वरिष्ठ पत्रकार ओंकारेश्वर पांडेय ने बताया- स्मृति ईरानी को क्यों आता है गुस्सा ...

Monday, 07 May, 2018

प्रसार भारती आजतक डीडी-एआईआर को स्वावलंबी बनाने का कोई रोडमैप नहीं बना पाया। उल्टे उसने मंत्रालय का प्रस्ताव ठुकरा कर साबित कर दिया कि न तो वह खुद सुधरना चाहता है और न ये चाहता है कि कोई और उसे सुधारे। राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित अपने लेख के जरिए ये कहना है राष्ट्रीय सहारा के ही वरिष्ठ समूह संपादक ओंकारेश्वर पांडेय का। उनका ये लेख आप यहां पढ़ सकते हैं-

स्मृति ईरानी को गुस्सा क्यों आता है?

प्रसार भारती चर्चा में हैं। चर्चा है विवादों की, सूचना प्रसारण मंत्रालय से टकराव की, तनख्वाह रोके जाने की, तबादलों की और स्मृति ईरानी के गुस्से की। सवाल यह है कि केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी को गुस्सा क्यों आता है?

इसकी ताजा वजह प्रसार भारती का वह फैसला है, जिसने दूरदर्शन को सुधारने और पटरी पर लाने के श्रीमती ईरानी के प्रयासों पर पानी फेर दिया है। वे दशकों से पॉलिसी पैरालिसीस के शिकार दूरदर्शन के समाचार सेवा में सुधार के लिए दो वरिष्ठ पत्रकारों सिद्धार्थ जराबी और अभिजीत मजूमदार को लाना चाहती थीं। लेकिन प्रसार भारती बोर्ड ने इनकी नियुक्ति का प्रस्ताव फंड की कमी के बहाने खारिज कर दिया।

खुद तो प्रसार भारती आजतक डीडी-एआईआर को स्वावलंबी बनाने का कोई रोडमैप नहीं बना पाया। उल्टे उसने मंत्रालय का प्रस्ताव ठुकरा कर साबित कर दिया कि न तो वह खुद सुधरना चाहता है और न ये चाहता है कि कोई और उसे सुधारे। जराबी और मजूमदार आते तो या तो कुछ कर दिखाते, या दीपक चौरसिया की तरह वापस लौट जाते। पर प्रयास तो होता। इस प्रस्ताव को ठुकराने का कोई औचित्य नहीं था।

स्टूडियो और ट्रांसमीटर्स के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा पब्लिक ब्रॉडकास्टर होकर भी दूरदर्शन आज इसीलिए नहीं सुधर पा रहा, क्योंकि आप कम सैलरी पर लोगों को रखना चाहते हैं। तो सक्षम प्रोफेशनल आपके पास क्यों आएंगे?

मैन बिहाइंड मशीन हमेशा महत्वपूर्ण होता है। प्रसार भारती ने इस पर गौर नहीं किया। खुद प्रसार भारती में टेलिविजन का विजन और अनुभव रखने वाले लोगों की खासी कमी है।

दरअसल प्रसार भारती ने अपने ध्येय को ही भुला दिया है। सन 1990 में पारित एक अधिनियम के बाद 15 सितंबर 1997 को प्रसार भारती इसलिए बना था कि इससे दूरदर्शन को बीबीसी जैसी स्वायत्त और प्रतिष्ठित संस्था बनाया जा सकेगा, लेकिन यह फाल्स ईगो क्लैश का शिकार होकर रह गई है। ताजा समस्या की जड़ में भी ईगो है। दो लोगों की नियुक्ति के प्रस्ताव को ठुकराने से मंत्रालय का नाराज होना स्वाभाविक था। लेकिन इस टकराव में पूरी संस्था पैरालाइज हो गई है।

करीब 31,500 कर्मचारियों वाली विश्व की यह सबसे बड़ी प्रसारण संस्था होकर भी यह आज गुणवत्ता, लोकप्रियता और मुनाफा कमाने के मामले में अन्य निजी चैनलों से क्यों पिछड़ती जा रही है, इसको समझने के लिए थोड़ा गहराई में जाना होगा।

