर कर सकते हैं। अच्छा होगा कि विधानसभा न्यायालय के सुझाव का पालन करे। उसे यह भी ध्यान रखना होगा कि देश की न्यायपालिका ने कभी भी एक विधानमंडल को अपनी शक्तियों को इस प्रकार से प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी है जिससे संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार बाधित होते हों।

विधानमंडल और मीडिया के टकराव के ढेरों उदाहरण मौजूद हैं। करीब-करीब सभी प्रमुख मामलों में विधानमंडलों को न्यायपालिका के मत के आगे झुकना पड़ा है और पत्रकारों को दंडित करने की इच्छा त्यागनी पड़ी है। आजादी के बाद 1952 में एक लेख के जरिये विधानसभा अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करने के चलते उत्तर प्रदेश के तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने ब्लिट्ज के कार्यकारी संपादक दिनशा होमी मिस्त्री को गिरफ्तार करने का आदेश दिया था। बाद में उस फैसले के खिलाफ मिस्त्री ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें रिहा करने का आदेश दिया।

1964 में भी उत्तर प्रदेश विधानसभा ने एक पर्चा प्रकाशित करने के चलते केशव सिंह को जेल भेज दिया था, क्योंकि उसकी नजर में वह पर्चा सदन के एक सदस्य की गरिमा के खिलाफ था। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी केशव सिंह को रिहा करने का आदेश दे दिया, लेकिन विधानसभा ने न्यायपालिका के उस निर्णय को चुनौती देने का फैसला किया। उसने केशव सिंह, उनके वकील और आदेश देने वाले इलाहाबाद के दोनों जजों को सदन की अवमानना का दोषी मानते हुए गिरफ्तार कर सदन के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया? दोनों जजों ने राहत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट की पूर्ण बेंच ने विधानसभा के फैसले पर रोक लगा दी।

दो प्रतिष्ठानों विधायिका और न्यायपालिका के बीच टकराव को समाप्त करने के लिए राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत यह मामला सुप्रीम कोर्ट के हवाले किया। उसके बाद यह मामला मुख्य न्यायाधीश पीबी गजेंद्रगड़कर की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच द्वारा सुना गया। मुख्य न्यायाधीश ने अपने और बेंच के अन्य जजों के विचारों को कलमबद्ध किया तथा बहुमत से फैसला सुनाया। इस मामले में कोर्ट द्वारा निर्धारित किए गए मौलिक सिद्धांत प्राय: विधानमंडलों के कोप का भाजन बनने वाले पत्रकारों और दूसरे लोगों के लिए सुरक्षा कवच का काम करते आए हैं। इस मामले में न्यायालय द्वारा कही गई प्रमुख बातें इस प्रकार हैं-भारत में संविधान सर्वोपरि है और भारतीय विधानमंडल इंग्लैंड में संसद के बराबर संप्रभुता का दावा नहीं कर सकते हैं।

न्यायपालिका के पास अनुच्छेद 194 (3) की व्याख्या करने की विशिष्ट शक्ति है जहां से विधानमंडल अपनी ताकत और विशेषाधिकार हासिल करते हैं। विधानमंडलों को एहतियात के साथ अपनी ताकत का इस्तेमाल करना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं कि विधानमंडलों को कई तरह की शक्तियां मिली हुई हैं, लेकिन वे संविधान में लिखित बुनियादी अवधारणाओं द्वारा नियंत्रित की जाती हैं। यदि विधानमंडल अपने लिए निर्धारित विधायी क्षेत्रों का अतिक्रमण करते हैं और उससे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है तो किसी लेख के जरिये उसकी आलोचना की जा सकती है। इस पर यदि विधानमंडल कोई कार्रवाई करते हैं तो अदालत द्वारा उसे रद किया जा सकता है।

2003 में भी तमिलनाडु विधानसभा ने मुख्यमंत्री और विधानसभा की आलोचना करने के लिए द हिंदूके संपादक और चार अन्य पत्रकारों को जेल भेजने का फैसला किया था, लेकिन देश के मिजाज को भांपते हुए उनके खिलाफ आरोप को वापस ले लिया। इसके पहले 10 मार्च, 1983 को इनाडु ने आंध्र प्रदेश विधान परिषद में हुए हंगामे पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की। उस रिपोर्ट का शीर्षक था बुजुर्गों का झगड़ा’! सदन के सदस्यों ने शीर्षक को अपमानजनक माना। फिर सदन की विशेषाधिकार समिति ने समाचार पत्र को विशेषाधिकार के उल्लंघन का दोषी पाया। सदन ने संपादक रामोजी राव को डांटने-फटकारने का फैसला किया। उसने रामोजी राव को सदन के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए हैदराबाद के पुलिस आयुक्त को कहा। राव ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जिसने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। अंत में राज्यपाल के हस्तक्षेप के बाद उस मामले का पटाक्षेप हुआ। ऐसे मामलों में एक विधानमंडल कहां तक कार्रवाई कर सकता है? इसे समझने के लिए केशव सिंह के मामले में मुख्य न्यायाधीश गजेंद्रगड़कर की बातों का उल्लेख करना बेहतर होगा। उनके अनुसार, ‘अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति का प्रयोग हमेशा सावधानीपूर्वक, बुद्धिमानी और सतर्कता के साथ करना चाहिए।

ताकत का अंधाधुंध इस्तेमाल प्रतिष्ठा को बरकरार रखने में मददगार साबित नहीं होगा, उल्टे उसके क्षरण का कारण बनेगा। विवेकशील जज यह बात कभी नहीं भूलते कि लोगों की निगाहों में अदालत के प्रति आदर भाव पैदा करके ही वे अपने दफ्तर की प्रतिष्ठा और रुतबे को कायम रख सकते हैं। और यह आदर भाव उनके फैसले की गुणवत्ता, मामले की सुनवाई के दौरान दिखाई गई निडरता, तथ्यों के प्रति बरती गई पारदर्शिता और निष्पक्षता से आता है। एक प्रतिष्ठान के रूप में जो बातें न्यायपालिका के लिए सही हैं, वही विधानमंडल के लिए भी सही हैं।सम्मानीय विधानसभा अध्यक्ष को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए! यदि कर्नाटक विधानसभा अपनी शक्ति के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का गहराई से अवलोकन करे और कर्नाटक हाईकोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन करे तो टकराव की स्थिति खत्म हो सकती है।

(साभार: दैनिक जागरण)



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