अप्रैल, 1930 में भारतीय ब्रॉडकास्टिंग सर्विस के रूप में दूरदर्शन की शुरुआत उद्योग और श्रम विभाग के तहत हुई थी और सन 1959 में इसने भारत में टीवी प्रसारण की शुरूआत की थी। आज दूरदर्शन कुल 35 चैनलों का प्रसारण करता है, जिनमें 8 अखिल भारतीय, 11 क्षेत्रीय, 15 राज्य स्तरीय और एक अंतर्राष्ट्रीय चैनल शामिल हैं। इसी तरह आकाशवाणी देश के लगभग 92 फीसदी हिस्से को कवर करता हुआ 23 भाषाओं और 146 बोलियों में प्रसारण करता है।

सन 1990 के बाद से पिछले दो दशकों में एआईआर-डीडी के नेटवर्क में भारी विस्तार से समस्या बढ़ी। सन 1992 में दूरदर्शन के 535 ट्रांसमीटर थे, जो अब 1415 हो गए हैं। सन 1990 में आकाशवाणी के 186 ट्रांसमीटर व 100 स्टेशन थे, तो आज 546 ट्रांसमीटर और 376 स्टेशन हैं। इतने बड़े विस्तार के बाद जब 7700 कर्मियों की मांग हुई, पर 2000 व्यक्तियों की भर्ती की गयी। लेकिन क्या वाकई मैन पावर की कमी है?

शायद नहीं। समस्या स्टाफिंग संरचना और विभिन्न विभागों को लेकर है। लगभग 80 फीसदी पदों को समूह सी और डी की श्रेणियों में केंद्रित किया जाता है, जो सपोर्ट के लिए होते हैं। कुछ समय पहले तक कुल 11654 भरे पदों में से केवल 33 समूह ए अधिकारियों और 426 ग्रुप बी अधिकारियों के थे। अन्य पदों में से अधिकांश यूडीसी, एलडीसी, ड्राइवर, मल्टीटास्किंग सहायकों, सुरक्षा गार्ड आदि के हैं। यानी डीडी-आकाशवाणी में मुख्य रूप से लिपिक स्तर के कर्मचारी ज्यादा हैं और प्रबंधन व नेतृत्व स्तर पर नगण्य हैं।

दोनों संस्थाओं में 44.4 फीसदी कर्मचारी इंजीनियरिंग में हैं, जबकि प्रशासनिक सहायता सेवाओं में 36.9 फीसदी और प्रोग्रामिंग के मुख्य कार्य में केवल 18.7 फीसदी। अंदाजा लगा सकते हैं कि एआईआर-डीडी के प्रोग्राम इतने खराब और थके हुए क्यों हैं।

सन 2016 तक के आंकड़ों के अनुसार यहां लगभग 11000 कर्मचारी शेष 20000 के काम में सहयोग के लिए थे। प्रोग्रामिंग या ट्रांसमिशन कार्य पर लगे प्रत्येक 2 कर्मचारियों पर औसतन एक कर्मचारी सहायता के लिए हैं। और फिर रोना कि लोग कम हैं। कर्मियों का ऐसा अनुपात किसी भी चैनल में नहीं है। हालांकि अफसरों की भारी कमी है। क्योंकि डीडी में सन 1999 से प्रोन्नति नहीं हुई। कोर्ट में केस के कारण रुकी रही, जबकि कोर्ट से सब्जेक्ट टू क्लीयरेंस के साथ प्रमोशन हो सकता था।

कुल मिलाकर प्रसार भारती का एचआर अथवा मानव प्रबंधन ही पूरी तरह विफल है। इसका एक उदाहरण देश की अलग-अलग अदालतों में सेवा मामलों से संबंधित 956 लंबित मामले भी हैं।

प्रसार भारती बनने के बाद से हमेशा तात्कालिक एप्रोच रहा-फायर फाइटिंग होती रही। बिना अनुभव के लोग आए। दूरदर्शन ने उस ब्रांड वैल्यू को लूज किया, जो एक जमाने में हुआ करती थी। प्रसार भारती के पहले सीईओ अनिल बैजल थोड़े विजनरी जरूर थे। उसके बाद किसी सीईओ ने ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे ब्रांड बना हो। मौजूदा सीईओ शशि शेखर वेंपत्ति भी कोई ठोस कदम उठाते नहीं दिखते।

किसी भी संस्था में आज बोओ, कल काटो, कहीं नहीं होता। सरकार की प्रचार योजनाओं पर बने कार्यक्रमों की मार्केटिंग जन-रुचि के अभाव में नहीं हो पाती। कन्फ्यूजन है कि प्रसार भारती प्रॉफिट मेकिंग ऑर्गनाइजेशन है या नहीं।

किसी चैनल के स्वावलम्बी होने के लिए न्यूनतम तीन और अधिकतम पांच साल का समय तय होता है। दूरदर्शन ने कभी कोई एक साल की भी पॉलिसी नहीं बनाई। प्रोडक्ट-क्वॉलिटी के लिए अच्छे पैसे चाहिए।

मंत्रालय प्रचुर बजट देता है, लेकिन दूरदर्शन बदतर इन्वेस्टर है। यहां कभी स्पांसरशिप, कभी कमीशंड, कभी सेल्फ फाइनांसिंग स्कीम, तो कभी रैवेन्यु शेयरिंग चालू हो जाता है। प्रोडक्ट की गुणवत्ता के लिए अच्छे लोग और बजट चाहिए। लेकिन प्रसार भारती कंजूस है। हालांकि अभी अरुणाचल में पहली दफा रिएल्टी शो पर 10 लाख रुपए का खर्च रखा गया। स्टार व सोनी जैसे चैनल इससे कहीं ज्यादा खर्च करते हैं। कम बजट के कारण दूरदर्शन पर बड़े स्टार नहीं आते, बड़े सेट्स नहीं बन पाते।

पब्लिसिटी जीरो है। निजी चैनलों के होर्डिग्स मेट्रो तक पर दिखते हैं। उनके धारावाहिकों के विज्ञापन अखबारों के पेज-1 पर छाये रहेंगे, पर आप कहां हैं?

डीडी का डिजाइन व प्रेजेन्टेशन पुराना और अनाकर्षक है। इनहाउस प्रोडक्शन की क्वालिटी बहुत खराब है। एक बड़ी समस्या तकनीक व उपकरणों की भी है। एनालॉग से आगे बढ़ते हुए डीडी जहां एक तरफ डीटीएच और डिजिटल पर जा पहुंचा है, वहीं पता नहीं किस उद्देश्य से डीटीटी पर 33 सौ करोड़ खर्च हो रहे हैं। डीटीटी पर महज पांच चैनल हैं और 25 किलोमीटर का दायरा बमुश्किल मोबाइल में डोंगल लगाकर देखना पड़ता है। जबकि दूरदर्शन के डिश पर सारे 80 चैनल फ्री उपलब्ध हैं। एप पर भी फ्री हैं सैकड़ों चैनल। तो डीटीटी की जिद क्यों? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सपनों का किसान चैनल और अरुण प्रभा चैनल भी ब्रांड नहीं बन पाये।

डीडी के लोग ही कहते हैं कि इंजीनियरिंग के लोग पुराने व आउटडेटेड हैं। उनका व्यवहार ऑब्लाइजिंग है, प्रोफेशनल ट्रेनिंग की कमी है, नखरे ज्यादा हैं। प्रोडक्शन स्टाफ को एडवांस ट्रेनिंग नहीं दी जाती। कैमरों के मामले में दूरदर्शन दस साल पीछे है। डीडी का 90 फीसद ऑडियो अप्रशिक्षित इंजीनियर्स के भरोसे है। एलपीटी से या आकाशवाणी से लोग डीडी में भेज दिये जाते हैं।

सैम पित्रोदा कमेटी ने डीडी-एआईआर में सुधार के लिए रिपोर्ट दी थी, उस पर अमल नहीं हुआ। सुधार के लिए एक दीर्घकालिक नीति व एप्रोच की जरूरत है। प्रसार भारती को इस पर सोचना चाहिए। मंत्रालय बजट दे रहा है और सुधार भी चाहता है। खुले दिल से इस पर सोचना चाहिए। सुधार के लिए लोग चाहिए। उन्हें रोकेंगे तो सुधार कौन करेगा?

(साभार: राष्ट्रीय सहारा)


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